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Magazine - Year 1957 - Version 2

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शुद्ध साधनों से ही श्रेष्ठ कार्य किये जा सकते हैं।

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(स्वामी विवेकानन्द)

मनुष्य अपने जीवन में जो अनेक पाठ पढ़ता है, उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ पाठ यह है कि हमें साधनों के विषय में भी उतना ही सावधान रहना चाहिये, जितना कि उसके लक्ष्य के विषय में। सच पूछा जाय तो सब प्रकार की सफलताओं की कुँजी इसी तत्त्व में है- साधनों की ओर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि सिद्धि की ओर।

हमारे जीवन में एक बड़ा दोष यह है कि हम ध्येय पर ही अधिक ध्यान दिया करते हैं। हमारे लिये ध्येय इतना अधिक आकर्षक होता है, ऐसा मोहक होता और हमारे मन पर इतना प्रभाव डालता है कि अन्य सूक्ष्म विषय हमारी नजर से निकल जाते हैं। लेकिन असफलता मिलने पर हम यदि बारीकी से उसकी छानबीन करें तो निन्यानवे प्रतिशत यही पायेंगे कि उसका कारण साधनों की ओर ध्यान न देना ही था। हमें आवश्यकता है अपने साधनों को मजबूत बनाने की और उन्हें पूर्ण रूप से कार्यक्षम बनाने के लिये उनकी ओर अधिक ध्यान देने की। यदि हमारे साधन बिल्कुल ठीक हैं, तो ध्येय की प्राप्ति होगी ही। हमको यह याद रखना चाहिये कि कारण ही कार्य का जन्म दाता है, कार्य आप ही आप पैदा नहीं हो सकता। और जब तक कारण बिलकुल ठीक, योग्य और सूक्ष्म न होंगे, कार्य का उत्पत्ति न होगी। एक बार हमने ध्येय निश्चित कर लिया और उसके साधन पक्के कर लिये, तो फिर हम ध्येय का ख्याल करीब-करीब छोड़ दे सकते हैं, क्योंकि इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि अगर साधन दोषहीन हैं, तो साध्य कहीं नहीं जाता। जब कारण विद्यमान हैं तो कार्य की उत्पत्ति होगी ही, उसके बारे में विशेष चिन्ता की आवश्यकता नहीं। कार्य है ध्येय की सिद्धि और कारण हैं साधन। इसलिये साधन की ओर ध्यान देते रहना जीवन का एक बड़ा रहस्य है। गीता में भी यही कहा गया है कि हमें लगातार भरसक काम करते ही जाना चाहिये, काम चाहे कोई भी हो, अपना पूरा मन उस ओर लगा देना चाहिये, पर साथ ही ध्यान रहे कि हम उसमें आसक्त न हो जायें।

किन्तु होता यह है कि हम कोई बात हाथ में लेते हैं और अपनी पूरी ताकत उसमें लगा देते हैं। कभी-कभी वह बात असफल होती है, पर फिर भी हम उसका त्याग नहीं कर सकते। यह आसक्ति ही हमारे दुःख का सबसे बड़ा कारण है। यदि ऐसा न होता तो हमारा जीवन हरा-भरा रहता। दुख का एक मात्र कारण यही है कि हम आसक्त हैं, हम बंधते चले जा रहे हैं। इसीलिये गीता में कहा है- ‘काम करते रहो, पर उनमें आसक्त न होओ, बन्धन में मत पड़ो।’ ज्ञानी पुरुष अपनी सम्पूर्ण लगन प्रेम की वस्तु पर लगा सकता है और फिर भी अनासक्त रह सकता है। और तभी उसे सच्चे सुख की प्राप्ति हो सकती है।

भिखारी कभी सुखी नहीं होता। उसे केवल भीख ही मिलती है और वह भी दया और तिरस्कार से युक्त। उसके पीछे कम से कम यह कल्पना तो अवश्य होती है कि भिखारी एक निकृष्ट जीव है। जो कुछ वह पाता है उसका सच्चा उपभोग उसे कभी नहीं मिलता। हम सब भिखारी हैं जो कुछ हम करते हैं, उसके बदले में हम कुछ चाह रखते हैं। हम लोग व्यापारी हैं, हम जीवन के व्यापारी हैं, गुणों के व्यापारी हैं, धर्म के व्यापारी हैं। अफसोस! हम प्यार के भी व्यापारी हैं।

किसी वस्तु के लिये प्रार्थना मत करो। बदले में कोई चाह न रखो। तुम्हें जो कुछ देने को हो, दे दो। वह तुम्हारे पास वापस आ जायेगा, लेकिन आज ही उसका विचार मत करो। वह हजार गुना होकर वापस आयेगा, पर तुम अपनी दृष्टि उधर मत रखो। देने की ताकत पैदा करो। दे दो और बस काम खतम हो गया। यह बात जान लो कि सम्पूर्ण जीवन दान-स्वरूप है, प्रकृति तुम्हें देने के लिये बाध्य करेगी। इस लिये स्वेच्छा पूर्वक दो। एक न एक दिन तुम्हें सर्वस्व दे देना ही पड़ेगा। जो व्यक्ति इस नियम के विरुद्ध व्यवहार करने का जितना अधिक प्रयत्न करता है, उतना ही अधिक वह दुखी होता है।

इसलिये भिखारी मत बनो। अनासक्त रहो। जीवन का यही एक अत्यन्त कठिन कार्य है। पर मार्ग की आपत्तियों के सम्बन्ध में वृथा सोचते मत रहो। कल्पना शक्ति द्वारा आपत्तियों का चित्र खड़ा करने से भी तुम्हें उनका सच्चा ज्ञान नहीं होता, जब तक कि तुम उनका प्रत्यक्ष अनुभव न करो। चाहे हमें प्रत्येक कार्य में असफलता मिले, हमारे टुकड़े-टुकड़े हो जायें और खून की धार बहने लगे, फिर भी हमें अपना हृदय थामकर रखना होगा। इन आपत्तियों में ही अपने ईश्वरत्व की हमें घोषणा करनी होगी।

इसमें संदेह नहीं कि ये आपत्तियाँ बड़ी भयानक होती हैं और उनके कारण सौ में से नब्बे तो निराश हो धैर्य खो बैठते हैं। वे प्रायः निराशावादी हो जाते हैं और प्रेम तथा सच्चाई में विश्वास रखना छोड़ देते हैं। जो कुछ दिव्य एवं भव्य है उस पर से भी उनका विश्वास उठ जाता है। इसीलिये हम देखते हैं कि जो मनुष्य जीवन के आरम्भ में क्षमाशील, दयालु, सरल और निष्पाप थे, बुढ़ापे में झूठे और पाखंडी बन जाते हैं। उनके मन जटिलताओं से भर जाते हैं। यह आवश्यक है कि हम ऐसी अवस्था से बचें, पर इनसे बचने के लिये अति दैवी शक्ति की जरूरत है। अतिमानवी शक्ति पर्याप्त नहीं। केवल उसी के बल पर हम इन उलझनों और जटिलताओं से, आपत्तियों की इन बौछारों में से बिना झुलसे पार जा सकते हैं।

यह बहुत कठिन है, पर यह कठिनाई लगातार अभ्यास द्वारा दूर की जा सकती है। हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि जब तक हम अपने आपको दुर्बल न बनायें, तब तक हम पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ सकता। जब तक शरीर रोग के अनुकूल न होगा हमें कोई रोग नहीं हो सकता। रोग होना केवल कीटाणुओं पर ही अवलम्बित नहीं है, पर शरीर की पूर्वानुकूलता पर भी है। हमें वही मिलता है जिसके हम पात्र हैं। आओ, हम अपना अभिमान छोड़ दें और यह समझ लें कि हम पर आयी हुई कोई आपत्ति ऐसी नहीं है, जिसके हम पात्र न थे। ऐसी कोई बुराई नहीं है, जो हमने स्वयं अपने हाथों न बुलाई हो। इसका हमें ज्ञान होना चाहिये। तुम आत्म निरीक्षण करके देखो, तो पाओगे कि ऐसी एक भी चोट तुम्हें नहीं लगी, जो स्वयं तुम्हारी ओर से न की गई हो। आधा काम तुमने किया और आधा बाहरी दुनिया ने, और इस तरह तुम्हें चोट लगी। यह विचार हमें शान्त बना देगा और साथ ही इस निरीक्षण से आशा की आवाज आयेगी कि ‘बाह्य जगत् पर मेरा नियन्त्रण भले न हो, पर जो मेरे अन्दर है, जो मेरे अधिक निकट है, वह मेरा अंतर्जगत मेरे अधिकार में है। यदि इन दोनों के संयोग से ही असफलता होती है, यदि चोट लगने के लिये इन दोनों का इकट्ठा होना जरूरी है, तो मेरे अधिकार में जो दुनिया है उसे मैं न छोड़ूँगा फिर देखूँगा कि कैसे चोट लगती है? यदि मैं स्वयं पर सच्चा प्रभुत्व पा जाऊँ, तो चोट कभी लग ही नहीं सकती।

हेम बचपन से ही सर्वदा अपने से बाहर किसी दूसरी वस्तु पर दोष मढ़ने का प्रयत्न किया करते हैं। हम सदा दूसरों के सुधार में तत्पर रहते हैं, पर अपने सुधार में नहीं। यदि हम दुःखी होते हैं तो चिल्लाते हैं- “यह तो शैतान की दुनिया है।” हम दूसरों को दोष देते हैं और कहते हैं कि “ये कैसे मोह-ग्रस्त पागल हैं।” पर यदि हम सचमुच इतने अच्छे हैं तो हम ऐसी दुनिया में रहते ही क्यों हैं? यदि यह शैतान की दुनिया है, तो हम भी शैतान ही हैं, नहीं तो हम यहाँ क्यों रहते? “ओह! संसार के लोग कितने स्वार्थी हैं”- यह सच है, पर यदि हम उनसे अच्छे हैं तो हमारा उनसे सम्बन्ध कैसे हुआ?

जो हमारे योग्य हैं, वही हम पाते हैं। जब हम कहते हैं कि दुनिया बुरी है और हम अच्छे हैं, तो यह सरासर झूठ है। ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। यह एक भीषण असत्य है, जिससे हम स्वयं अपने को भ्रम में डालते हैं।

हमें स्वयं अपनी ही चिन्ता करनी चाहिये और यही हम कर सकते हैं। हमें कुछ समय तक दूसरों की ओर ध्यान देने का ख्याल छोड़ देना चाहिये। अगर हम अपने साधनों को शुद्ध-पूर्ण बना लेंगे, तो फिर साध्य अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा। क्योंकि दुनिया तभी पवित्र और अच्छी हो सकती है, जब हम स्वयं पवित्र और अच्छे होंगे।

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