नवीन सामाजिक रचना कैसे हो?
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(श्री सत्यभक्त, पूर्व सम्पादक ‘चाँद’)
हमारे देश में स्वराज्य की स्थापना हुए दस वर्ष हो चुके, पर अभी तक यहाँ का राजनीतिक, सामाजिक ढाँचा नहीं बदल सका है। कुछ नाम मात्र के सुधार, परिवर्तन अवश्य हुये हैं, पर अभी तक उस आर्थिक राजनीतिक, सामाजिक क्राँति के लक्षण कहीं दिखलाई नहीं पड़ते जिसकी लोग पहले कल्पना किया करते थे। वही नौकरशाही, वही आतंक से काम लेने वाली पुलिस, वही लोगों को निकम्मा बनाने वाली शिक्षा और बी.ए., एम.ए. की निकम्मी डिग्रियां, वे ही कारखानों में पिसने वाले मजदूर और वे ही अपनी थैलियों को प्रतिदिन बढ़ाते जाने वाले मालिक-सभी कुछ बदस्तूर कायम है। हम इससे इनकार नहीं करते कि प्रत्येक क्षेत्र में सरकार ने सुधार की कोशिश की है और दो-दो, चार-चार तरह के सुधार कर दिखाये हैं, पर इन सबको क्रान्ति या कायापलट के नाम से नहीं पुकारा जा सकता, जिसकी कि आवश्यकता समाज हितैषी एक मुद्दत से अनुभव कर रहे थे। हम सोचा करते थे कि स्वराज्य प्राप्त होने पर गरीबों का शोषण पूर्णतः बन्द हो जायेगा, छोटे बड़े का अन्तर लुप्त होने लगेगा, एक घर में बच्चे रोटी के लिये तरसें और दूसरे में कुत्तों को दूध, मलाई खिलाई जा रही है, ऐसा दृश्य न दिखलायी पड़ेगा और सब लोग वास्तविक अर्थों में न्याययुक्त अधिकार पाकर भाइयों की तरह सौहार्द पूर्वक रहने लगेंगे। पर खेद है कि बहुत कुछ नई बातें देखने सुनने पर, अरबों की लागत के पहाड़ सोद्देश्य बाँधों को तैयार होते देखकर, देश में मोटर, रेलवे, इंजिन, हवाई जहाज जैसी बड़ी चीजों के विशाल कारखाने खड़े होते देख लेने पर भी वह चीज नहीं दिखलाई पड़ रही है जिससे मनुष्यों में घुसी हुई स्वार्थ और अन्याय की भावनायें दूर हो सकतीं और वे नैतिक और आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर होकर एक दूसरे के कल्याण के लिये प्रयत्नशील दिखलाई पड़ते।
इस परिस्थिति को देखकर देश के कितने ही विचारकों को बड़ी निराशा हो रही है और वे कहते हैं कि 15 अगस्त 1947 के दिन को हम ‘स्वतंत्रता-दिवस’ समझें या ‘परतंत्रता-दिवस?’ क्योंकि इसके पहले तो हम अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिये प्रयत्न भी करते थे और सफलता के लिये त्याग तथा बलिदान करने को भी प्रस्तुत रहते थे। पर अब तो लोगों ने प्रत्येक बात की जिम्मेदारी सरकार पर ही छोड़ दी है और स्वयं स्वार्थ-साधन में फंसे हैं। यदि यही दशा बनी रही तो थोड़े समय बाद हम देखेंगे कि देश अग्रसर होने के बजाय पिछड़ता जा रहा है और अपने मानवोचित गुणों से वंचित होकर पूँजीवादी देशों का अनुकरण करते हुए शोषण के नये-नये मार्ग निकाल रहा है। इस सम्बन्ध में विचार करते हुए श्री जयप्रकाश नारायण ने कहा है-
“गाँधी जी के विचार मानने वालों के दो पक्ष हो गये हैं। एक पक्ष राज्य संचालन में लगा और दूसरे पक्ष के लोग अपनी-अपनी रचनात्मक प्रवृत्तियों में लगे रहे। केवल ऊपर से समाज बदलने की कोशिश की जाय तो शक्ति व्यर्थ जाती है और उसमें से नौकरशाही का निर्माण होता है। हमारे देश में कुछ उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ ही है। रेलें, सिन्द्री की खाद का कारखाना, चितरंजन ऐंजिन उद्योग आदि ये सब मुनाफे के लिये नहीं हैं, जनता की सरकार के हाथों में हैं। परन्तु इनकी आन्तरिक व्यवस्था में कोई अन्तर नहीं है। पूँजीपतियों के पास संचालकों का बोर्ड होता है वैसा ही इन कारखानों में सरकारी अफसरों का बोर्ड होता है, जो कारखाने की व्यवस्था करता है। ऊंचे अफसर हैं ऊंची तनख्वाह है, मजदूर हैं, साधारण वेतन पाते हैं। पर यह हमारा भविष्य का नक्शा नहीं था। नक्शा यह था कि हमारे उद्योग मजदूर चलायेंगे, जनता चलाएगी। नीचे के मजदूर को कम तनख्वाह मिलेगी और अफसर को उससे 100 गुना अधिक मिलेगा, यह नहीं सोचा था। वैधानिक भाषा में इसको राज्य- पूँजीवाद या ‘स्टेट-सोशलिज्म’ कह सकते हैं। अब यह सोचना कि यह दोष उन लोगों का है जो इस समय सत्ताधीश बने हैं, तो यह ठीक नहीं। अगर शासन-सत्ता समाजवादी पार्टी के हाथ आ जाय तो भी ऐसी ही विषमता चलेगी। रूस में भी मजदूर और अन्य कई कार्यों के संचालकों के वेतन में 80 गुना अन्तर है।”
इस अवस्था का सुधार तभी संभव है जबकि शासन सत्ता वास्तविक परिश्रम करने वालों के हाथ में आवे और प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ही क्यों न हो परिश्रम करना अनिवार्य हो। ऐसा होने से ही वर्तमान वातावरण का अंत होकर ऐसा नवीन वातावरण तैयार होगा जिसमें मनुष्य अपनी मेहनत का पूरा फल प्राप्त कर सकेगा और उसे अन्न-वस्त्र की चिन्ता न रहेगी। इस सम्बन्ध में संत विनोबा ने लिखा है-
“अन्तिम आदर्श तो यह होना चाहिये कि देश का प्राइम मिनिस्टर तीन या चार घंटे खेती का काम करे और बाकी बचे समय में दूसरा काम करे, जिस का जिम्मा उसने लिया है। इससे देश की पवित्रता बढ़ेगी, आरोग्यता बढ़ेगी। उच्च-नीचता का भाव मिट जायेगा, जमीन को अनेक सेवक मिलेंगे, सब की बुद्धिमत्ता का लाभ मिलेगा। सबको समान धर्म और संस्कृति का लाभ मिलेगा। यह तो अन्याय होगा कि कुछ लोगों से कहा जाता है कि तुम खेती करो और कुछ लोगों से कहा जाय कि तुम अन्य काम करो। हमने अभ्यास के वास्ते आठ घंटे बुनाई, कताई आदि का काम किया था। पर यदि आज कोई मुझे आठ घंटा बुनने को मजबूर करे तो मैं अवश्य इनकार करूंगा। मैं कहूँगा मैं इसके लिये तैयार नहीं हूँ कि एक कमरे में बन्द होकर, जहाँ हवा नहीं है, हाथ को कुछ खास व्यायाम न मिले और कमर भी टूट जाय, इसके लिये मैं तैयार नहीं हूँ। चार घंटा मुझे आकाश सेवन का मौका मिलना चाहिये। यह मेरा हक है। मुझसे तो अगर कोई कहे कि तू प्रोफेसर बनकर छः घंटा काम कर, तुझे पाँच हजार रुपया तनख्वाह मिलेगी, परन्तु खेती पर काम करने का मौका नहीं मिलेगा, तो मैं स्वीकार नहीं करूंगा। मैं कहूँगा कि मुझे चार घंटा खेती में काम करना है और बाकी बचे हुए समय में मैं शिक्षक का काम करूंगा। उसके लिये मुझे पैसा नहीं चाहिये। खेती में काम करके जो मिलेगा उतना ही मैं लूँगा।”
इन नेताओं ने देश को एक नई दिशा में कदम बढ़ाने का संकेत किया है। वास्तव में जब तक श्रम की महिमा बढ़ाई न जायेगी और सिक्के का चलन कम न किया जायेगा। तब तक पूँजीवाद का घट सकना कठिन है। यद्यपि पहले जमाने में भारत में समाजवाद जैसा कोई आन्दोलन न था। पर न तो शोषण के लिये बहुत बड़े कारखाने खोले जाते थे और न सिक्के की ही भरमार थी इसलिये, गरीबों का काम भी सुविधापूर्वक चल जाता था और अमीरों की संख्या भी नाममात्र को ही रहती थी। ज्यादातर व्यक्ति एक ही दर्जे के होते थे। अब भी यदि अधिकाँश व्यक्ति खेती करके अपने खाने का अन्न पैदा कर लें और कपड़ा भी अपने गाँव या मोहल्ले में बनवा लें तो आर्थिक विषमता की समस्या बहुत कुछ हल हो सकती है और उसके हल हो जाने पर राजनीतिक और सामाजिक दशा में भी समुचित परिवर्तन हो सकता है।

