हमारी वसीयत और विरासत (भाग 129): स्थूल का सूक्ष्मशरीर में परिवर्तन— सूक्ष्मीकरण
यह स्थिति शरीर त्यागते ही हर किसी को उपलब्ध हो जाए, यह संभव नहीं। भूत-प्रेत चले तो सूक्ष्मशरीर में जाते हैं, पर वे बहुत ही अनगढ़ स्थिति में रहते हैं। मात्र संबंधित लोगों को ही अपनी आवश्यकताएँ बताने भर के कुछ दृश्य कठिनाई से दिखा सकते हैं। पितरस्तर की आत्माएँ उनसे कहीं अधिक सक्षम होती हैं। उनका विवेक एवं व्यवहार कहीं अधिक उदात्त होता है। इसके लिए उनका सूक्ष्मशरीर पहले से ही परिष्कृत हो चुका होता है। सूक्ष्मशरीर को उच्चस्तरीय क्षमतासंपन्न बनाने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। वे तपस्वी स्तर के होते हैं। सामान्य काया को सिद्धपुरुष स्तर की बनाने के लिए अगला कदम सूक्ष्मीकरण का है। सिद्घपुरुष अपनी काया की सीमा में रहकर जो दिव्य क्षमता अर्जित कर सकते हैं; कर लेते हैं, उसी से दूसरों की सेवा-सहायता करते हैं, किंतु शरीर विकसित कर लेने वाले उन सिद्धियों के भी धनी देखे गए हैं, जिन्हें योगशास्त्र में अणिमा, महिमा, लघिमा आदि कहा गया है। शरीर का हलका, भारी, दृश्य, अदृश्य हो जाना, यहाँ से वहाँ जा पहुँचना, प्रत्यक्ष शरीर के रहते हुए संभव नहीं; क्योंकि शरीरगत परमाणुओं की संरचना ही ऐसी नहीं है, जो पदार्थ विज्ञान की सीमा-मर्यादा से बाहर जा सके। कोई मनुष्य हवा में नहीं उड़ सकता और न पानी पर चल सकता है। यदि ऐसा कर सका होता तो उसने वैज्ञानिकों की चुनौती अवश्य स्वीकार की होती और प्रयोगशाला जाकर विज्ञान के प्रतिपादनों में एक नया अध्याय अवश्य ही जोड़ता। किंवदंतियों के आधार पर कोई किसी से इस स्तर की सिद्धियों का बखान करने भी लगे, तो उसे अत्युक्ति ही माना जाएगा। अब प्रत्यक्ष को प्रमाणित किए बिना किसी की गति नहीं।
प्रश्न सूक्ष्मीकरण-साधना का है, जो हम इन दिनों कर रहे हैं। यह एक विशेष साधना है, जो स्थूलशरीर के रहते हुए भी की जा सकती है और उसे त्यागने के उपरांत भी करनी पड़ती है। दोनों ही परिस्थितियों में यह स्थिति बिना अतिरिक्त प्रयोग-पुरुषार्थ के— तप-साधना के— संभव नहीं हो सकती। इसे योगाभ्यास— तपश्चर्या का अगला चरण कहना चाहिए।
इसके लिए किसे क्या करना होता है, यह उसके वर्तमान स्तर एवं उच्चस्तरीय मार्गदर्शन पर निर्भर होता है। सबके लिए एक पाठ्यक्रम नहीं हो सकता। किंतु इतना अवश्य है कि अपनी शक्तियों का बहिरंग अपव्यय रोकना पड़ता है। अंडा जब तक पक नहीं जाता, तब तक एक खोखले में बंद रहता है। इसके बाद वह इस छिलके को तोड़कर चलने-फिरने और दौड़ने-उड़ने लगता है। लगभग यही अभ्यास सूक्ष्मीकरण के हैं, जो हमने पिछले दिनों किए हैं। प्राचीनकाल में गुफा सेवन, समाधि आदि का प्रयोग प्रायः इसी निमित्त होता था।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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