हमारी वसीयत और विरासत (भाग 64): प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्यक्षेत्र का निर्धारण
अब मथुरा जाने की तैयारी थी। एक बार दर्शन की दृष्टि से मथुरा देखा तो था, पर वहाँ किसी से परिचय न था। चलकर पहुँचा गया और ‘अखण्ड ज्योति’ प्रकाशन के लायक एक छोटा मकान किराए पर लेने का निश्चय किया।
मकानों की उन दिनों भी किल्लत थी। बहुत ढूँढ़ने के बाद भी आवश्यकता के अनुरूप मिल नहीं रहा था। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते घीया मंडी जा निकले। एक मकान खाली मिला। बहुत दिन से खाली पड़ा था। मालकिन एक बुढ़िया थी। किराया पूछा, तो उसने पंद्रह रुपया बताया और चाबी हाथ में थमा दी। भीतर घुसकर देखा, तो उसमें छोटे-बड़े कुल पंद्रह कमरे थे। था तो जीर्ण-शीर्ण पर एक रुपया कमरे के हिसाब से वह मँहगा किसी दृष्टि से न था। हमारे लिए काम-चलाऊ भी था। पसंद आ गया और एक महीने का किराया पेशगी पंद्रह रुपया हाथ पर रख दिए। बुढ़िया बहुत प्रसन्न थी।
घर जाकर सभी सामान ले आए और पत्नी-बच्चों समेत उसमें रहने लगे। सारे मुहल्ले में कानाफूसी होते सुनी। मानो, हमारा वहाँ आना कोई आश्चर्य का विषय हो। पूछा, तो लोगों ने बताया कि, ‘‘यह भुतहा मकान है। इसमें जो भी आया, जान गँवाकर गया। कोई टिका नहीं। हमने तो कितनों को ही आते और धन-जन की भारी हानि उठाकर भागते हुए देखा। आप बाहर के नए आदमी हैं, इसलिए धोखे में आ गए। अब बात आपके कान में डाल दी। यदि ऐसा न होता तो तीन मंजिला 15 कमरों का मकान वर्षों से क्यों खाली पड़ा रहता? आप समझ-बूझकर भी उसमें रह रहे हैं। नुकसान उठाएँगे।’’
इतना सस्ता और इतना उपयोगी मकान अन्यत्र मिल नहीं रहा था। हमने तो उसी में रहने का निश्चय किया। भुतहा होने की बात सच थी। रात भर छत के ऊपर धमा-चौकड़ी मचती रहती। ठठाने की, रोने की, लड़ने की आवाजें आतीं। उस मकान में बिजली तो थी नहीं। लालटेन जलाकर ऊपर गए, तो कुछ स्त्री-पुरुष-आकृतियाँ आगे, कुछ पीछे भागते दीखे, पर साक्षात् भेंट नहीं हुई। न उन्होंने हमें कोई नुकसान ही पहुँचाया। ऐसा घटनाक्रम कोई दस दिन तक लगातार चलता रहा।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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