हमारी वसीयत और विरासत (भाग 149): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का संकल्प पूरा करने में यदि प्रज्ञापरिजन उत्साहपूर्वक प्रयत्न करें तो इतना साधारण निश्चय इतने बड़े जनसमुदाय के लिए तनिक भी कठिन नहीं होना चाहिए। उसकी पूर्ति में कोई अड़चन दीखती भी नहीं है। उन्हें देवालय की प्रतिष्ठा दी जाएगी। बिहार के हजारी किसान ने हजार आम्र-उद्यान निज के बलबूते खड़े करा दिए थे, तो कोई कारण नहीं कि एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का उद्देश्य पूरा न हो सके। इनकी पौध शान्तिकुञ्ज से देने का भी निश्चय किया गया है और हर प्रज्ञापुत्र को कहा गया है कि वह अशोक-वाटिका लगाने-लगवाने में किसी प्रकार की कमी न रहने दें। उसके द्वारा वायुशोधन का होने वाला कार्य शाश्वत शास्त्रसम्मत यज्ञ के समतुल्य ही समझें। अग्निहोत्र तो थोड़े समय ही कार्य करता है, पर यह पुनीत वृक्ष उसी कार्य को निरंतर चिरकाल तक करता रहता है।
4. हर गाँव एक युगतीर्थ— जहाँ श्रेष्ठ कार्य होते रहते हैं, उन स्थानों की अर्वाचीन अथवा प्राचीन गतिविधियों को देखकर आदर्शवादी प्रेरणा प्राप्त होती है, ऐसे स्थानों को तीर्थ कहते हैं। जिन दर्शनीय स्थानों की श्रद्धालुजन तीर्थयात्रा करते हैं, उन स्थानों एवं क्षेत्रों के साथ कोई ऐसा इतिहास जुड़ा है, जिससे संयमशीलता, सेवाभावना का स्वरूप प्रदर्शित होता है। प्रस्तुत तीर्थों में कभी ऋषि-आश्रम रहे हैं; गुरुकुल-आरण्यक चले हैं और परमार्थ संबंधी विविध कार्य होते रहे हैं।
इन दिनों प्रख्यात तीर्थ थोड़े-से ही हैं। वहाँ पर्यटकों की धकापेल भर रहती है। पुण्य प्रयोजनों का कहीं अता-पता नहीं। इन परिस्थितियों में तीर्थभावना को पुनर्जीवित करने के लिए सोचा यह गया है कि भारत के प्रत्येक गाँव को एक छोटे तीर्थ के रूप में विकसित किया जाए। ग्राम से तात्पर्य यहाँ शहरों से द्वेष या उपेक्षा भाव रखना नहीं है, वरन् पिछड़ेपन की औसत रेखा से नीचे वाले वर्ग को प्रधानता देना है। मातृभूमि का हर कण देवता है; गाँव और झोंपड़ा भी। आवश्यकता इस बात की है कि उन पर छाया पिछड़ापन धो दिया जाए और सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना की जाए। इतने भर से वहाँ बहुत कुछ उत्साहवर्द्धक, प्रेरणाप्रद और आनंददायक मिल सकता है। ‘हर गाँव— एक तीर्थ’ योजना का उद्देश्य है— ग्रामोत्थान, ग्रामसेवा, ग्रामविकास। इस प्रचलन के लिए घोर प्रयत्न किया जाए और उस परिश्रम को ग्रामदेवता की पूजा माना जाए। यह तीर्थ-स्थापना हुई, जिसे स्थानीय निवासी और बाहर के सेवाभावी उद्बोधनकर्त्ता मिल-जुलकर पूरा कर सकते हैं। पिछड़ेपन के हर पक्ष से जूझने और प्रगति के हर पहलू को उजागर करने के लिए आवश्यक है कि गाँवों की सार्थक पदयात्राएँ की जाएँ; जनसंपर्क साधा जाए और युगचेतना का अलख जगाया जाए।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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