काले मर्यादा नास्ति
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एक बार बड़ा भारी दुर्भिक्ष पड़ा। ऐसा बड़ा अकाल उस युग में पहले कभी नहीं हुआ था। अन्न के दर्शन दुर्लभ हो गये। लोग भक्ष-अभक्ष खाकर जैसे-तैसे अपना जीवन निर्वाह करने लगे।
विश्वामित्र ऋषि भी इस भयंकर समय में भूख से पीड़ित होकर इधर-उधर व्याकुल फिरने लगे। करते क्या, अन्न मिलना कठिन था, क्षुधा की पीड़ा से प्राण जाने का प्रश्न उपस्थित हो रहा था। अभक्ष खाने में धर्म जाने का भय था। मन में बड़ा संघर्ष चल रहा था, एक ओर प्राण जाने का भय था दूसरी ओर धर्म मर्यादा थी।
ऋषि, तत्वदर्शी थे, यदि लकीर के फकीर और अन्ध-विश्वासी होते तो वर्तमान काल के कूपमंडूक और अन्ध-विश्वासी धर्मध्वजियों में और विश्वामित्रजी में क्या अन्तर रहता। परिस्थितियों की पेचीदगी में धर्म के मूल-तत्व पर उन्हें विचार करना पड़ा। मनुष्य की आत्मोन्नति के लिए धर्म व्यवस्था की रचना विद्वान् पुरुषों ने की है। न कि किसी अनावश्यक बन्धन में बांधकर जीव की स्वाभाविक आत्मोन्नति को रोकने के लिए उन्हें बनाया गया है। यह व्यवस्थाएं आवश्यकतानुसार बदलती हैं और आपत्तिकाल में उन्हें बदलना पड़ता है।
विश्वामित्र ने सोचा कि यदि भोजन जैसी साधारण व्यवस्था के हठ में प्राण चले गये तो यह कोई बुद्धिमानी न होगी। शरीर ईश्वर का मन्दिर है, ईश्वर की आज्ञाओं का संसार में प्रचार करने के लिए इस शरीर का रहना आवश्यक है इसलिये मुझे अभक्ष भोजन करके भी शरीर को जीवित रखना चाहिए। ऐसा निश्चय करके विश्वामित्रजी जैसे भी मिले, जो भी मिले, उसी भोजन को प्राप्त करने के लिए चल दिये।
चलते-चलते कोशिक पुत्र विश्वामित्र एक चाण्डालों के नगर में पहुंचे। अन्न उनके यहां था ही कहां मांस उन लोगों के घर में मौजूद था, पर मांगने से यह लोग कष्टोपार्जित मांस मुफ्त में देने को तैयार न होते। इसलिये दो प्रहर रात्रि व्यतीत होने पर जब सब लोग सो गये तो विश्वामित्र चुपके-चुपके एक चाण्डाल के घर में घुसे और एक मरे हुए कुत्ते की टांग का मांस चुराने लगे।
आहट पाकर घर का मालिक जाग पड़ा। वह कृष्ण वर्ण, दैत्याकार चाण्डाल अपनी लाल-लाल आंखें मलता हुआ उठ बैठा और लाठी लेकर कर्कश स्वर में गर्जना करता हुआ मांस चुराने वाले को मारने के लिए लपका।
आपत्ति को आगे आती हुई देखकर ऋषि ने चिल्लाकर कहा—‘‘अरे भाई, मारना मत, मैं विश्वामित्र हूं।’’ चाण्डाल के पांवों तले से जमीन खिसक गई। उसे सहसा अपने कानों पर विश्वास न हुआ। मेरे घर में और कुत्ते का मांस चुराने के लिए विश्वामित्रजी आवेंगे? यह भला कैसे संभव है। उसने दीपक जलाया और बार-बार आंख खोलकर देखा, यह सचमुच विश्वामित्र ही थे।
चाण्डाल ने कहा—हे ब्रह्मन्! आप यह क्या कर रहे हैं? एक तो चोरी करना पाप, दूसरे चाण्डाल के घर से, इस पर भी कुत्ते का मांस। यह तो तिगुना पाप है। आप तो धर्म के आधार हैं इस पर भी ऐसा कार्य करने को क्योंकर तैयार हो गये? आपको ऐसा करना उचित न था।
विश्वामित्र ने कहा—हे श्वपच! तेरा कहना ठीक है। पर जिस धर्म का तू उपदेश कर रहा है वह साधारण समय के लिए है। आपत्ति काल के लिए आपत्ति धर्म अलग है। यदि कभी दो अत्यन्त बुरे काम सामने आवें जिनमें से एक को किये बिना छुटकारा न मिले तो कम बुरे काम को कर लेना चाहिए। यदि मेरा शरीर मोहग्रस्त अवस्था में केवल मेरा ही होता तो समाज की साधारण व्यवस्था कायम रखने के लिए भी उसे त्यागा जा सकता था, पर अब तो यह शरीर मेरा न रहकर समस्त संसार का हो गया है, यह दिन रात विश्व-कल्याण के कार्यों में लगा रहता है इसलिए इसकी रक्षा के लिए खान-पान संबंधी नियम तोड़ देने में कुछ हर्ज नहीं। किसी महान् कार्य करने में यदि छोटी-मोटी बुराइयां होती हैं तो उनके लिए सोच नहीं करना चाहिए। लोक कल्याण के लिए, पवित्र उद्देश्य से चोरी आदि त्याज्य कर्म भी किये जा सकते हैं और उनका पाप, कर्ता को नहीं लगता।
उपदेश बहुत गम्भीर था। चाण्डाल उसे समझने में समर्थ नहीं हो सका। उसने कहा—ब्रह्मन्! मैं स्वेच्छा से यह नहीं कह सकता कि आप इस कुत्ते की टांग के पास को चुरा ले जाइए। मैं मुंह फेरकर खड़ा हो जाता हूं आप मेरी दृष्टि बचाकर इसे ले जा सकते हैं।
ऋषि ने समझा कि यह अपनी मनोभूमि के अनुसार ठीक ही कहता है। वे उसकी दृष्टि बचाकर कुत्ते की टांग चुरा लाये और उसको पकाकर यज्ञार्पण करके भोजन किया और अपने प्राण बचाये। महाभारत में लिखा है कि उस भोजन की यज्ञाहुति प्राप्त करके देवता लोग बहुत प्रसन्न हुए जिससे तुरन्त ही घनघोर वर्षा होने लगी और दुर्भिक्ष मिट गया। ऋषि के यज्ञ कर्म से पृथ्वी पर खूब अन्न उत्पन्न हुआ और प्रजा के कष्टों का अन्त हो गया।
मोटी बुद्धि के चाण्डाल को कुत्ते का मांस चुराना अधर्म प्रतीत होता था पर ऋषि-दृष्टि और देव-दृष्टि से वह आपत्ति धर्म के अनुसार यज्ञ कार्य था। ऐसे यज्ञ भी सर्वथा पुण्यमय और लोक कल्याणकारी ही होते हैं।
विश्वामित्र ऋषि भी इस भयंकर समय में भूख से पीड़ित होकर इधर-उधर व्याकुल फिरने लगे। करते क्या, अन्न मिलना कठिन था, क्षुधा की पीड़ा से प्राण जाने का प्रश्न उपस्थित हो रहा था। अभक्ष खाने में धर्म जाने का भय था। मन में बड़ा संघर्ष चल रहा था, एक ओर प्राण जाने का भय था दूसरी ओर धर्म मर्यादा थी।
ऋषि, तत्वदर्शी थे, यदि लकीर के फकीर और अन्ध-विश्वासी होते तो वर्तमान काल के कूपमंडूक और अन्ध-विश्वासी धर्मध्वजियों में और विश्वामित्रजी में क्या अन्तर रहता। परिस्थितियों की पेचीदगी में धर्म के मूल-तत्व पर उन्हें विचार करना पड़ा। मनुष्य की आत्मोन्नति के लिए धर्म व्यवस्था की रचना विद्वान् पुरुषों ने की है। न कि किसी अनावश्यक बन्धन में बांधकर जीव की स्वाभाविक आत्मोन्नति को रोकने के लिए उन्हें बनाया गया है। यह व्यवस्थाएं आवश्यकतानुसार बदलती हैं और आपत्तिकाल में उन्हें बदलना पड़ता है।
विश्वामित्र ने सोचा कि यदि भोजन जैसी साधारण व्यवस्था के हठ में प्राण चले गये तो यह कोई बुद्धिमानी न होगी। शरीर ईश्वर का मन्दिर है, ईश्वर की आज्ञाओं का संसार में प्रचार करने के लिए इस शरीर का रहना आवश्यक है इसलिये मुझे अभक्ष भोजन करके भी शरीर को जीवित रखना चाहिए। ऐसा निश्चय करके विश्वामित्रजी जैसे भी मिले, जो भी मिले, उसी भोजन को प्राप्त करने के लिए चल दिये।
चलते-चलते कोशिक पुत्र विश्वामित्र एक चाण्डालों के नगर में पहुंचे। अन्न उनके यहां था ही कहां मांस उन लोगों के घर में मौजूद था, पर मांगने से यह लोग कष्टोपार्जित मांस मुफ्त में देने को तैयार न होते। इसलिये दो प्रहर रात्रि व्यतीत होने पर जब सब लोग सो गये तो विश्वामित्र चुपके-चुपके एक चाण्डाल के घर में घुसे और एक मरे हुए कुत्ते की टांग का मांस चुराने लगे।
आहट पाकर घर का मालिक जाग पड़ा। वह कृष्ण वर्ण, दैत्याकार चाण्डाल अपनी लाल-लाल आंखें मलता हुआ उठ बैठा और लाठी लेकर कर्कश स्वर में गर्जना करता हुआ मांस चुराने वाले को मारने के लिए लपका।
आपत्ति को आगे आती हुई देखकर ऋषि ने चिल्लाकर कहा—‘‘अरे भाई, मारना मत, मैं विश्वामित्र हूं।’’ चाण्डाल के पांवों तले से जमीन खिसक गई। उसे सहसा अपने कानों पर विश्वास न हुआ। मेरे घर में और कुत्ते का मांस चुराने के लिए विश्वामित्रजी आवेंगे? यह भला कैसे संभव है। उसने दीपक जलाया और बार-बार आंख खोलकर देखा, यह सचमुच विश्वामित्र ही थे।
चाण्डाल ने कहा—हे ब्रह्मन्! आप यह क्या कर रहे हैं? एक तो चोरी करना पाप, दूसरे चाण्डाल के घर से, इस पर भी कुत्ते का मांस। यह तो तिगुना पाप है। आप तो धर्म के आधार हैं इस पर भी ऐसा कार्य करने को क्योंकर तैयार हो गये? आपको ऐसा करना उचित न था।
विश्वामित्र ने कहा—हे श्वपच! तेरा कहना ठीक है। पर जिस धर्म का तू उपदेश कर रहा है वह साधारण समय के लिए है। आपत्ति काल के लिए आपत्ति धर्म अलग है। यदि कभी दो अत्यन्त बुरे काम सामने आवें जिनमें से एक को किये बिना छुटकारा न मिले तो कम बुरे काम को कर लेना चाहिए। यदि मेरा शरीर मोहग्रस्त अवस्था में केवल मेरा ही होता तो समाज की साधारण व्यवस्था कायम रखने के लिए भी उसे त्यागा जा सकता था, पर अब तो यह शरीर मेरा न रहकर समस्त संसार का हो गया है, यह दिन रात विश्व-कल्याण के कार्यों में लगा रहता है इसलिए इसकी रक्षा के लिए खान-पान संबंधी नियम तोड़ देने में कुछ हर्ज नहीं। किसी महान् कार्य करने में यदि छोटी-मोटी बुराइयां होती हैं तो उनके लिए सोच नहीं करना चाहिए। लोक कल्याण के लिए, पवित्र उद्देश्य से चोरी आदि त्याज्य कर्म भी किये जा सकते हैं और उनका पाप, कर्ता को नहीं लगता।
उपदेश बहुत गम्भीर था। चाण्डाल उसे समझने में समर्थ नहीं हो सका। उसने कहा—ब्रह्मन्! मैं स्वेच्छा से यह नहीं कह सकता कि आप इस कुत्ते की टांग के पास को चुरा ले जाइए। मैं मुंह फेरकर खड़ा हो जाता हूं आप मेरी दृष्टि बचाकर इसे ले जा सकते हैं।
ऋषि ने समझा कि यह अपनी मनोभूमि के अनुसार ठीक ही कहता है। वे उसकी दृष्टि बचाकर कुत्ते की टांग चुरा लाये और उसको पकाकर यज्ञार्पण करके भोजन किया और अपने प्राण बचाये। महाभारत में लिखा है कि उस भोजन की यज्ञाहुति प्राप्त करके देवता लोग बहुत प्रसन्न हुए जिससे तुरन्त ही घनघोर वर्षा होने लगी और दुर्भिक्ष मिट गया। ऋषि के यज्ञ कर्म से पृथ्वी पर खूब अन्न उत्पन्न हुआ और प्रजा के कष्टों का अन्त हो गया।
मोटी बुद्धि के चाण्डाल को कुत्ते का मांस चुराना अधर्म प्रतीत होता था पर ऋषि-दृष्टि और देव-दृष्टि से वह आपत्ति धर्म के अनुसार यज्ञ कार्य था। ऐसे यज्ञ भी सर्वथा पुण्यमय और लोक कल्याणकारी ही होते हैं।

