आश्विन की नवरात्रि।
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वर्ष की दोनों नवरात्रियाँ गायत्री उपासना के सर्वश्रेष्ठ पर्वकाल हैं। सर्दी और गर्मी की ऋतुओं की यह नौ नौ दिन की संध्यायें साधना के लिए वैसी ही महत्वपूर्ण हैं जैसे प्रतिदिन दिन और रात्रि के मिलन की प्रातः सायं संध्या वेला उपयुक्त होती है। इस वर्ष यह नवरात्रियाँ आश्विन सुदी 1 से लेकर 9 तदनुसार तारीख 24 सितम्बर मंगलवार से आरम्भ होकर तारीख 2 अक्टूबर बुधवार को पूर्ण होती है। इन दिनों 24 हजार जप का अनुष्ठान करने के लिये प्रतिदिन 26 मालायें करनी पड़ती हैं जिसमें लगभग ढाई तीन घण्टे लगते हैं। यदि प्रातःकाल एक बार में इतना समय न मिले तो प्रातः सायं दोनों समय में पूरा किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य आवश्यक है। जिनसे बन पड़े वे उपवास भी करें। 24 हजार जप का शताँश 240 आहुतियों का हवन भी करना चाहिये।
108 या 240 पाठ गायत्री चालीसा के करने से भी एक अनुष्ठान पूरा हो जाता है। यह स्त्रियों तथा बच्चों के लिये बहुत सरल है।
अनुष्ठान करने वाले यदि पूर्व सूचना दे दें तो तपोभूमि में उनकी साधना का संरक्षण तथा त्रुटियों का दोष परिमार्जन होता रह सकता है।
जो अपना हवन न कर सकें उनके बदले का हवन भी तपोभूमि में कर दिया जाता है। जो अपना अनुष्ठान तपोभूमि में करना चाहें उनका कार्य भी वहाँ के निवासी तपस्वी लोग कर देते हैं।
गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा को अपने यहाँ सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, जुलूस, धर्मफेरी आदि की तैयारी अभी से करनी चाहिये।
जप, हवन की भाँति ब्रह्मभोज भी आवश्यक है। सर्व लोकसेवी ब्राह्मण प्रायः आजकल नहीं मिलते इसलिये कन्याओं को भोजन कराना एवं गायत्री चालीसा आदि सत्साहित्य का वितरण करना एक परम पुनीत ब्रह्मभोज है।

