मृत्यु के अग्रदूत
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सृष्टि का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया तो प्रजनन बढ़ते रहने से मनुष्यों की संख्या बहुत बढ़ने लगी। इस अभिवृद्धि से चिन्तित होकर ब्रह्माजी ने अपने तपोबल से मृत्यु को जन्म दिया।
नवोढ़ा युवती के रूप में मृत्यु ने पितामह को प्रणाम किया और अपने जन्म का प्रयोजन उनसे पूछा।
ब्रह्माजी ने अपना अभिप्राय बताया और कहा—मनुष्यों की बढ़ोत्तरी न होने पावे इसलिए तुम उन्हें मार-मार कर परलोक में भेजती रहा करो।
मृत्यु यह वीभत्स कर्म करने को तैयार न थी। निरपराध जीवों का वध करना कितना निर्दयतापूर्ण और कुत्सित है। यह आजीवन ऐसा कर्म कैसे करती रहेगी? नित्य ही असंख्यों का अभिशाप क्यों कर ओढ़ती रहेगी? इस कल्पना ने उसे विचलित कर दिया। वह फूट-फूट कर रोने लगी।
ब्रह्माजी ने उसे बहुत कुछ समझाया कि इसमें तुम्हारा कुछ दोष नहीं, सृष्टि का संतुलन रखने के लिए कर्तव्य समझकर कार्य करो इसमें तुम्हें कुछ भी पाप न लगेगा।
इन उपदेशों का मृत्यु पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा। वह रोती ही रही। और मुंह को हाथों से ढके धेनुकाश्रम के समीप वाले वन में चली गई। वहां जाकर उसने घोर तप करना आरम्भ कर दिया।
ब्रह्माजी का आसन डोला, वे दयार्द्र होकर धेनुकाश्रम पहुंचे और मृत्यु से पूछा—पुत्री! तुम्हारी क्या कामना है? मुझसे कहो।
मृत्यु ने कहा—पितामह मुझसे यह कुत्सित कर्म न हो सकेगा। मैं निर्दोष प्राणियों का वध करूं ऐसी मेरी मनःस्थिति नहीं है। मुझे इस पाप से बचाइये इतना ही आप से चाहती हूं।
ब्रह्माजी असमंजस में पड़ गये। वे करते भी क्या? बढ़ती हुई प्रजा का नियमन किये बिना और कोई मार्ग न था। मृत्यु उसके लिए तैयार न होती थी। निदान उन्हें एक उपाय सूझा और मुसकराते हुए उन्होंने मृत्यु के सामने एक दूसरा विकल्प रख दिया।
प्रजापति ने कहा—मैं आठ काल-दूतों को पृथ्वी पर भेजता हूं। वे मनुष्यों के मन में प्रवेश कर उन्हें भीतर ही भीतर खोखला करते रहेंगे। इनके चंगुल में फंसे रहने के कारण वे अपनी आग में आप ही जलते रहेंगे और इस प्रकार जब वे मरणासन्न हो जायेंगे तो क्लेश से शांति पाने के लिये तुम्हारे सुखकर आश्रय को स्वयं ही ढूंढ़ने लगेंगे। तुम उनको आश्रय दे दिया करना। फिर तुम्हारा कार्य निष्ठुरता का न रह कर दिया और सान्त्वना का बन जायगा।
मृत्यु सन्तुष्ट हो गई। उसने यह कार्य करना स्वीकार कर लिया। प्रजापति ने मृत्यु से उन काल-दूतों का परिचय कराया और बताया कि इनके नाम (1) असंयम (2) आवेश (3) ईर्ष्या (4) लोभ (5) निष्ठुरता (6) अशिष्टता (7) तृष्णा और (8) आलस्य हैं। ये जहां रहेंगे वहां मन्द और तीव्र गति से मनुष्य स्वयं ही मरणासन्न होते रहेंगे।
नवोढ़ा युवती के रूप में मृत्यु ने पितामह को प्रणाम किया और अपने जन्म का प्रयोजन उनसे पूछा।
ब्रह्माजी ने अपना अभिप्राय बताया और कहा—मनुष्यों की बढ़ोत्तरी न होने पावे इसलिए तुम उन्हें मार-मार कर परलोक में भेजती रहा करो।
मृत्यु यह वीभत्स कर्म करने को तैयार न थी। निरपराध जीवों का वध करना कितना निर्दयतापूर्ण और कुत्सित है। यह आजीवन ऐसा कर्म कैसे करती रहेगी? नित्य ही असंख्यों का अभिशाप क्यों कर ओढ़ती रहेगी? इस कल्पना ने उसे विचलित कर दिया। वह फूट-फूट कर रोने लगी।
ब्रह्माजी ने उसे बहुत कुछ समझाया कि इसमें तुम्हारा कुछ दोष नहीं, सृष्टि का संतुलन रखने के लिए कर्तव्य समझकर कार्य करो इसमें तुम्हें कुछ भी पाप न लगेगा।
इन उपदेशों का मृत्यु पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा। वह रोती ही रही। और मुंह को हाथों से ढके धेनुकाश्रम के समीप वाले वन में चली गई। वहां जाकर उसने घोर तप करना आरम्भ कर दिया।
ब्रह्माजी का आसन डोला, वे दयार्द्र होकर धेनुकाश्रम पहुंचे और मृत्यु से पूछा—पुत्री! तुम्हारी क्या कामना है? मुझसे कहो।
मृत्यु ने कहा—पितामह मुझसे यह कुत्सित कर्म न हो सकेगा। मैं निर्दोष प्राणियों का वध करूं ऐसी मेरी मनःस्थिति नहीं है। मुझे इस पाप से बचाइये इतना ही आप से चाहती हूं।
ब्रह्माजी असमंजस में पड़ गये। वे करते भी क्या? बढ़ती हुई प्रजा का नियमन किये बिना और कोई मार्ग न था। मृत्यु उसके लिए तैयार न होती थी। निदान उन्हें एक उपाय सूझा और मुसकराते हुए उन्होंने मृत्यु के सामने एक दूसरा विकल्प रख दिया।
प्रजापति ने कहा—मैं आठ काल-दूतों को पृथ्वी पर भेजता हूं। वे मनुष्यों के मन में प्रवेश कर उन्हें भीतर ही भीतर खोखला करते रहेंगे। इनके चंगुल में फंसे रहने के कारण वे अपनी आग में आप ही जलते रहेंगे और इस प्रकार जब वे मरणासन्न हो जायेंगे तो क्लेश से शांति पाने के लिये तुम्हारे सुखकर आश्रय को स्वयं ही ढूंढ़ने लगेंगे। तुम उनको आश्रय दे दिया करना। फिर तुम्हारा कार्य निष्ठुरता का न रह कर दिया और सान्त्वना का बन जायगा।
मृत्यु सन्तुष्ट हो गई। उसने यह कार्य करना स्वीकार कर लिया। प्रजापति ने मृत्यु से उन काल-दूतों का परिचय कराया और बताया कि इनके नाम (1) असंयम (2) आवेश (3) ईर्ष्या (4) लोभ (5) निष्ठुरता (6) अशिष्टता (7) तृष्णा और (8) आलस्य हैं। ये जहां रहेंगे वहां मन्द और तीव्र गति से मनुष्य स्वयं ही मरणासन्न होते रहेंगे।

