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Magazine - Year 1957 - Version 2

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विचारों द्वारा भी संसार का कल्याण किया जा सकता है।

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(श्री महावीर प्रसाद जी)

सृष्टि के सभी पदार्थों में विद्युत शक्ति पायी जाती है और वह दो धाराओं में बंटी रहती है जिनको ‘निगेटिव’ (ऋणात्मक) और ‘पॉजिटिव’ (धनात्मक) विद्युत कहते हैं। नारी और नर के शरीर में भिन्न-भिन्न प्रकार की विद्युत धारायें बहा करती हैं। नारी के शरीर में ऋणात्मक और पुरुष के शरीर में धनात्मक विद्युत अधिक मात्रा में होती है। युवावस्था में नवीन रक्त होने के कारण ये धारायें अधिक मात्रा में होती हैं, पर दोनों की एकाँगी ही होती हैं, अर्थात् उस अवस्था में पुरुष धनात्मक और स्त्री में ऋणात्मक विद्युत ही पायी जाती है। इसी का परिणाम है कि उस अवस्था में युवक युवती का आकर्षण एक दूसरे के प्रति बहुत अधिक रहता है, मनुष्यों और पशु-पक्षियों के पारस्परिक प्रेम का यही वैज्ञानिक रहस्य है।

शरीर में विभिन्न रूप से अग्नि रूपी विद्युत निवास करती है, जिसे तेजस कहते हैं। हर एक देश के लोगों ने इसे किसी न किसी रूप में स्वीकार किया है। योरोप के विद्वानों ने इसको ‘पर्सनल मैग्नेटिज्म’ या ‘औरा’ के नाम से पुकारा है, अरबी में इसे ‘नूर’ कहा गया है। हमारे यहाँ इसे ‘ओजस’ का नाम दिया गया है। इसकी कमी होने से मनुष्य का आकर्षण, सौंदर्य, शारीरिक बल, बुद्धि, स्मरण शक्ति या धारणाशक्ति और इन्द्रियों की स्फूर्ति इत्यादि सब नष्ट हो जाती है। शरीर यक्ष्मा, प्रमेह, निर्बलता आदि तरह-तरह के रोगों से क्षीण हो जाता है।

यह तो सब जानते ही हैं कि शरीर की ‘धातुओं’ के पचने से ओजस् उत्पन्न होता है। यह ओज ही प्राणी के शरीर की श्री, कान्ति, प्रतिभा और दीर्घायु का मूल है। शरीरस्थ सप्त धातुओं में से शुक्र या वीर्य ही स्नेह की तरह बलता हुआ शरीर को प्रकाशित करता है। यही ओजस भी होता है, जिसे तेजस कहते हैं। ओजस लौ (दीप शिखा) है और तेजस उसका प्रकाश है। नारी और नर में लौह-चुम्बक का सा स्वाभाविक खिंचाव होने के कारण दोनों साथ-साथ रहना पसन्द करते हैं, वे परस्पर आकर्षण का अनुभव करते हैं तथा साथ-साथ रहना चाहते हैं। चकवा, कबूतर, सारस, बत्तख, तीतर, राजहंस आदि पक्षी एवं सिंह, भेड़िया, हिरन आदि पशु प्रायः जोड़े से ही रहते हैं। जो उपयुक्त जोड़ा चुनना नहीं जानते, वे भी समय-समय पर परस्पर आकर्षित होते रहते हैं। इस आकर्षण को ‘प्रेम’ के नाम से पुकारा जाता है। यही डोर प्राणियों को साथ-साथ रहने के लिये आपस में बाँधे रहती है। परन्तु जो लोग ‘प्रेम’ में काम वासना को सम्मिलित करते हैं, उनको घोर अज्ञानी और कलुषित हृदय समझना चाहिये। प्रेम और वासना अलग-अलग वस्तुएं हैं। मन को चाहे कोई कितना ही धोखा दे, प्रेम, प्रेम है और वासना-वासना ही है। काम रहित प्रेम मनुष्य को ऊँचा उठाता है और काम-वासना वाला सम्बन्ध मनुष्य को नीचे गिराता है। प्रेम में पावनता की प्रतिष्ठा है। अतः जो व्यक्ति निरन्तर प्रेम, उत्साह, उल्लास, उत्कर्ष, आनन्द, दया आदि के विचारों से अपने मन को परिपूर्ण रखता है उसका जीवन सदैव प्रसन्न, उन्नत एवं शक्तिशाली बना रहता है।

सभी पुरुष न तो पशु हैं और न सभी नारी देवियाँ। जो व्यक्ति-चाहे वे पुरुष हों या स्त्री-काम, क्रोध, लोभ तथा मोह आदि विकारों की अग्नि से अपने तेजस को नष्ट कर लेते हैं, वे स्वयं तो जला ही करते हैं, साथ ही इन प्रज्वलित अंगारों को फेंक कर दूसरों को भी जलाते हैं। तरुण व्यक्ति यदि विवाह की इच्छा करे तो यह उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। इसमें हानि कुछ नहीं, लाभ ही है। प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि सपत्नीक रहते थे। आज तो यह भ्रम फैल गया है कि पत्नी के साथ रह कर मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता है। पर यह विचार ठीक नहीं। हाँ, जब हम प्रेम की स्वाभाविक शक्ति और गर्भाधान क्रिया के तात्कालिक आनन्द को काम-वासना के बुरे रूप में परिणित कर देते हैं, तब वह शरीर और मन के लिये बहुत घातक वस्तु बन जाती है। जैसे भूख स्वाभाविक है और मधुर भोजन करना भी ठीक है। परन्तु इस प्राकृतिक क्रिया को विकृत करके जो मनुष्य निरन्तर स्वादिष्ट पदार्थों को पेट में ठूँसते रहना ही अपना ध्येय बना लेता है वह बहुत शीघ्र रोगी और बलहीन बनकर अपना नाश आप कर लेता है। यही बात स्त्री-पुरुष संपर्क में है। जब मनुष्य मूर्खतावश अथवा लालच से मौन-आकर्षण की स्वाभाविक क्रिया को कामाग्नि के रूप में परिणित कर देता है तब तक अग्नि शरीर के सारे पदार्थ को जलाकर भस्म कर देता है।

विचार-प्रवाह

हमारी मानसिक विद्युत में से प्रतिक्षण जो लहरें उठती हैं उन्हें विचार के नाम से पुकारते हैं। विचार केवल एक शब्द नहीं है, वरं एक मूर्तिमान पदार्थ है, जिसे वैज्ञानिक यन्त्रों की सहायता से प्रत्यक्ष देखा जाने लगा है। अमेरिका में ऐसे फोटो खींचने के कैमरे बनाये गये हैं जो विचारों के चित्र स्पष्ट रूप में खींच सकते हैं। आप जिस वस्तु का चिन्तन कर रहे हैं उसी के समान मानस-चित्र भी बनने लगते हैं। इन मन्त्रों की सहायता से ठोस पदार्थों की तरह उन मानस आकृतियों का चित्र खींच जाता है। विचार हर क्षण मस्तिष्क में से निकल कर बाहर की ओर उड़ते रहते हैं। उन उड़ते हुये विचारों का चित्र ठीक वैसे ही आता है जैसी कि मनुष्य की कल्पना होती है।

सच पूछिये तो मनुष्य प्राणी में विचार-शक्ति ही सर्वोच्च है। विचारों के प्रबल प्रवाह का नाम ही तेजस है। विचारों की प्रधानता के साथ-साथ आहार-विहार, दर्शन, स्पर्श और श्रवण आदि विषय भी तेजस्-निर्माण में अपना कार्य करते हैं। व्यक्ति जैसे विषयों का उपभोग करता है उसका तेजस वैसा ही बनता रहता है। पवित्र तथा तीव्र तेजस निर्माण के लिये पवित्र विचार, शुद्ध भावनायें एवं शुद्ध आहार-विहार की आवश्यकता है।

आपने जल में उठती हुई लहरें देखी होंगी। वे किसी स्थान से उठें, पर समाप्त वहीं जाकर होंगी जहाँ जल का अन्त होगा। विचार भी मानसिक विद्युत (तेजस्) की लहरें हैं, जो विश्व भर में व्याप्त आकाश (ईश्वर) तत्व में उठती हैं। ये लहरें विचारों के अनुसार विभिन्न प्रकार की होती हैं। (1) विद्वानों और बुद्धिमानों का तेजस् (विद्युत प्रवाह) पीले रंग का होता है। (2) शुद्ध प्रेम का तेजस् गुलाबी रंग का होता है। (3) परोपकारी का तेजस् उज्ज्वल होता है। (4) धार्मिक या सदाचारी भावनाओं का तेजस् नीले रंग का होता है। (5) आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति का तेजस् हल्के रंग का होता है। (6) काम-आसक्ति वाले का तेजस् किरमिची रंग का होता है। (7) लाभ की कामना वालों के तेजस् का रंग नारंगी होता है। (8) क्रोधी व्यक्ति के तेजस् में गहरे लाल रंग की धारियाँ होती हैं। (9) अपवित्र तथा दुष्ट व्यक्ति के तेजस् का रंग काला होता है। ईर्ष्यालु एवं द्वेषी भावना वाले का तेजस् गहरे मेघ के रंग का होता है।

एक तरह के विचार दूर-दूर से इकट्ठे होकर घने होते रहते हैं, जैसे अलग-अलग स्थानों की उड़ती हुई भाप एक स्थान पर जमा होते-होते बादल बन जाती है। बिजली में आकर्षण शक्ति भी होती है, इस कारण वे विचार एक दूसरे को खींचते रहते हैं। आप जैसे विचार करते हैं मस्तिष्क में उसी तरह की आकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है और वह आकाश में उड़ने वाले उसी प्रकार के विचारों को पकड़कर अन्दर खींच लेती है। अतएव जो बात आप सोचते हैं, उसके सम्बन्ध में बहुत सी नई-नई बातें आपके दिमाग में आ जाती हैं। इसका कारण यह भी होता है कि उस प्रकार का विचार कभी किन्हीं व्यक्तियों ने किया होगा और उनका अनुभव जो उड़ता फिर रहा था आपको मिल गया। परोपकार और भलाई के विचार करने से वैसे ही विचारों का जमाव होता है। इससे हृदय बड़ी शान्ति और शीतलता का अनुभव करता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, घृणा, मद और कपट के विचारों में तल्लीन रहता है, वह अपने दुर्विचारों के कारण अपने मन को बेचैन बना देता है और संसार का भी अहित करता है। अनेक महापुरुष प्रत्यक्ष में संसार की भलाई का अधिक कार्य करते दिखाई नहीं देते, पर वे अपनी उच्चकोटि की शक्ति शालिनी विचार धारा को संसार में प्रवाहित करके प्राणियों का अकथनीय उपकार करते रहते हैं।

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