दत्तात्रय के चौबीस गुरु
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परम तेजस्वी अवधूत दत्तात्रेय का दर्शन पाकर राजा यदु ने अपने को धन्य माना और विनयावनत होकर पूछा—‘‘धृष्टता क्षमा करें तो एक जिज्ञासा उपस्थिति करूं?’’ अवधूत ने कहा—‘‘राजन्! जो कहना हो निःसंकोच होकर कहो।’’
यदु ने पूछा, ‘‘आपके शरीर, वाणी और भावनाओं से प्रचण्ड तेज टपक रहा है। इस सिद्धावस्था को पहुंचाने वाला ज्ञान आपको जिन सद्गुरु द्वारा मिला हो उनका परिचय मुझे देने का अनुग्रह कीजिए।’’
अवधूत ने कहा—‘‘राजन्! सद्गुरु किसी व्यक्ति विशेष को नहीं मनुष्य के गुणग्राही दृष्टिकोण को कहते हैं। विचारशील लोग सामान्य वस्तुओं और घटनाओं से भी शिक्षा ग्रहण करते और अपने जीवन में धारण करते हैं। अतएव उनका विवेक बढ़ता जाता है। यह विवेक ही सिद्धियों का मूल कारण है। अविवेकी लोग तो ब्रह्मा के समान गुरु को पाकर भी कुछ लाभ नहीं उठा पाते। दूसरा कोई किसी का हित साधन नहीं करता, उद्धार तो अपनी आत्मा के प्रयत्न से ही हो सकता है।’’
‘‘सो हे नर-नायक! मेरे अनेक गुरु हैं। जिनसे भी मैंने ज्ञान और विवेक ग्रहण किया है उन सभी को गुरु मानता हूं। पर उनमें 24 गुरु प्रधान हैं।’’
राजा यदु ने जिज्ञासापूर्वक कहा—‘‘उन 24 सद्गुरुओं का वर्णन करें तो मैं अपने भाग्य को बहुत सराहूंगा।’’
दत्तात्रेय अवधूत बोले—‘‘हे राजन्! पृथ्वी, वायु, गगन, जल, यम, अग्नि, चन्द्र, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, भौंरा, हाथी, हिरन, पिंगला, वेश्या, कौआ, बालक, स्त्री, लुहार, सर्प, मकड़ी और भृंग यही मेरे चौबीस गुरु हैं।’’
उत्सुकतापूर्वक अधिक जानने की इच्छा करने वाले राजा यदु का समाधान करने की दृष्टि से विज्ञानी अवधूत ने और भी कहा—हे पृथ्वीपति! धूप, शीत, वर्षा को धैर्यपूर्वक सहन करने वाली, लोगों द्वारा मलमूत्र त्यागने और पदाघात करने जैसी अभद्रता करने पर भी क्रोध न करने वाली, अपनी कक्षा और मर्यादा पर निरन्तर नियत गति से घूमने वाली पृथ्वी को मैंने गुरु माना और उसके इन सद्गुणों को सीखा।
अचल होकर न बैठना, निरन्तर गतिशील रहना, संतप्तों को सान्त्वना देना, गन्ध को वहन तो करना पर स्वयं निर्लिप्त रहना, यह विशेषता मैंने पवन में पाई और उन्हें सीखकर उसे गुरु माना।
अनन्त और विशाल होते हुए भी, अनेक ब्रह्मांडों को अपनी गोदी में भरे रहने वाले, ऐश्वर्यवान् रहते हुए भी रंच भर अभिमान न करने वाले आकाश का यह गुण मुझे बहुत प्रिय लगा। वही बात स्वयं भी आचरण में लाने का प्रयत्न आरम्भ करते हुये मैंने उसे अपना गुरु वरण किया।
सब को शुद्ध बनाना, सदा सरल और तरल रहना, आतप को शीतलता में परिणत करना, वृक्ष, वनस्पति तक को जीवनदान करना, समुद्र का पुत्र होते हुए भी घर-घर आत्मदान के लिए जा पहुंचना—इतनी अनुकरणीय महानताएं जल में देखीं तो उसे गुरु मानना ही उचित समझा।
अभिवृद्धि पर नियंत्रण करके सन्तुलन स्थिर रखना, अनुपयोगी को हटा देना, मोह के बन्धनों से छुड़ाना, और थके हुओं को अपनी गोद में विश्राम देने के आवश्यक कार्य में संलग्न यम को देखा तो उन्हें भी गुरु बना लिया।
निरन्तर प्रकाशवान रहने वाली, ऊष्मा को आजीवन बनाये रखने वाली, दबाव पड़ने पर भी अपनी लपटें ऊर्ध्वमुख ही रखने वाली, बहुत प्राप्त करके भी संग्रह से दूर रहने वाली, स्पर्श करने वाले को अपना ही रूप बना लेने वाली, समीप रहने वालों को भी प्रभावित करते रहने वाली, अग्नि मुझे आदर्श लगी, अतएव उसे गुरु वरण कर लिया।
अपने पास प्रकाश न होने पर सूर्य से याचना कर पृथ्वी की चांदनी का दान देते रहने वाला परमार्थी चन्द्रमा मुझे सराहनीय लोकसेवक लगा। विपत्ति में सारी कलाएं क्षीण हो जाने पर भी निराश होकर न बैठना और फिर आगे बढ़ने के साहस को बार-बार करते रहना धैर्यवान चन्द्रमा का श्रेष्ठ गुण कितना उपयोगी है यह देखकर मैंने उसे गुरु बनाया।
नियत समय पर अपना नियत कार्य अविचल भाव से निरन्तर करते रहना, स्वयं प्रकाशित होना और दूसरों को प्रकाशित करना, सूर्य का यह सद्गुण इसी योग्य था कि उन्हें गुरु माना जाय।
पेड़ के नीचे बिछे हुए जाल में पड़े दाने देखकर लालची कबूतर आलस्यवश अन्यत्र न गया और उतावली में बिना कुछ सोचे विचारे ललचा गया और जाल में फंसकर अपने प्राण गंवा बैठा। यह देखकर मुझे ज्ञान उपजा कि लोभ से, अविवेक से पतन होता है। जिससे यह मूल्यवान शिक्षा मिली वह कबूतर भी मेरा गुरु ही तो है।
शीतऋतु में अंग जकड़ जाने और वर्षा के कारण मार्ग अवरुद्ध रहने के कारण भूखा अजगर मिट्टी खाकर काम चला रहा था और धैर्यपूर्वक दुर्दिन को सहन कर रहा था। उसी की इस सहनशीलता ने मुझे अपना अनुयायी और शिष्य बना लिया।
नदियों द्वारा निरन्तर असीम जल की प्राप्ति होते रहने पर भी अपनी मर्यादा से आगे न बढ़ने वाला, रत्नराशि के भाण्डागारों का अधिपति होने पर भी न इतराने वाला, स्वयं खारी होने पर भी बादलों को मधुर जल दान करते रहने वाला समुद्र मेरे लिए इतना शिक्षण कर रहा था तो उसे गुरु कैसे न मानता?
लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्राणों की परवाह न करके अग्रसर होने वाला पतंगा जब दीपक की लौ पर जलने लगा तो आदर्श के प्रति उसकी अविचल निष्ठा ने मुझे बहुत प्रभावित किया। जलते पतंगों को जब मैंने गुरु माना तो उसकी आत्मा ने कहा—नश्वर जीवन को महत्व न देते हुए सच्चे आस्थावान के आदर्श के लिए त्याग को उद्यत रहना चाहिए।
पुष्पों का मधुरस संचय करके दूसरों के लिए समर्पण करने की जीवन साधना में लगी हुई मक्खी संसार को सिखा रही थी कि मनुष्य स्वार्थी नहीं परमार्थी बने। मैंने उसका सन्देश सुना और शिष्य भाव से ग्रहण कर लिया। इन उपदेशदात्री देवियों को गुरु ही तो मुझे मानना चाहिए था।
राग में आसक्त भौंरा अपना जीवन-मरण न सोचकर कमल पुष्प पर ही बैठा रहा, रात को हाथी ने वह फूल खाया तो भौंरा भी मृत्यु को प्राप्त हुआ। राग में आसक्त प्राणी किस प्रकार अपने प्राण गंवाता है यह शिक्षा अपने गुरु भौंरा से मैंने सीखी और गांठ बांधली।
कामातुर हाथी मायावी हथनियों द्वारा प्रपंच में फंसाकर बन्धन में बांध दिया गया और फिर आजीवन त्रास भोगता रहा, यह देखकर मैंने वासना के दुष्परिणामों को समझा और उस अविवेकी प्राणी को भी अपना गुरु माना।
कानों के विषय में आसक्त मृग को बधिकों द्वारा पकड़े जाते और जिह्वा की लोलुप मछली को मछुए के जाल में तड़पते देखा तो सोचा कि इन्द्रियलिप्सा के क्षणिक आकर्षण में जीव का कितना बड़ा अहित होता है। इससे बचे रहना ही बुद्धिमानी है। इस प्रकार ये प्राणी भी मेरे गुरु ही ठहरे।
पिंगला वेश्या जब तक युवा रही तब तक उसके अनेक ग्राहक रहे। वृद्ध होते ही वे सब साथ छोड़ गये। रोग और दरिद्र ने उसे घेर लिया। लोक में निन्दा और परलोक में दुर्गति देखकर उसका चित्त निरन्तर खिन्न रहने लगा। उस दुखिया को देखकर मैंने सोचा कि समय चूक जाने पर पछताना ही शेष रह जाता है, सो समय रहते वे सत्कर्म करने चाहिए जिससे पीछे पश्चाताप न करना पड़े। वह दुखियारी पिंगला, जिसने अपना और दूसरों का जीवन पतित बनाया सद्गृहस्थ का आनन्द और पतिव्रता धर्म द्वारा परलोक साधन का व्यवहार गंवाकर बहुत पछता रही थी। उस पश्चाताप से दूसरों को सावधानी का संदेश देने वाली पिंगला भी मेरे गुरु पद पर प्रतिष्ठित हुई।
काक पक्षी किसी पर विश्वास न करके और धूर्तता की नीति अपना कर घाटे में ही रहा। उसे सबका तिरस्कार मिला और अभक्ष खाकर सन्तोष करना पड़ा। यह देखकर मैंने जाना धूर्तता और स्वार्थपरता की नीति अनन्तः हानिकारक ही होती है। यह सिखाने वाला कौआ भी मेरा गुरु ही है।
रागद्वेष, चिन्ता, काम, लोभ, क्रोध आदि दुर्गुण से रहित जीव कितना कोमल सौम्य और सुन्दर लगता है, कितना सुखी और शांत रहता है उसका प्रत्यक्ष दर्शन मुझे अबोध बालक में हुआ और वैसा ही बनने के लिए बच्चे को अपना आदर्श माना तथा उसे भी गुरु कहा।
एक स्त्री चूड़ियां पहने धान कूट रही थी। चूड़ियां आपस में खड़कती थीं। स्त्री चाहती थी कि उसके घर आए मेहमानों को इसका पता न चले। इसलिए उसने हाथों की और चूड़ियां उतार दीं। एक-एक ही रहने दी तो उनका खड़कना भी बन्द हो गया। इस दृश्य को देखकर मैंने सोचा अनेक कामनाओं के रहते मन में संघर्ष उठते रहते थे। पर यदि एक ही लक्ष्य नियत कर लिया जाय तो सभी उद्वेग शांत हो जाये। जिस स्त्री से यह प्रेरणा मिली उसे भी मैं गुरु ही मानता हूं।
लुहार अपनी भट्टी में लोहे के टूटे-फूटे टुकड़े गरम करके हथोड़े की चोट से कई तरह के औजार, उपकरण बना रहा था। उसे देखकर समझ में आया कि निरुपयोगी और कठोर प्रतीत होने वाले मनुष्य भी यदि अपने को तपाने और चोट सहने की तैयारी करलें तो उपयोगी उपकरण बन सकते हैं। लुहार की क्रिया को देखा और उससे जो निष्कर्ष निकला वह गुरु-दीक्षा जैसी प्रेरणा ही थी।
सर्प दूसरों को त्रास देता है और प्रत्युत्तर में सब ओर से त्रास पाता है। यह शिक्षा देने वाला वह दुर्बुद्धिग्रस्त प्राणी यही बताता है कि उद्दण्ड, क्रोधी, आक्रामक और आततायी होना किसी के लिए भी श्रेयस्कर नहीं हो सकता। यह शिक्षा शिरोधार्य करके सर्प को भी मैंने अपना पथ प्रदर्शक ही गिन लिया।
मकड़ी अपने पेट में से रस निकालकर उससे जाला बुन रही थी और जब चाहती थी उसे मुंह में समेटकर फिर पेट में निगल लेती थी। मुझे सूझा कि अपनी दुनिया हर मनुष्य अपनी भावना के अनुरूप ही गढ़ता है और यदि चाहे तो पुराने जाले को समेट कर पेट में रख लेना और नया वातावरण बना लेना भी उसके लिए संभव और सरल हो सकता है। मकड़ी अपनी क्रिया द्वारा मनुष्यों का महत्वपूर्ण पथ-प्रदर्शन करती है, यह देखा तो गुरु भाव से मैंने उसे भी प्रणाम किया।
भृंग कीड़ा एक झींगुर को पकड़कर लाया और अपनी भुनभुनाहट से प्रभावित कर उसे अपने समान बना लिया। यह दृश्य देखकर मैंने सोचा एकाग्रता और तन्मयता की अर्चना कर मनुष्य अपना शारीरिक और मानसिक काया-कल्प कर डालने में भी सफल हो सकता है। इस प्रकार भृंग भी मेरा गुरु ही ठहरा।
चौबीस गुरुओं का वृत्तांत सुनाकर अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु से कहा—गुरु बनाने का उद्देश्य जीवन को प्रगति पथ पर अग्रसर करने वाला प्रकाश प्राप्त करना ही तो है, वह कार्य अपनी गुणग्राहक विवेक बुद्धि के बिना सम्भव नहीं हो सकता। इसलिए सर्व प्रथम गुरु है विवेक और उसके पश्चात् सब ज्ञान प्राप्ति का आधार बनते हैं।
चौबीस गुरुओं का वर्णन महातेजस्वी अवधूत के मुख से सुनकर राजा को बड़ा सन्तोष हुआ ओर उसने अपने को कृतकृत्य माना।
यदु ने पूछा, ‘‘आपके शरीर, वाणी और भावनाओं से प्रचण्ड तेज टपक रहा है। इस सिद्धावस्था को पहुंचाने वाला ज्ञान आपको जिन सद्गुरु द्वारा मिला हो उनका परिचय मुझे देने का अनुग्रह कीजिए।’’
अवधूत ने कहा—‘‘राजन्! सद्गुरु किसी व्यक्ति विशेष को नहीं मनुष्य के गुणग्राही दृष्टिकोण को कहते हैं। विचारशील लोग सामान्य वस्तुओं और घटनाओं से भी शिक्षा ग्रहण करते और अपने जीवन में धारण करते हैं। अतएव उनका विवेक बढ़ता जाता है। यह विवेक ही सिद्धियों का मूल कारण है। अविवेकी लोग तो ब्रह्मा के समान गुरु को पाकर भी कुछ लाभ नहीं उठा पाते। दूसरा कोई किसी का हित साधन नहीं करता, उद्धार तो अपनी आत्मा के प्रयत्न से ही हो सकता है।’’
‘‘सो हे नर-नायक! मेरे अनेक गुरु हैं। जिनसे भी मैंने ज्ञान और विवेक ग्रहण किया है उन सभी को गुरु मानता हूं। पर उनमें 24 गुरु प्रधान हैं।’’
राजा यदु ने जिज्ञासापूर्वक कहा—‘‘उन 24 सद्गुरुओं का वर्णन करें तो मैं अपने भाग्य को बहुत सराहूंगा।’’
दत्तात्रेय अवधूत बोले—‘‘हे राजन्! पृथ्वी, वायु, गगन, जल, यम, अग्नि, चन्द्र, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, भौंरा, हाथी, हिरन, पिंगला, वेश्या, कौआ, बालक, स्त्री, लुहार, सर्प, मकड़ी और भृंग यही मेरे चौबीस गुरु हैं।’’
उत्सुकतापूर्वक अधिक जानने की इच्छा करने वाले राजा यदु का समाधान करने की दृष्टि से विज्ञानी अवधूत ने और भी कहा—हे पृथ्वीपति! धूप, शीत, वर्षा को धैर्यपूर्वक सहन करने वाली, लोगों द्वारा मलमूत्र त्यागने और पदाघात करने जैसी अभद्रता करने पर भी क्रोध न करने वाली, अपनी कक्षा और मर्यादा पर निरन्तर नियत गति से घूमने वाली पृथ्वी को मैंने गुरु माना और उसके इन सद्गुणों को सीखा।
अचल होकर न बैठना, निरन्तर गतिशील रहना, संतप्तों को सान्त्वना देना, गन्ध को वहन तो करना पर स्वयं निर्लिप्त रहना, यह विशेषता मैंने पवन में पाई और उन्हें सीखकर उसे गुरु माना।
अनन्त और विशाल होते हुए भी, अनेक ब्रह्मांडों को अपनी गोदी में भरे रहने वाले, ऐश्वर्यवान् रहते हुए भी रंच भर अभिमान न करने वाले आकाश का यह गुण मुझे बहुत प्रिय लगा। वही बात स्वयं भी आचरण में लाने का प्रयत्न आरम्भ करते हुये मैंने उसे अपना गुरु वरण किया।
सब को शुद्ध बनाना, सदा सरल और तरल रहना, आतप को शीतलता में परिणत करना, वृक्ष, वनस्पति तक को जीवनदान करना, समुद्र का पुत्र होते हुए भी घर-घर आत्मदान के लिए जा पहुंचना—इतनी अनुकरणीय महानताएं जल में देखीं तो उसे गुरु मानना ही उचित समझा।
अभिवृद्धि पर नियंत्रण करके सन्तुलन स्थिर रखना, अनुपयोगी को हटा देना, मोह के बन्धनों से छुड़ाना, और थके हुओं को अपनी गोद में विश्राम देने के आवश्यक कार्य में संलग्न यम को देखा तो उन्हें भी गुरु बना लिया।
निरन्तर प्रकाशवान रहने वाली, ऊष्मा को आजीवन बनाये रखने वाली, दबाव पड़ने पर भी अपनी लपटें ऊर्ध्वमुख ही रखने वाली, बहुत प्राप्त करके भी संग्रह से दूर रहने वाली, स्पर्श करने वाले को अपना ही रूप बना लेने वाली, समीप रहने वालों को भी प्रभावित करते रहने वाली, अग्नि मुझे आदर्श लगी, अतएव उसे गुरु वरण कर लिया।
अपने पास प्रकाश न होने पर सूर्य से याचना कर पृथ्वी की चांदनी का दान देते रहने वाला परमार्थी चन्द्रमा मुझे सराहनीय लोकसेवक लगा। विपत्ति में सारी कलाएं क्षीण हो जाने पर भी निराश होकर न बैठना और फिर आगे बढ़ने के साहस को बार-बार करते रहना धैर्यवान चन्द्रमा का श्रेष्ठ गुण कितना उपयोगी है यह देखकर मैंने उसे गुरु बनाया।
नियत समय पर अपना नियत कार्य अविचल भाव से निरन्तर करते रहना, स्वयं प्रकाशित होना और दूसरों को प्रकाशित करना, सूर्य का यह सद्गुण इसी योग्य था कि उन्हें गुरु माना जाय।
पेड़ के नीचे बिछे हुए जाल में पड़े दाने देखकर लालची कबूतर आलस्यवश अन्यत्र न गया और उतावली में बिना कुछ सोचे विचारे ललचा गया और जाल में फंसकर अपने प्राण गंवा बैठा। यह देखकर मुझे ज्ञान उपजा कि लोभ से, अविवेक से पतन होता है। जिससे यह मूल्यवान शिक्षा मिली वह कबूतर भी मेरा गुरु ही तो है।
शीतऋतु में अंग जकड़ जाने और वर्षा के कारण मार्ग अवरुद्ध रहने के कारण भूखा अजगर मिट्टी खाकर काम चला रहा था और धैर्यपूर्वक दुर्दिन को सहन कर रहा था। उसी की इस सहनशीलता ने मुझे अपना अनुयायी और शिष्य बना लिया।
नदियों द्वारा निरन्तर असीम जल की प्राप्ति होते रहने पर भी अपनी मर्यादा से आगे न बढ़ने वाला, रत्नराशि के भाण्डागारों का अधिपति होने पर भी न इतराने वाला, स्वयं खारी होने पर भी बादलों को मधुर जल दान करते रहने वाला समुद्र मेरे लिए इतना शिक्षण कर रहा था तो उसे गुरु कैसे न मानता?
लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्राणों की परवाह न करके अग्रसर होने वाला पतंगा जब दीपक की लौ पर जलने लगा तो आदर्श के प्रति उसकी अविचल निष्ठा ने मुझे बहुत प्रभावित किया। जलते पतंगों को जब मैंने गुरु माना तो उसकी आत्मा ने कहा—नश्वर जीवन को महत्व न देते हुए सच्चे आस्थावान के आदर्श के लिए त्याग को उद्यत रहना चाहिए।
पुष्पों का मधुरस संचय करके दूसरों के लिए समर्पण करने की जीवन साधना में लगी हुई मक्खी संसार को सिखा रही थी कि मनुष्य स्वार्थी नहीं परमार्थी बने। मैंने उसका सन्देश सुना और शिष्य भाव से ग्रहण कर लिया। इन उपदेशदात्री देवियों को गुरु ही तो मुझे मानना चाहिए था।
राग में आसक्त भौंरा अपना जीवन-मरण न सोचकर कमल पुष्प पर ही बैठा रहा, रात को हाथी ने वह फूल खाया तो भौंरा भी मृत्यु को प्राप्त हुआ। राग में आसक्त प्राणी किस प्रकार अपने प्राण गंवाता है यह शिक्षा अपने गुरु भौंरा से मैंने सीखी और गांठ बांधली।
कामातुर हाथी मायावी हथनियों द्वारा प्रपंच में फंसाकर बन्धन में बांध दिया गया और फिर आजीवन त्रास भोगता रहा, यह देखकर मैंने वासना के दुष्परिणामों को समझा और उस अविवेकी प्राणी को भी अपना गुरु माना।
कानों के विषय में आसक्त मृग को बधिकों द्वारा पकड़े जाते और जिह्वा की लोलुप मछली को मछुए के जाल में तड़पते देखा तो सोचा कि इन्द्रियलिप्सा के क्षणिक आकर्षण में जीव का कितना बड़ा अहित होता है। इससे बचे रहना ही बुद्धिमानी है। इस प्रकार ये प्राणी भी मेरे गुरु ही ठहरे।
पिंगला वेश्या जब तक युवा रही तब तक उसके अनेक ग्राहक रहे। वृद्ध होते ही वे सब साथ छोड़ गये। रोग और दरिद्र ने उसे घेर लिया। लोक में निन्दा और परलोक में दुर्गति देखकर उसका चित्त निरन्तर खिन्न रहने लगा। उस दुखिया को देखकर मैंने सोचा कि समय चूक जाने पर पछताना ही शेष रह जाता है, सो समय रहते वे सत्कर्म करने चाहिए जिससे पीछे पश्चाताप न करना पड़े। वह दुखियारी पिंगला, जिसने अपना और दूसरों का जीवन पतित बनाया सद्गृहस्थ का आनन्द और पतिव्रता धर्म द्वारा परलोक साधन का व्यवहार गंवाकर बहुत पछता रही थी। उस पश्चाताप से दूसरों को सावधानी का संदेश देने वाली पिंगला भी मेरे गुरु पद पर प्रतिष्ठित हुई।
काक पक्षी किसी पर विश्वास न करके और धूर्तता की नीति अपना कर घाटे में ही रहा। उसे सबका तिरस्कार मिला और अभक्ष खाकर सन्तोष करना पड़ा। यह देखकर मैंने जाना धूर्तता और स्वार्थपरता की नीति अनन्तः हानिकारक ही होती है। यह सिखाने वाला कौआ भी मेरा गुरु ही है।
रागद्वेष, चिन्ता, काम, लोभ, क्रोध आदि दुर्गुण से रहित जीव कितना कोमल सौम्य और सुन्दर लगता है, कितना सुखी और शांत रहता है उसका प्रत्यक्ष दर्शन मुझे अबोध बालक में हुआ और वैसा ही बनने के लिए बच्चे को अपना आदर्श माना तथा उसे भी गुरु कहा।
एक स्त्री चूड़ियां पहने धान कूट रही थी। चूड़ियां आपस में खड़कती थीं। स्त्री चाहती थी कि उसके घर आए मेहमानों को इसका पता न चले। इसलिए उसने हाथों की और चूड़ियां उतार दीं। एक-एक ही रहने दी तो उनका खड़कना भी बन्द हो गया। इस दृश्य को देखकर मैंने सोचा अनेक कामनाओं के रहते मन में संघर्ष उठते रहते थे। पर यदि एक ही लक्ष्य नियत कर लिया जाय तो सभी उद्वेग शांत हो जाये। जिस स्त्री से यह प्रेरणा मिली उसे भी मैं गुरु ही मानता हूं।
लुहार अपनी भट्टी में लोहे के टूटे-फूटे टुकड़े गरम करके हथोड़े की चोट से कई तरह के औजार, उपकरण बना रहा था। उसे देखकर समझ में आया कि निरुपयोगी और कठोर प्रतीत होने वाले मनुष्य भी यदि अपने को तपाने और चोट सहने की तैयारी करलें तो उपयोगी उपकरण बन सकते हैं। लुहार की क्रिया को देखा और उससे जो निष्कर्ष निकला वह गुरु-दीक्षा जैसी प्रेरणा ही थी।
सर्प दूसरों को त्रास देता है और प्रत्युत्तर में सब ओर से त्रास पाता है। यह शिक्षा देने वाला वह दुर्बुद्धिग्रस्त प्राणी यही बताता है कि उद्दण्ड, क्रोधी, आक्रामक और आततायी होना किसी के लिए भी श्रेयस्कर नहीं हो सकता। यह शिक्षा शिरोधार्य करके सर्प को भी मैंने अपना पथ प्रदर्शक ही गिन लिया।
मकड़ी अपने पेट में से रस निकालकर उससे जाला बुन रही थी और जब चाहती थी उसे मुंह में समेटकर फिर पेट में निगल लेती थी। मुझे सूझा कि अपनी दुनिया हर मनुष्य अपनी भावना के अनुरूप ही गढ़ता है और यदि चाहे तो पुराने जाले को समेट कर पेट में रख लेना और नया वातावरण बना लेना भी उसके लिए संभव और सरल हो सकता है। मकड़ी अपनी क्रिया द्वारा मनुष्यों का महत्वपूर्ण पथ-प्रदर्शन करती है, यह देखा तो गुरु भाव से मैंने उसे भी प्रणाम किया।
भृंग कीड़ा एक झींगुर को पकड़कर लाया और अपनी भुनभुनाहट से प्रभावित कर उसे अपने समान बना लिया। यह दृश्य देखकर मैंने सोचा एकाग्रता और तन्मयता की अर्चना कर मनुष्य अपना शारीरिक और मानसिक काया-कल्प कर डालने में भी सफल हो सकता है। इस प्रकार भृंग भी मेरा गुरु ही ठहरा।
चौबीस गुरुओं का वृत्तांत सुनाकर अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु से कहा—गुरु बनाने का उद्देश्य जीवन को प्रगति पथ पर अग्रसर करने वाला प्रकाश प्राप्त करना ही तो है, वह कार्य अपनी गुणग्राहक विवेक बुद्धि के बिना सम्भव नहीं हो सकता। इसलिए सर्व प्रथम गुरु है विवेक और उसके पश्चात् सब ज्ञान प्राप्ति का आधार बनते हैं।
चौबीस गुरुओं का वर्णन महातेजस्वी अवधूत के मुख से सुनकर राजा को बड़ा सन्तोष हुआ ओर उसने अपने को कृतकृत्य माना।

