हमारी वसीयत और विरासत (भाग 127): स्थूल का सूक्ष्मशरीर में परिवर्तन— सूक्ष्मीकरण
युग-परिवर्तन की यह एक ऐतिहासिक वेला है। इन बीस वर्षों में हमें जमकर काम करने की ड्यूटी सौंपी गई थी। सन् 1980 से लेकर अब तक के पाँच वर्षों में जो काम हुआ है, पिछले 30 वर्षों की तुलना में कहीं अधिक है। समय की आवश्यकता के अनुरूप तत्परता बरती गई और खपत को ध्यान में रखते हुए तदनुरूप शक्ति उपार्जित की गई है। यह वर्ष कितनी जागरूकता, तन्मयता, एकाग्रता और पुरुषार्थ की चरम सीमा तक पहुँचकर व्यतीत करने पड़े हैं, उनका उल्लेख उचित न होगा; क्योंकि इस तत्परता का प्रतिफल 2400 प्रज्ञापीठों और 15000 प्रज्ञा-संस्थानों के निर्माण के अतिरिक्त और कुछ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। एक कड़ी हर दिन एक फोल्डर लिखने की इसमें और जोड़ी जा सकती है, शेष सब कुछ परोक्ष है। परोक्ष का प्रत्यक्ष लेखा-जोखा किस प्रकार संभव हो?
युगसंधि की वेला में अभी पंद्रह वर्ष और रह जाते हैं। इस अवधि में गतिचक्र और भी तेजी से भ्रमण करेगा। एक ओर उसकी गति बढ़ानी होगी, दूसरी ओर रोकनी। विनाश को रोकने और विकास को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ेगी। दोनों ही गतियाँ इन दिनों मंथर हैं। इस हिसाब से सन् 2000 तक उस लक्ष्य की उपलब्धि न हो सकेगी, जो अभीष्ट है। इसलिए सृष्टि के प्रयास-चक्र निश्चित रूप से तीव्र होंगे। उसमें हमारी भी गीध-गिलहरी जैसी भूमिका है। काम कौन, कब, क्या, किस प्रकार करे— यह बात आगे की है। प्रश्न जिम्मेदारी का है। युद्धकाल में जो जिम्मेदारी सेनापति की होती है, वही खाना पकाने वाले की भी है। आपत्तिकाल में उपेक्षा कोई भी नहीं बरत सकता।
इस अवधि में एक साथ कई मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़नी होगी। समय ऐसे भी आते हैं, जब खेत की फसल काटना, जानवरों को चारा लाना, बीमार लड़के का इलाज कराना, मुकदमे की तारीख पर हाजिर होना, घर आए मेहमान का स्वागत करना, जैसे कई काम एक ही आदमी को एक ही समय पर करने होते हैं। युद्धकाल में तो बहुमुखी चिंतन और उत्तरदायित्व और भी अधिक सघन तथा विरल हो जाता है। किस मोर्चे पर कितने सैनिक भेजना है; जो लड़ रहे हैं, उनके लिए गोला-बारूद कम न पड़ने देना; रसद का प्रबंध रखना; अस्पताल का दुरुस्त होना; मरे हुए सैनिकों को ठिकाने लगाना; अगले मोर्चे के लिए खाइयाँ खोदना, जैसे काम बहुमुखी होते हैं। सभी पर समान ध्यान देना होता है। एक में भी चूक होने से बात बिगड़ जाती है। करा-धरा चौपट हो जाता है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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