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Magazine - Year 1957 - Version 2

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बेईमानी एक मूर्खता है।

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(श्री रामचरण महेन्द्र)

बुराई सच्चाई की छाया में पलती है। यदि कुछ व्यक्ति धोखे और बेईमानी से सम्पन्न होते हुए दिखाई देते हैं तो स्मरण रखिए यह सब इसलिये है कि लोग उन्हें सच्चा और ईमानदार समझते हैं। उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि अमुक व्यक्ति सच्चा है। यदि बेईमानी में शक्ति होती तो लोग खुले आम बेईमानी की प्रशंसा करते। किन्तु कोई बेईमानी की प्रशंसा नहीं करता। जन-समाज बेईमानी के विरुद्ध इसलिये है कि इसमें शक्ति नहीं, शक्ति का आभास मात्र होता है। बेईमानी की शक्ति थोड़े दिन बाद स्वयं प्रकट हो जाती है।

चोर, डाकू, पाकेटमार, वेश्या इत्यादि दिन-रात रुपया कमाते हैं। यदि ये अपना रुपया एकत्रित करें तो रुपये से घर भर सकते हैं। किन्तु ऐसा नहीं हैं। बेईमानी का धन होने के कारण वह एक ओर से आकर दूसरी ओर निकल जाता है। रिश्वत जैसे आती है, वैसे ही तितर-बितर हो जाती है। ये व्यक्ति जैसे-के-तैसे रह जाते हैं।

मानव भोग खूब भोगना चाहता है। खूब ऐश-आराम, विलासप्रियता, वासना-सुख चाहता है। इस तृष्णा के कारण सर्वत्र अतृप्ति और अशाँति है। मनुष्य जितना ही अपनी आवश्यकताएं बढ़ाता है, उतना ही दुःखी रहता है। वासना भी मोह और अतृप्ति का कारण है। विकार-ग्रस्त व्यक्ति कुछ नहीं कर सकते। ये सदा अपने विकारों की तृप्ति में ही फंसे रहते हैं। वासना में कभी शान्ति नहीं मिलती। शरीर की इच्छायें कुछ भी नहीं दे सकतीं। यह आपके स्वास्थ्य और यश प्रतिष्ठा को नष्ट करने वाली हैं। काम वासना कुछ नहीं, स्वयं अपनी ही हड्डियों का दूध है। आपके जीवन और स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला है। भोगों में लय होना, मानों अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देना है। इसमें कोई सार नहीं है। कोई सुख-शान्ति नहीं है। इसी प्रकार धन-संग्रह भी एक मोहवृत्ति है। व्यर्थ की तृष्णा है। खाने में आप उतना ही खायेंगे अधिक नहीं भर सकते। वस्त्र भी उतना ही पहिन सकते हैं सोने के लिए खाट भी उतनी ही चाहिये। खान-पान, रहन-सहन इत्यादि के लिये आप को मामूली व्यक्ति जैसी वस्तुएं ही चाहिएं। इन्हें आप ईमानदारी से कमा सकते हैं।

भोग और लोभ ये बुराइयों की दो जड़ें हैं। इन्हें रोकने से आप सुखी रहेंगे। एक को ठगेंगे, तो दूसरा आप को ठगेगा, तीसरा उसे ठगेगा। इस प्रकार ठगी और बेईमानी सर्वत्र फैल जायेगी। यदि आप ईमानदारी को अपना ध्येय बनायेंगे, तो वही सर्वत्र फैलेगी। बेईमानी सब प्रकार के विकास को नष्ट करती आ रही है। यह एक सस्ती चीज है, जो मनुष्य की शक्तियों को कुँठित कर देती है। बेईमानी से जब उद्योग धन्धों और व्यापार का नाश होता है। छल-कपट अधिक दिन टिकने वाले नहीं हैं।

बेईमानी के कारण, वास्तविक व्यक्ति जो विश्वासपात्र हैं, उन पर से भी विश्वास उठ गया है। मानव को मानव पर विश्वास करना कठिन हो रहा है। जनता को नेता का, नेता को जनता का, पिता को पुत्र का, पति को पत्नी का, पत्नी को पति का विश्वास नहीं है। समाज के सब संगठन बेईमानी के कारण टूट-फूट गये हैं। रोगी को डॉक्टर पर विश्वास नहीं है। वह समझता है कि जो दवाई उसे दी जा रही है, वह केवल रंगा हुआ जन मात्र हो सकता है। जनता समझती है कि नेता उसे पथभ्रष्ट कर रहे हैं। यदि हम बेईमानी के विरुद्ध कड़ा कदम उठा लें, तो एक ऐसा केन्द्र उपस्थित कर सकते हैं, जहाँ से सत्य, न्याय और प्रेम की किरणें विकेन्द्रित हो सकती हैं। ये ही किरणें सर्वत्र व्याप्त होकर दूषित वातावरण को शुद्ध कर सकती हैं।

बेईमानी आपके जीवन का कोई अंग नहीं बनना चाहिये। बेईमानी अप्राकृतिक है। उसे व्यवहार में लाने से हमें अपनी आत्मा का हनन करना पड़ता है। हम झिझकते रहते हैं कि कहीं हमारे झूठ-फरेब प्रकट न हो जाए, हमारा रहस्य प्रकट न हो जाए, हमें लोग बुरा-भला न कहें। बेईमानी हमारे गुप्त मन में दुराव-छिपाव की भावना-ग्रन्थि उत्पन्न करती है और सदा किसी-न-किसी प्रकार प्रभावित किया करती है।

बेईमानी अंधकार है, तो ईमानदारी शुभ प्रकाश है। ईमानदारी में मनुष्य धन-हीन और अभावग्रस्त रह सकता है, किन्तु उसके मन में शान्ति और संतुलन रहता है। उसका चरित्र-निर्माण दृढ़ पृष्ठभूमि पर रहता है। उसे यह झिझक या शंका नहीं रहती कि कोई किसी दिन आकर उसकी बेईमानी को पकड़ लेगा या उसकी अप्रतिष्ठा होगी। उसकी नौकरी जायेगी या मुकदमे चलेंगे। ईमानदारी से रहना सच्चाई से रहना है। ईमानदारी की सच्चाई दीर्घकाल तक चलने वाली है।

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