हमारी वसीयत और विरासत (भाग 126): तपश्चर्या— आत्मशक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य
रामकृष्ण परमहंस के सामने यही स्थिति आई थी। उन्हें व्यापक काम करने के लिए बुलाया गया। योजना के अनुसार उनने अपनी क्षमता विवेकानंद को सौंप दी तथा उनने कार्यक्षेत्र को सरल और सफल बनाने के लिए आवश्यक ताना-बाना बुन देने का कार्य सँभाला। इतना बड़ा काम वे मात्र स्थूलशरीर के सहारे कर नहीं पा रहे थे। सो उनने उसे निःसंकोच छोड़ भी दिया। बैलेंस से अधिक वरदान देते रहने के कारण उन पर ऋण भी चढ़ गया था। उसकी पूर्ति के बिना गाड़ी रुकती। इसलिए स्वेच्छापूर्वक कैंसर का रोग भी ओढ़ लिया। इस प्रकार ऋणमुक्त होकर विवेकानंद के माध्यम से उस कार्य में जुट गए, जिसे करने के लिए उनकी निर्देशक सत्ता ने उन्हें संकेत किया था। प्रत्यक्षतः रामकृष्ण तिरोहित हो गए। उनका अभाव खटका, शोक भी बना, पर हुआ वह, जो श्रेयस्कर था। दिवंगत होने के उपरांत उनकी सामर्थ्य हजार गुनी अधिक बढ़ गई। इसके सहारे उनने देश एवं विश्व में अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन किया। जीवनकाल से वे भक्तजनों को थोड़ा-बहुत आशीर्वाद देते रहे और एक विवेकानंद को अपना संग्रह सौंपने में समर्थ हुए, पर जब उन्हें सूक्ष्म और कारणशरीर से काम करने का अवसर मिल गया, तो उनसे उत्तरी क्षेत्रों में इतना काम किया जा सका, जिसका लेखा-जोखा ले सकना, सामान्य स्तर की जाँच-पड़ताल से समझ सकना संभव नहीं।
ईसा की जीवनचर्या भी ऐसी ही है। वे जीवन भर में बहुत दौड़-धूप के उपरांत मात्र 13 शिष्य बना सके। देखा कि स्थूलशरीर की क्षमता से उतना बड़ा काम न हो सकेगा, जितना वे चाहते हैं। ऐसी दशा में यही उपयुक्त समझा कि सूक्ष्मशरीर का अवलंबन कर संसार भर में ईसाई मिशन फैला दिया जाए। ऐसे परिवर्तनों के समय महापुरुष पिछला हिसाब-किताब साफ करने के लिए कष्टसाध्य मृत्यु का वरण करते हैं। ईसा का क्रूस पर चढ़ना, सुकरात का विष पीना, कृष्ण को तीर लगना, पांडवों का हिमालय में गलना, गांधी का गोली खाना, आद्य शंकराचार्य को भगंदर होना, यह बताता है कि अगले महान प्रयोजनों के लिए जिन्हें स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करना होता है, वे उपलब्ध शरीर का इस प्रकार अंत करते हैं, जिसे बलिदान स्तर का— प्रेरणा प्रदान करने वाला और अपने चलते समय का पवित्रता, प्रखरता प्रदान करने वाला कहा जा सके। हमारे साथ भी यही हुआ है व आगे होना है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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