पूज्य गुरुदेव की लेखनी साहित्य ही नहीं भाग्य भी रचती है
कुछ व्यक्तित्व केवल इतिहास नहीं रचते, वे जीवन गढ़ते हैं। पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ऐसे ही दिव्य अवतारी पुरुष थे, जिनकी लेखनी, दृष्टि और आशीर्वाद से असंख्य जीवनों की धारा बदल गई। यह कथा मेरे जीवन की एक ऐसी ही अनुभूति है, जो आज भी श्रद्धा और कृतज्ञता से हृदय को भर देती है।
मेरे पति पहले से ही पूज्य गुरुदेव माता जी की सेवा में गायत्री तीर्थ शान्तिकुंज में निवास कर रहे थे। मैं अपने छोटे बेटे और परिवार के साथ गाँव में रहती थी। कुछ समय बाद मैं और मेरा छोटा बेटा कुछ दिनों के लिए शान्तिकुंज आए। बेटे का मन अपने पिता के साथ रहने को बहुत करता था और जैसे ही वह शान्तिकुंज के दिव्य वातावरण में पहुँचा, उसका मन यहाँ गहराई से रम गया।
एक स्टीकर और एक बाल-हठ
एक दिन मेरा बेटा पूज्य गुरुदेव के सद्विचारों वाला एक स्टीकर लेकर आया। उस पर लिखा था—
“गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमें संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।”
उसने वह स्टीकर अपने पिता को दिखाते हुए कहा,
“यह आपके गुरुदेव ने लिखा है, अब मुझे भी आपके साथ शान्तिकुंज में ही रहना है। मैं अब गांव नहीं जाऊंगा”
मेरे पति ने शांत भाव से कहा,
“बेटा! यहाँ रहने के लिए पहले गुरुदेव से अनुमति लेनी होगी।”
बेटे का उत्तर उतना ही सरल था—
“तो पूछ लीजिए।”
पढ़ाई नहीं, संगीत में मन
मेरे बेटे का मन पढ़ाई में अधिक नहीं लगता था। उसका झुकाव गाजे-बाजे, विशेषकर हारमोनियम बजाने की ओर था। हम परिवार सहित पूज्य गुरुदेव के दर्शन हेतु गए और बेटे की इच्छा उनके चरणों में रखी।
पूज्य गुरुदेव ने स्नेह और गंभीरता से कहा,
“अभी पढ़ाई करो।”
हमने विनम्रतापूर्वक पुनः निवेदन किया,
“गुरुदेव, इसका मन पढ़ाई में नहीं लगता, लेकिन बाजा (हारमोनियम) से बहुत लगाव है।”
एक घेरा, एक वाक्य—और जीवन परिवर्तन
पूज्य गुरुदेव ने मेरे बेटे को अपने पास बिठाया। उनकी करुणामयी उपस्थिति आज भी स्मृति में जीवंत है। उन्होंने अपनी कलम से बेटे की आँखों के सामने एक घेरा बनाते हुए कहा—
“चारों तरफ़ से ध्यान हटाकर पढ़ाई में मन लगाओ।”
वह क्षण साधारण नहीं था। वह केवल एक निर्देश नहीं, बल्कि चेतना का बीजारोपण था।
आशीर्वाद का प्रत्यक्ष फल
कुछ ही दिनों बाद हम गाँव लौट आए और हमारे साथ में आया पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद। धीरे-धीरे मेरे बेटे का मन पढ़ाई में लगने लगा। केवल लगने ही नहीं लगा, बल्कि उसने अपने पिता द्वारा बनाई गई घर की लाइब्रेरी में रखी लगभग सभी पुस्तकें पढ़ डालीं। उन पुस्तकों में पूज्य गुरुदेव की द्वारा लिखित पुस्तकों की बहुतायत थी।
ज्ञान, संस्कार और साधना—तीनों का समन्वय उसके जीवन में स्पष्ट दिखाई देने लगा।
आज वही बालक अनेक डिप्लोमा और डिग्रियाँ प्राप्त कर चुका है और अत्यंत सुसंस्कृत, आत्मनिर्भर तथा गरिमामय ढंग से अपना जीवन यापन कर रहा है।
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