कृपा कथा: एक शिष्य की कलम से वंदनीया माता जी की कृपा का चमत्कार
परम वंदनीया माता जी की दिव्य वाणी से उद्घोषित देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत चलाए जा रहे अश्वमेध महायज्ञों की शृंखला गुजरात के वरोडा तक पहुँच गई। मैं और मेरे जैसे हजारों कार्यकर्ता इस महायज्ञ में सेवा को अपना सौभाग्य मानकर, अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर तत्परता से जुटे हुए थे।
महायज्ञ हेतु साधन जुटाने के लिए मैं बलसाड़ से वरोडा आता-जाता रहता था। मेरा परिवार भी वरोडा अश्वमेध में उपस्थित था। मेरी बड़ी बेटी भोजनालय में अचानक किसी कारणवश वह धक्का खाकर खौलते हुए कड़ाहे में गिर गई। तुरंत ही आसपास उपस्थित लोगों ने तत्परता दिखाते हुए उसे कड़ाहे से बाहर निकाला, लेकिन तब तक वह गंभीर रूप से जल चुकी थी।
मैं उस समय अश्वमेध के काम से बलसाड़ गया हुआ था। रात दो बजे जब मैं लौटा और बेटी की हालत देखी, तो मैंने तुरंत शांतिकुंज में फोन लगाया। जवाब मिला: “आप अपने काम में जुटे रहें, गुरुदेव और माता जी पर विश्वास रखें, बच्ची की चिंता उन पर छोड़ दें।“ मैं वहीं रहकर अपना काम करता रहा और साथ ही बेटी का इलाज भी कराता रहा।
जब वरोडा अश्वमेध में परम वंदनीया माता जी का आगमन हुआ, तो सबसे पहला बुलावा मेरे परिवार को ही मिला। हम सपरिवार माता जी की शरण में पहुँचे। माता जी ने मेरी बेटी को अपनी गोद में बिठाया, उसके जले हुए अंगों पर धीरे-धीरे हाथ फिराया और कहा: “इसकी चिंता मत करो, यह ठीक हो जाएगी।“ और वास्तव में, तीसरे दिन से ही नई त्वचा बनने लगी। आश्चर्यजनक रूप से, उसकी स्वास्थ्य स्थिति इतनी तीव्र गति से सुधरी कि कुछ ही दिनों में वह पूरी तरह स्वस्थ हो गई।
आज उन दिनों को याद करते हुए, वंदनीया माता जी के प्रति श्रद्धा से मेरा दिल भर आता है और स्वयं ही अश्रुधारा बहने लगती है। उनके कृपालु स्पर्श और आशीर्वाद ने उस कठिन समय में मेरे परिवार को अपार विश्वास और साहस दिया। कितनी कृपालु हैं परम वंदनीया माता जी!
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