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Magazine - Year 1957 - Version 2

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राज-धर्म-शास्त्र का अन्तिम रहस्य

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(डॉ. भगवान दास जी)

राज्य अथवा शासन का नियन्त्रण किस प्रकार रखा जाय यह एक बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। आज कल प्रजातंत्र शासन में भी इस समस्या का कोई उचित मार्ग नहीं निकल सका है। इस प्रकार के शासनों में भी प्रायः सबसे अधिक योग्य व्यक्तियों का शासन होने के बजाय कुछ चलते-पुर्जे या शक्तिशाली व्यक्तियों के गुट को प्रधानता मिल जाती है और शासन-व्यवस्था करते समय अधिक ध्यान अपने दल वालों का ही रखते हैं। इसके फलस्वरूप न तो जनता में संतोष का भाव उत्पन्न हो पाता है और न सबको न्यायानुसार जीवन-निर्वाह की सुविधायें ही प्राप्त हो सकती हैं।

हिन्दू-शास्त्र कारों ने समाज की न्यायानुकूल व्यवस्था के लिये ही चार वर्णों की स्थापना की थी और उनके कर्तव्यों का इस प्रकार विभाजन किया था कि कोई भी अनीति के मार्ग का अवलम्बन करके समाज में अव्यवस्था और असंतोष उत्पन्न न कर सके। उस काल में भी समय-समय पर कुछ अविचारी अथवा उच्छृंखल प्रकृति के व्यक्ति पैदा हो जाते थे, पर समाज का सजीव-संगठन उनके विपरीत कार्यों का प्रतिरोध करता और उनको उचित रास्ते पर ले आता।

समाज के इस प्रकार के विभाजन की आवश्यकता प्रत्येक देश अथवा राष्ट्र को पड़ती है, क्योंकि इसके बिना अराजकता अथवा अव्यवस्था की स्थिति का उत्पन्न हो जाना अनिवार्य है। पुराने उदाहरणों को छोड़ दीजिये सबसे नवीन सामाजिक व्यवस्था वाले और क्राँतिकारी कहे जाने वाले रूस ने भी अपने संघ-राज्य का नाम ‘दी वर्कर्स’, सोल्जर्स पेजेन्टस सोवियेट ऑफ रशिया’ रखा है। इसका अर्थ होता है, रूस के कर्मकारों, योद्धाओं और किसानों का पंचायती राज्य ‘कर्मकारों या श्रम जीवियों के स्वभावतः दो विभाग होते हैं- एक बुद्धि से काम करने वाले और दूसरे शरीर से। इस प्रकार रूस के कम्यूनिस्ट समाज को भी विवश होकर वे ही चार अंग मानने पड़े और नाम भी उनके पुराने से ही हैं। इस्लाम धर्म की सभ्यता के शब्दों में इनको (1) आलिम (विद्वान) (2) आमिल (कार्यकर्ता) (3) ताजिर व्यापारी (4) मददगार (सहायक) कहते हैं इन विभागों के लिये संस्कृत भाषा में जो ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि नाम रखे गये हैं, उनसे तो हम सुपरिचित हैं। पर काल के प्रवाह में वे इतनी दूर बह गये हैं कि अति प्रसिद्ध होते हुए भी अब उनको निरर्थक ही समझना चाहिये। अब उनकी जगह कुछ नये नाम बनाये जायें तभी काम चल सकता है, जैसे शिक्षक, रक्षक, पोषक, सहायक- अथवा ज्ञानी, शूर, दानी, समर्थक- अथवा शास्त्री, शस्त्री, धनी, अनुचारय आदि। वर्तमान स्थिति में वर्ण व्यवस्था का स्वरूप जो नितान्त अन्धकाराच्छन्न हो गया है, वह इसी प्रकार कोई सार्थक परिवर्तन करने से पुनः प्रकाश में आ सकता है।

कुछ लोग यह शंका उठाते हैं कि प्रजा का यह विभाजन कौन करेगा और कौन इस बात का निर्णय करेगा कि निर्दिष्ट व्यक्ति में उक्त गुण और योग्यता है या नहीं? इस विषय के धर्म का, कानून का प्रवर्तन और आचरण कैसे किया जायेगा? जो लोग अपने कर्तव्य का पालन न करके समाज का अहित करेंगे उनको दण्ड कैसे दिया जायेगा?

इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि इस प्रकार की शंका प्रत्येक नियम या संगठन के विषय में की जा सकती है। और यह सत्य भी है कि किसी भी धर्म या कानून के पूर्ण रूप से पालन किये जाने की गारन्टी कोई नहीं कर सकता। भारतवर्ष के शासकों की आरे से ‘दण्ड-विधान’ (पीनलकोड) का निर्माण बड़े परिश्रम के साथ किया जा चुका हैं और उसकी एक-एक धारा की सूक्ष्म व्याख्या के लिये कानून के पोथे भरे पड़े हैं, पर तो भी पाप (जुर्म) होते ही हैं। चाहे कुछ भी व्याख्या की जाय बहुत सा भरोसा अधिकारियों (सरकारी नौकरों) की सद्बुद्धि और ईमानदारी पर करना ही पड़ता है। कानून का अमल उनकी अकल और नीयत पर निर्भर रहता ही है- उनके विवेक और निर्णय पर छोड़ा ही जाता है। इसलिये समाज संगठन का एक मूल-विधान ‘काँस्टीट्यूशन’ समस्त जनता मिलकर तैयार कर देती है और फिर उसी के आधार पर भिन्न-भिन्न विषयों के नियम बनाकर समाज-व्यवस्था को प्रचलित रखा जाता है। इस सम्बन्ध में भारतीय स्मृतिकारों का मत है-

“स राजा पुरुषो दण्ड........ धर्मस्य प्रतिभूस्मृतः (मनु.)

“माना कि कोई व्यक्ति धर्म के विरुद्ध आचरण करे तो ‘स्वराज-विधान’ के अनुसार नियुक्त अधिकारी उसका नियंत्रण करे। यदि नीचे का अधिकारी उचित कार्य न करे तो उच्च अधिकारी दण्ड-प्रयोग करे। यदि उच्च अधिकारी (राजा या प्रधान या प्रेसीडेण्ट) अन्याय-मार्ग में चले तो ‘धर्म-परिषद’ उसका निग्रह करे।” ‘शुक्रनीति’ (अ. 2 श्लोक 77-79) में कहा गया है-

यत्कोपभीत्या राजाऽपि धर्म नीतिरतो भवेत्। सैवाचार्यः पुरोधाः यः शापानुग्रहयो क्षमः।।

“पुरोहित वही है जो राजा का भी निग्रह और अनुग्रह यथोचित कर सके। जिसके कोप के भय से राजा, धर्मनीति पर ही, कानून की मर्यादा के अनुसार ही चले।” मनु ने भी कहा है-

क्षत्रस्याति प्रवृद्धस्य ब्रह्मणानति वर्त्ततः। ब्रह्मैव संनियंतृस्यात् क्षत्रं हि ब्रह्म संभवमः।।

“यदि कर्म प्रधान अधिकारी वर्ग (क्षत्री) सैनिक शक्ति (मिलिटरिज्म) पर उतारू हो जाय और ज्ञान प्रधान पुरोहित वर्ग की अवहेलना करे- उनका कहना न माने, तो पुरोहित-वर्ग को ही उसका दमन करना होगा, क्योंकि ज्ञान से ही कर्म की उत्पत्ति होती है।” भागवत् (1-18-34) में कहा गया है-

“ब्राह्मणैः क्षत्रबंधुर्हि द्वारपालो नियोजितः।”

“प्रजा के ज्ञानी-वर्ग (ब्राह्मणों) ने राजा आदि कर्मी-वर्ग को प्रजा की रक्षा के लिये चौकीदार (द्वारपाल) मुकर्रर किया है।”

यहाँ तक तो स्मृतियों की व्यवस्था समझ में आती है। पर यदि पुरोहित वर्ग (ज्ञानी-वर्ग) भी काम, क्रोध, मोह, मद, मत्सरादि से अन्ध हो जाय और पथभ्रष्ट, पाखण्डी, दुष्ट बुद्धि होकर ज्ञान को स्वार्थ का दास बना दे- यदि ब्रह्म और क्षेत्र (चर्च और स्टेट) दोनों आपस में मिलकर प्रजा की यम-यातना करने लगें, तब क्या उपाय है? तब कौन दंड का प्रयोग करेगा? पहरेदार पर पहरा कौन देगा? ऐसा न होने पर अन्त में जन-समूह की उसी अव्यक्त शक्ति को- जिसने मूल राष्ट्र-विधान बनाया था- फिर से धर्म संस्थापनार्थ नये रूप में अवतार लेकर- नया विप्लव (रिवोल्युशन) करके ब्रह्म, क्षत्री, वैश्य, शूद्र सबका पुनः संशोधन करना पड़ेगा- समाज और राष्ट्रीय-विधान का जीर्णोद्धार करना पड़ेगा।

इस विवेचना से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ‘स्वराज्य-विधान’ में धर्म-रक्षक पुरोहित के ऊँचे प्रतिमान (स्टैंडर्ड) का समावेश अवश्य होना चाहिये। अर्थात् उसको ऊँचे दर्जे का परार्थी, अनुभवी और धीमान् भी होना चाहिये,क्योंकि वही समस्त प्रजा के सुख और सुरक्षा का अन्तिम आधार है। ऐसी शर्तों के समावेश करने का कम से कम इतना फल अवश्य होगा कि वह आदर्श निर्वाचकों के सम्मुख सदा उपस्थित रहेगा- उनको अन्धकार में दीपक का काम देगा, चुनने वालों के लिये जो आवश्यक शिक्षा है कि ठीक चुनाव कैसे करना, यह शिक्षा भी उनको निरन्तर देता रहेगा। क्रमशः यह आदर्श उनके हृदयों में प्रवेश करेगा और उनके चुनाव कार्य पर प्रभाव डालेगा। वे स्वभावतः ही-अन्तर्बोध से अच्छे योग्य व्यक्तियों का चुनाव करने लगेंगे। ये व्यक्ति ऐसे होंगे जो समाज के उपरोक्त चार प्रधान विभागों में से किसी न किसी एक विभाग के धर्म-कर्म के अच्छे अनुभवी होंगे। और साथ ही निस्वार्थ और सर्व लोक हितैषी भी होंगे। याद रहे कि प्रत्येक सभ्य और समृद्धिशाली मानव समाज में, राष्ट्र में ये चारों परस्पराश्रित अंग वैसे ही वर्तमान रहते हैं जैसे जीवित शरीर में प्रसिद्ध चारों अंग- सिर (ज्ञानेन्द्रिय), बाँह (कर्मेन्द्रिय), धड़ (अन्न संचय शक्ति) और पैर जो सबका बोझ सँभालते रहते हैं।

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