नेक सलाह
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महाभारत का युद्ध आरम्भ हो गया। दुर्योधन अपनी माता गांधारी से आशीर्वाद लेने पहुंचा। गान्धारी ने कहा—पुत्र होने के नाते सहज स्नेह तो तुम्हारे लिए है पर आशीर्वाद तो उन्हीं के लिए है जिनके साथ सत्य और धर्म है।
आंखों पर पट्टी बांध कर अपने अन्धे पति की स्थिति में आजीवन बनी रहने वाली गान्धारी के तप बल का मूल्य दुर्योधन समझता था। उसे आशा थी कि माता का आशीर्वाद मिलने पर मेरी विजय सुनिश्चित हो जायगी पर जब उसे गान्धारी का ऐसा उत्तर मिला तो वह उदास हो गया।
दूसरी बार दुर्योधन ने फिर पूछा—माता, आप आशीर्वाद नहीं दे सकतीं तो मुझे ऐसा उपाय ही बता दीजिए जिससे मेरी जीत हो जाय। गान्धारी ने कहा—बेटा, तुम धर्मराज युधिष्ठिर के पास जाओ और उनसे वह युक्ति पूछो। धर्मात्मा लोग सलाह मांगने वाले शत्रु को भी उसके लाभ की ही सम्मति देते हैं। अपने स्वार्थ के लिए तुम्हारा अहित करने वाली सलाह युधिष्ठिर कदापि न देंगे। तुम निस्संकोच उनके पास चले जाओ। सज्जन किसी के भी शत्रु नहीं होते। वस्तुतः वे हर किसी के लिए मित्र के समान ही उपयोगी होते हैं।
माता की बात मानकर दुर्योधन युधिष्ठिर के पास पहुंचा और अपनी विजय का उपाय पूछने लगा।
भ्राता दुर्योधन का उचित सम्मान करने के साथ युधिष्ठिर ने सलाह दी कि वह गान्धारी के सामने नग्न शरीर होकर उपस्थित हो, और उन्हें एक बार सारे शरीर पर दृष्टिपात करने के लिए मना ले। पति-भक्ति की भावना में आजीवन नेत्रों से पट्टी बांधे रहने के कारण गान्धारी की दृष्टि में अब वह शक्ति आ गई है कि वह जिसे भी एक बार देख ले वह वज्र के समान सुदृढ़ हो जायगा और फिर कोई उसका कुछ बिगाड़ न सकेगा।
यह युक्ति दुर्योधन को बहुत पसंद आई और वह प्रसन्न मन घर लौट आया। माता को उसने इसके लिए मना लिया। दुर्योधन नग्न-बदन उपस्थित हुआ। गान्धारी ने आंखों से पट्टी खोली दुर्योधन का सारा शरीर देखा । देखते-देखते वह सचमुच वज्र जैसा सुदृढ़ हो गया।
दैव दुर्विपाक की प्रबलता ही कहिये कि दुर्योधन लज्जावश कटि वस्त्र पहन कर आया। उसका वह भाग गान्धारी की दृष्टि से छिपा रहा और दुर्बल रह गया। युद्ध में भीम ने उसी मर्म-स्थल पर प्रहार करके दुर्योधन को परास्त किया।
महाभारत समाप्त हुए हजारों वर्ष बीत गये पर यह सनातन तथ्य अभी तक ज्यों का त्यों बना हुआ है कि श्रेष्ठ आत्माएं अपने पराये का भेद न करके सत्य के प्रति ही गान्धारी की तरह शुभ कामना रखती हैं; और युधिष्ठिर की तरह शत्रु को भी केवल नेक सलाह ही देती हैं।
आंखों पर पट्टी बांध कर अपने अन्धे पति की स्थिति में आजीवन बनी रहने वाली गान्धारी के तप बल का मूल्य दुर्योधन समझता था। उसे आशा थी कि माता का आशीर्वाद मिलने पर मेरी विजय सुनिश्चित हो जायगी पर जब उसे गान्धारी का ऐसा उत्तर मिला तो वह उदास हो गया।
दूसरी बार दुर्योधन ने फिर पूछा—माता, आप आशीर्वाद नहीं दे सकतीं तो मुझे ऐसा उपाय ही बता दीजिए जिससे मेरी जीत हो जाय। गान्धारी ने कहा—बेटा, तुम धर्मराज युधिष्ठिर के पास जाओ और उनसे वह युक्ति पूछो। धर्मात्मा लोग सलाह मांगने वाले शत्रु को भी उसके लाभ की ही सम्मति देते हैं। अपने स्वार्थ के लिए तुम्हारा अहित करने वाली सलाह युधिष्ठिर कदापि न देंगे। तुम निस्संकोच उनके पास चले जाओ। सज्जन किसी के भी शत्रु नहीं होते। वस्तुतः वे हर किसी के लिए मित्र के समान ही उपयोगी होते हैं।
माता की बात मानकर दुर्योधन युधिष्ठिर के पास पहुंचा और अपनी विजय का उपाय पूछने लगा।
भ्राता दुर्योधन का उचित सम्मान करने के साथ युधिष्ठिर ने सलाह दी कि वह गान्धारी के सामने नग्न शरीर होकर उपस्थित हो, और उन्हें एक बार सारे शरीर पर दृष्टिपात करने के लिए मना ले। पति-भक्ति की भावना में आजीवन नेत्रों से पट्टी बांधे रहने के कारण गान्धारी की दृष्टि में अब वह शक्ति आ गई है कि वह जिसे भी एक बार देख ले वह वज्र के समान सुदृढ़ हो जायगा और फिर कोई उसका कुछ बिगाड़ न सकेगा।
यह युक्ति दुर्योधन को बहुत पसंद आई और वह प्रसन्न मन घर लौट आया। माता को उसने इसके लिए मना लिया। दुर्योधन नग्न-बदन उपस्थित हुआ। गान्धारी ने आंखों से पट्टी खोली दुर्योधन का सारा शरीर देखा । देखते-देखते वह सचमुच वज्र जैसा सुदृढ़ हो गया।
दैव दुर्विपाक की प्रबलता ही कहिये कि दुर्योधन लज्जावश कटि वस्त्र पहन कर आया। उसका वह भाग गान्धारी की दृष्टि से छिपा रहा और दुर्बल रह गया। युद्ध में भीम ने उसी मर्म-स्थल पर प्रहार करके दुर्योधन को परास्त किया।
महाभारत समाप्त हुए हजारों वर्ष बीत गये पर यह सनातन तथ्य अभी तक ज्यों का त्यों बना हुआ है कि श्रेष्ठ आत्माएं अपने पराये का भेद न करके सत्य के प्रति ही गान्धारी की तरह शुभ कामना रखती हैं; और युधिष्ठिर की तरह शत्रु को भी केवल नेक सलाह ही देती हैं।

