गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 4)
साकार उपासना में गायत्री को माता के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। माता होते हुए भी उसका स्वरूप नवयौवना के रूप में दो कारणों से रखा गया है। एक तो इसलिए कि देवत्व को कभी वार्धक्य नहीं सताता। सतत् उसका यौवन रूपी उभार ही झलकता रहता है। सभी देवताओं की प्रतिमाओं में उन्हें युवा सुदर्शन रूप में ही दर्शाया जाता है। यही बात देवियों का चित्रण करते समय भी ध्यान में रखी जाती है और उन्हें किशोर निरूपित किया जाता है। दूसरा कारण यह है कि युवती के प्रति भी विकार भाव उत्पन्न न होने देने- मातृत्व की परिकल्पना परिपक्व करते चलने के लिये उठती आयु को इस अभ्यास के लिये सर्वोपयुक्त माना गया है। कमलासन पर विराजमान होने का अर्थ है- कोमल, सुगन्धित, उत्फुल्ल कमल पुष्प जैसे विशाल में उसका निवास होने की संगति बिठाना। यही है विभिन्न रूपों में उसकी उपासना का तात्विक दर्शन।
स्त्रियों को गायत्री का अधिकार है या नहीं, यह आशंका सभी उठाते देखे जाते हैं- धर्माचार्य भी तथा शोषक पुरुष समुदाय भी। वस्तुतः नर और नारी भगवान के दो नेत्र, दो हाथ, दो कान, दो पैर के समान मनुष्य जाति के दो वर्ग हैं। दोनों की स्थिति गाड़ी के दो पहियों की तरह मिल-जुलकर चलने और साथ-साथ सहयोग करने की है। दोनों कर्त्तव्य और अधिकार समान हैं। प्रजनन प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए एक का कार्य क्षेत्र परिवार, दूसरे का उपार्जन- उत्तरदायित्व इस रूप में बँट गए हैं। इस पर भी वह कोई विभाजन रेखा नहीं है। सामाजिक, आर्थिक, साहित्य, राजनीति आदि में किसी भी वर्ग पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। इसी प्रकार धर्म-अध्यात्म क्षेत्र में- साधना-उपासना के क्षेत्र में भी दोनों को स्वभावतः समान अधिकार प्राप्त हैं।
नर और नारी को- सवर्ण और असवर्ण को ऊंचा-नीचा मानना, एक को अधिकारी- दूसरे को अनधिकारी ठहराने का प्रचलन मध्यकालीन अन्धकार युग की देन है। उसमें समर्थों ने असमर्थों को पैरों तले रौंदने, उनसे मनमाने लाभ उठाने और विरोध की आवाज न उठा सकने के लिए जहाँ डण्डे का उपयोग किया, वहाँ पण्डिताऊ प्रतिपादन भी लालच या भय दिखाकर अपने समर्थन में प्राप्त कर लिये। शूद्रों को- स्त्रियों को नीचा या अनधिकारी ठहराने के पीछे मात्र एक ही दुरभि सन्धि है कि समर्थों को मनमाने लाभ मिलते रहें और किसी विरोध- प्रतिरोध का सामना न करना पड़े।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 47
Recent Post
होली का संदेश (होली विशेषांक— 2)
अनावश्यक और हानिकार वस्तुओं को हटा देने और मिटा देने को हिंदू धर्म में बहुत ही महत्त्वपूर्ण समझा गया है। और इस दृष्टिकोण को क्रियात्मक रूप देने के लिए होली का त्यौहार बनाया गया है। रास्तों में फैले...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 150): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
Read More
हमारी होली (होली विशेषांक— 1)
मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनाएँ और साथ ही यह भी चिंतन करें कि जिसकी यह छाया है, उस अखंड आनंद को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग-युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहा...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 149): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का संकल्प पूरा करने में यदि प्रज्ञापरिजन उत्साहपूर्वक प्रयत्न करें तो इतना साधारण निश्चय इतने बड़े जनसमुदाय के लिए तनिक भी कठिन नहीं होना चाहिए। उसकी पूर्ति में कोई अड़चन दीखत...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 148): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
जीवन की बहुमुखी समस्याओं का समाधान, प्रगति-पथ पर अग्रसर होने के रहस्य भरे तत्त्वज्ञान के अतिरिक्त इसी अवधि में भाषण, कला, सुगम संगीत, जड़ी-बूटी उपचार, पौरोहित्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, गृह-उद्योगों का स...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 147): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
Read More
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 146): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक-एक लाख की पाँच शृंखलाएँ सँजोने का संकेत हुआ। उसका तात्पर्य है— कली से कमल बनने की तरह खिल पड़ना। अब हमें इस जन्म की पूर्णाहुति में पाँच हव्य सम्मिलित करने पड़ेंगे। वे इस प्रकार हैं—
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 145): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
हमारे निजी जीवन में भगवत्कृपा निरंतर उतरती रही है। चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने का अत्यंत कठोर साधनाक्रम उन्हीं दिनों से लाद दिया गया जब दुधमुँही किशोरावस्था भी पूरी नहीं हो पाई थी। इसके बा...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 144): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
बड़ी और कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर ही किसी की महिमा और गरिमा का पता चलता है। प्रतिस्पर्द्धाओं में उत्तीर्ण होने पर ही पदाधिकारी बना जाता है। खेलों में बाजी मारने वाले ही पुरस्कार पाते हैं। खरे...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 143): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
वर्तमान समस्याएँ एकदूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ संबंध है। चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव; बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएँ। एक को सुल...

.jpg)
