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Magazine - Year 1957 - Version 2

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सिनेमा और चरित्रहीनता

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(एक समाज हितैषी)

सिनेमा आजकल मनोरंजन का सर्वप्रधान साधन है। इसका प्रचार निरन्तर बढ़ रहा है और अब बड़े शहरों से चलकर यह छोटे शहरों और कस्बों तक में पहुँच रहा है। इसका शौक यहाँ तक बढ़ा है कि छोटे स्थानों के निवासी केवल सिनेमा के किसी विशेष तमाशे को देखने के लिये तीस-तीस, चालीस-चालीस मील की यात्रा करके निकटवर्ती शहरों में पहुँच जाते हैं।

सार्वजनिक जीवन से इतना निकट सम्बन्ध रचने वाले इस व्यवसाय में जब हम चरित्रहीनता की वृद्धि की बात सुनते हैं तो बड़ी चिन्ता होने लगती है। हमारे कच्ची मति के बालकों और महिलाओं पर इसका कैसा घातक प्रभाव पड़ेगा और वे किस प्रकार अनेक दोषों के शिकार बन जायेंगे यह सोचकर मन को बड़ी व्यथा होती है। इधर कुछ समय से सिनेमाओं के फिल्मों में नग्नता की वृद्धि हो रही है और घटिया किस्म के विदेशी फिल्मों की नकल करके अश्लील नाचों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में दिल्ली के साप्ताहिक ‘हिन्दुस्तान’ ने हाल ही में एक मार्मिक सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा है-

“आज कल भारत वर्ष में जितने भी चलचित्र बन रहे हैं उनमें बहुत ही कम ऐसे हैं जिनमें पश्चिमी स्वर-प्रणाली के सस्ते और गन्दे प्रेम के गीत न गाये जाते हों तथा जनता की काम वासना को प्रज्ज्वलित करने वाले, अशिष्टतापूर्ण नग्नप्राय नृत्य न दिखाये जाते हों। दुख की बात तो यह है कि ये सभी चलचित्र हमारी राष्ट्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किये गये सेंसर- अधिकारियों द्वारा प्रदर्शन-योग्य प्रमाणित किये जाते हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि आधुनिकता के प्रवाह में हम इस प्रकार बेबस होकर क्यों बहते जा रहे हैं कि हमें उचित अनुचित तक का ध्यान नहीं रह गया है। जो कुछ पश्चिमी है वही आधुनिक है और जो कुछ भारतीय है वह संकुचित विचारधारा का द्योतक है, ऐसा सोच बैठना ही, हमारी समझ में, हमारे राष्ट्र की साँस्कृतिक अवनति का प्रमुख कारण है।”

वास्तव में इस सम्बन्ध में परिस्थिति बराबर बिगड़ती जाती है। सिनेमा के निर्माता अपना लक्ष्य केवल रुपया कमाना रखते हैं, फिर चाहे उससे जनता का चरित्र बने या बिगड़े इसकी उन्हें परवाह नहीं। आज से बीस वर्ष पहले भी अमरीका के अनेक पादरियों ने अश्लील फिल्मों के बहिष्कार का आन्दोलन आरम्भ किया था। उसी समय हमारे देश के माननीय नेता आचार्य पी.सी. राय ने भी कहा था कि “माँ बाप अपने लड़कों की शिक्षा के लिये अत्यन्त कष्ट से रुपया बचाकर भेजते हैं, पर वे उसे सिनेमाओं में उड़ा देते हैं।” तब से यह व्याधि बहुत बढ़ गई है और अब हमारा देश ही ऐसे फिल्मों के निर्माण का एक बड़ा केन्द्र बन गया है। हम चाहते हैं कि विधान सभाओं और लोक सभा में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों में से कोई सज्जन इस विषय पर वहाँ अपनी आवाज बुलन्द करें। साथ ही प्रभावशाली पत्रों को भी इस सम्बन्ध में जनमत को जागृत करके सरकार पर दबाव डालना चाहिये कि वह इस अश्लीलता के प्रवाह को रोके।

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