हमारी वसीयत और विरासत (भाग 150): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
हर गाँव को एक तीर्थ रूप में विकसित करने के लिए तीर्थयात्रा टोलियाँ निकालने की योजना है। पदयात्रा को साइकिल यात्रा के रूप में मान्यता दी है। चार साइकिल सवारों का एक जत्था पीले वस्त्रधारण किए, गले में पीला झोला लटकाए, साइकिलों पर पीले रंग के कमंडलु टाँगे प्रवास-चक्र पर निकलेगा। यह प्रवास न्यूनतम एक सप्ताह के, दस दिन के, पंद्रह दिन के अथवा अधिक-से-अधिक एक महीने के होंगे। जिनका निर्धारण पहले ही हो चुका होगा। यात्रा जहाँ से आरंभ होगी, एक गोलचक्र पूरा करती हुई वहीं समाप्त होगी। प्रातःकाल जलपान करके टोली निकलेगी। रास्ते के सहारे वाली दीवारों पर आदर्शवाक्य लिखती चलेगी। छोटी बालटियों में रंग घुला होगा। सुंदर अक्षर लिखने का अभ्यास पहले से ही कर लिया गया होगा।1. हम बदलेंगे— युग बदलेगा। 2. हम सुधरेंगे— युग सुधरेगा। 3. नर और नारी एक समान— जाति-वंश सब एक समान। वाक्यों की प्रकाशित शृंखलाएँ, जो जहाँ उपयुक्त बैठे, वहाँ उन्हें ब्रुश से लिखते चलना चाहिए।
रात्रि को जहाँ ठहरना निश्चय किया हो, वहाँ शंख-घड़ियालों से गाँव की परिक्रमा लगाई जाए और ऐलान किया जाए कि अमुक स्थान पर तीर्थयात्रीमंडली के भजन-कीर्तन होंगे।
गाँव में एक दिन के कीर्तन में जहाँ सुगम संगीत से उपस्थितजनों को आह्लादित किया जाएगा, वहाँ उन्हें यह भी बताया जाएगा कि गाँव को सज्जनता और प्रगति की प्रतिमूर्ति बनाया जा सकता है। प्रौढ़शिक्षा, बाल संस्कारशाला, स्वच्छता, व्यायामशाला, घरेलू शाक-वाटिका, परिवार नियोजन, नशाबंदी, मितव्ययिता, सहकारिता, वृक्षारोपण आदि सत्प्रवृत्तियों की महिमा और आवश्यकता बताते हुए यह बताया जाए कि इन सत्प्रवृत्तियों को मिल-जुलकर किस प्रकार कार्यान्वित किया जा सकता है और उन प्रयत्नों का कैसे भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।
संभव हो, तो सभा के अंत में उत्साही प्रतिभा वाले लोगों की एक समिति बना दी जाए, जो नियमित रूप से समयदान-अंशदान देकर इन सत्प्रवृत्तियों को कार्यान्वित करने में जुटे। गाँव की एकता और पवित्रता का ध्वज अशोक वृक्ष के रूप में दूसरे दिन प्रातःकाल स्थापित किया जाए। यह देव प्रतिमा उपयोगिता और भावना की दृष्टि से अतीव उपयोगी है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
Recent Post
होली का संदेश (होली विशेषांक— 2)
अनावश्यक और हानिकार वस्तुओं को हटा देने और मिटा देने को हिंदू धर्म में बहुत ही महत्त्वपूर्ण समझा गया है। और इस दृष्टिकोण को क्रियात्मक रूप देने के लिए होली का त्यौहार बनाया गया है। रास्तों में फैले...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 150): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
Read More
हमारी होली (होली विशेषांक— 1)
मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनाएँ और साथ ही यह भी चिंतन करें कि जिसकी यह छाया है, उस अखंड आनंद को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग-युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहा...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 149): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का संकल्प पूरा करने में यदि प्रज्ञापरिजन उत्साहपूर्वक प्रयत्न करें तो इतना साधारण निश्चय इतने बड़े जनसमुदाय के लिए तनिक भी कठिन नहीं होना चाहिए। उसकी पूर्ति में कोई अड़चन दीखत...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 148): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
जीवन की बहुमुखी समस्याओं का समाधान, प्रगति-पथ पर अग्रसर होने के रहस्य भरे तत्त्वज्ञान के अतिरिक्त इसी अवधि में भाषण, कला, सुगम संगीत, जड़ी-बूटी उपचार, पौरोहित्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, गृह-उद्योगों का स...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 147): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
Read More
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 146): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक-एक लाख की पाँच शृंखलाएँ सँजोने का संकेत हुआ। उसका तात्पर्य है— कली से कमल बनने की तरह खिल पड़ना। अब हमें इस जन्म की पूर्णाहुति में पाँच हव्य सम्मिलित करने पड़ेंगे। वे इस प्रकार हैं—
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 145): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
हमारे निजी जीवन में भगवत्कृपा निरंतर उतरती रही है। चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने का अत्यंत कठोर साधनाक्रम उन्हीं दिनों से लाद दिया गया जब दुधमुँही किशोरावस्था भी पूरी नहीं हो पाई थी। इसके बा...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 144): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
बड़ी और कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर ही किसी की महिमा और गरिमा का पता चलता है। प्रतिस्पर्द्धाओं में उत्तीर्ण होने पर ही पदाधिकारी बना जाता है। खेलों में बाजी मारने वाले ही पुरस्कार पाते हैं। खरे...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 143): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
वर्तमान समस्याएँ एकदूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ संबंध है। चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव; बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएँ। एक को सुल...

.jpg)
