भयंकर भविष्य में सावधान
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(श्रीराम शर्मा आचार्य)
गत अंक में सन् 1962 में महाप्रलय की संभावना के सम्बन्ध में एक प्रमुख ज्योतिषी की भविष्यवाणी छपी है। महाभारत के बाद ऐसा विकट समय अब की बार ही आया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक राशि पर अधिक ग्रहों का जमघट अशुभ माना जाता है। महाभारत युद्ध के समय केवल सात ग्रह एक राशि पर आये थे और उसके फलस्वरूप जिस भयंकर महाभारत का सूत्रपात हुआ उसने भारत ही नहीं सारे संसार का रूप बदल दिया। अब की बार वैसा ही नहीं उससे भी अधिक कठिन कुयोग पुनः सामने आ रहा है। सन् 1962 में जनवरी 16 और फरवरी 12 के बीच मकर राशि पर राहु को छोड़कर अन्य आठ ग्रह मकर राशि पर एकत्रित होंगे। राहु भी पूर्ण दृष्टि मकर राशि पर रखेगा इस प्रकार वह भी एक तरह से उसी राशि पर अवस्थित समझा जा सकता। इस तरह एक राशि पर पूरे नौ या साढ़े आठ ग्रह एकत्रित होंगे जिनकी भयंकरता महाभारत काल में एक राशि पर एकत्रित हुए सात ग्रहों की अपेक्षा कहीं अधिक है।
इस अशुभ कुयोग के फलस्वरूप मानव जाति को भयंकर आपत्तियों का सामना करना पड़ेगा। महायुद्ध, महामारी, दुर्भिक्ष, दुष्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि, अस्थिरता, अव्यवस्था, अराजकता जैसी अनेक विपत्तियाँ संसार के सामने अनेक रूपों में उपस्थित होंगी। जिसके फलस्वरूप अपार धन जन की हानि होने की संभावना है। संसार के एक तिहाई मनुष्य इन विपत्तियों की चक्की से पिस जावें तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।
वास्तविक संध्या काल वह होता है जिस समय सूर्य बिलकुल उदय या अस्त हो। यह समय प्रायः 5-5 मिनट का प्रातः समय होता है। वास्तविक संध्या काल 5-5 मिनट होने पर भी व्यावहारिक संध्या एक-एक घण्टे की मानी जाती है। चन्द्र, सूर्य ग्रहण के वास्तविक काल से बहुत पहले और बहुत पीछे तक सूतक काल रहता है। इसी प्रकार सन् 62 के कुयोग का वास्तविक समय यों 16 जनवरी से 12 फरवरी तक 26 दिन का है पर इसका पूर्व एवं पर काल 5-5 वर्ष आरम्भ तथा अन्त में रहेगा। सन् 57 से वह अशुभ कुचक्र आरम्भ होता है और उसकी समाप्ति सन् 67 तक चलेगी। इस प्रकार इस कुचक्र को एक प्रकार से 10 वर्ष का मानना चाहिये।
समय की इस कठिनाई को पाठक स्वतः अनुभव कर रहे होंगे। इस वर्ष भी संसार कम विपत्तियों में से नहीं गुजर रहा है। जगह-जगह नदियों की बाढ़ें, कहीं वर्षा का भारी अभाव, रेल दुर्घटनायें, डाकुओं के भयंकर उपद्रव, सर्वत्र बेहिसाब बढ़ती हुई पार्टी बन्दी, व्यापक गुण्डागर्दी, वर्ग संघर्ष, प्रान्तीयता भाषावाद और साम्प्रदायिकता का नग्न नृत्य, मुद्रास्फीति, चोरबाजारी, रिश्वत खोरी, तस्करशाही अन्न की कमी, बढ़ती हुई महंगाई, सरकारी कर्मचारियों की हड़तालें, राजनैतिक पार्टियों की अखाड़ेबाजी, जनता की क्रयशक्ति घटने और सरकारी प्रतिबंध बढ़ने से व्यापार में गतिरोध, व्यापक असंतोष का बोलबाला हो रहा है। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने नये प्रकार के शिकंजे और दांव−पेंच तैयार करके पहले से भी भयंकर रूप में प्रकट हो रही है। युद्ध की चिंगारियां एशिया, योरोप, अफ्रीका के विशाल भूखंडों में अनेकों स्थानों पर सुलग रही है, थोड़ा सा भी अवसर आने पर वे दावानल का रूप धारण कर सकती हैं। अणुबम, उद्जन बम, आदि सर्वसंहारी अस्त्र मानव सभ्यता को मटियामेट कर देने और धरती को प्राणि-विहीन बना देने के लिए चुनौती के रूप में खड़े हुए हैं। इन अस्त्रों के परीक्षण मात्र से विश्व का वातावरण भयंकर रूप से विषाक्त होता चला जा रहा है और उसके कारण जगह-जगह इन्फ्लुएंजा आदि बीमारियाँ फैल रही हैं और सर्दी-गर्मी, वर्षा के मौसमों का संतुलन बिगड़ रहा है। जो बालक इन दिनों उत्पन्न हो रहे हैं उनके मनः संस्थान क्रोध, द्वेष, अवज्ञा और उच्छृंखलता से भरे हुए आ रहे हैं। यह दुर्भाग्य आगे और भी बुरे रूप में उपस्थित होगा। जब बालक विकलाँग, अन्धे, गूँगे, बहरे, अपाहिज और पागल जैसी स्थिति में पैदा होकर धरती पर भूभार की तरह जीवन करेंगे और कैंसर, राजयक्ष्मा, अस्थि शोथ आदि भयंकर रोगों की यातनाओं से तड़प-तड़प कर प्राण देंगे। अणुबमों के परीक्षण से उत्पन्न हुई आकाश व्यापी रेडियो सक्रियता से इस प्रकार के अनेक उपद्रव खड़े हो रहे हैं और आगे होंगे।
जन साधारण के मनः क्षेत्र में एक विचित्र प्रकार का उच्चाटन हो रहा है। किसी ठोस एवं गंभीर कार्य पर किसी का मन नहीं लग रहा है। वासना, तृष्णा, ईर्ष्या, उद्वेग, द्वेष, कलह, प्रतिहिंसा, असहिष्णुता की अग्नि से लोगों के हृदय बेहिसाब जल रहे हैं। इस प्रकार की स्वस्थ मनोभूमि के व्यक्तियों के द्वारा जो क्रियायें हो रही हैं वे भी गड़बड़ी से भरी हुईं, अशाँति उत्पादक एवं दुखदायी ही सिद्ध होती हैं। आज की परिस्थितियों का सही चित्रण यही है। इन विषम परिस्थितियों के बीच हमारे अनेकों सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक सत्प्रयत्न जो जनता को सुखी बनाने एवं शान्ति स्थापना के लिए किये जा रहे हैं एक प्रकार से निष्फल ही हो रहे हैं।
इन विषम परिस्थितियों से हमें निराश एवं भयभीत होने की आवश्यकता नहीं वरन् वस्तु स्थिति की कठिनता को देखते हुए उसके शमन के लिए वीरोचित पुरुषार्थ के साथ कार्य करने के लिए कटिबद्ध होने का है। सूर्यचन्द्र ग्रहण काल के समय जो अशुद्ध वातावरण उत्पन्न होता है उसे जनता धर्म अनुष्ठान के द्वारा शान्त करती है। इसी प्रकार यदि प्रयत्न किया जाय तो वर्तमान काल में उत्पन्न हो रही एवं भविष्य में विकराल रूप धारण करने वाली इस अशान्ति पर काबू प्राप्त किया जा सकता है। तलवार प्रहार करती है पर उससे बचाव ढाल द्वारा हो सकता है। आग्नेयास्त्र से आग लगाई जाती है पर वरुणास्त्र से उसे ठंडा कर दिया जा सकता है। सर्प का विष मारक है पर उस विष का शमन करने वाली औषधियाँ भी हैं। महामारी फैलने के समय रोगों के कीटाणु उसी पर असर करते हैं जिसके शरीर में पहले से ही विषैले एवं रोग कीटाणुओं को सहारा देने वाले दूषित पदार्थ भरे होते हैं, यदि रक्त पूर्ण शुद्ध हो तो वह मनुष्य महामारी फैलने पर भी उस आपत्ति से बच सकता है। ग्रह दशा के कुचक्र से संसार पर आपत्तियों की तलवार का आक्रमण होता है पर यदि उससे प्रतिरोध करने के लिए धार्मिक अनुष्ठानों की ढाल आकाश में छा जाय तो वह अनिष्ट की तलवार उससे टकरा कर निष्प्रभ हो सकती है। इन्द्र ने जब द्वापर में भयंकर वर्षा करके ब्रज को डुबाना चाहा था तो भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की छाया करके उस अनिष्ट से ब्रजवासियों की रक्षा कर ली थी। यह दैवी प्रकोप भी द्वापर के इन्द्र कोप की तरह है। धर्मानुष्ठानों का गोवर्धन उठाने के लिये यदि सभी ग्वाल-बाल अपनी लाठी तानकर खड़े हो जाएं तो अपनी ही नहीं- सारे संसार की रक्षा हो सकती है और यह प्रलयकारी घटायें जो सूक्ष्म दृष्टि वालों को ही भयंकर एवं विकराल रूप से दृष्टिगोचर हो रही हैं- हलकी ही नहीं पड़ जायेंगी वरन् मामूली छींटे डालकर शान्त भी हो सकती हैं।
रुद्र का तीसरा नेत्र खुलने की संभावना है उसे देवता लोग विनयावनत होकर उन सर्वान्तर्यामी की प्रार्थना करके शान्त कर सकते हैं। संसार को जला डालने वाली भयंकर दावानल के जो शोले उठ रहे हैं और विकराल सर्वनाश का जो दृश्य उपस्थित करने वाले हैं उन्हें शान्त करने के लिए एक प्रचण्ड वरुणास्त्र की आवश्यकता है। दुनिया हाइड्रोजन बम बनाने में लगी हुई है। पर उससे उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों को शमन करने की शक्ति किसी में नहीं है। यह कार्य इस ऋषियों की भूमि भारतवर्ष में ही हो सकता है। यहाँ से संसार को शान्ति प्रदान करने वाली अमृत निर्झरिणी सदा से ही बहाई जाती रही है। इस समय जिस वरुणास्त्र की इन संभावित आपत्तियों को टालने की- इनका प्रतिरोध करने की इनसे समस्त मानव जाति को बनाने की क्षमता किसी में है तो वह इस ऋषि भूमि भारतवर्ष में ही है। अन्य देश आग्नेयास्त्र बना रहे हैं। वरुणास्त्र-इन अग्नियों को शान्ति करने वाला शान्ति वर्षा अस्त्र, जिसमें करोड़ों प्राणियों के धन जन की रक्षा हो सके- केवल भारत ही बना सकता है और बना रहा है।
गायत्री तपोभूमि द्वारा आयोजित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान वस्तुतः एक आध्यात्मिक वरुणास्त्र है। एक-एक हाइड्रोजन बम बनाने में लाखों करोड़ों रुपये की लागत आती है और भारी श्रम एवं साधन सामग्री जुटानी पड़ती है। इस वरुणास्त्र के बनाने में धन की, मशीनों की, वस्तुओं की तो आवश्यकता नहीं पर श्रम अवश्य चाहिये और वह श्रम भी अश्रद्धालु लोगों का नहीं- उनका जिनका हृदय धर्म भावनाओं से परिपूर्ण हो। रावण को मारने के लिए त्रेता में एक घड़े की आकृति का महाबम बना था उसमें ऋषियों ने अपने रक्त बिन्दु भरे थे उसे खेत में गाड़ा गया था और उससे सीता-शक्ति का प्रादुर्भाव होकर दशों दिशाओं में विजय दुन्दुभी बजाने वाली असुरता का विनाश हुआ था। त्रेता में जिस प्रकार अपना रक्त बिन्दु देकर शान्ति बम बना रहे थे उसी प्रकार का प्रयत्न गायत्री तपोभूमि द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान-वरुणास्त्र-बनाने का किया जा रहा है। यदि यह बन गया तो दैवी प्रकोप की- सर्व संहारकारी असुरता की विभीषिका जो किलकारियाँ भर रही हैं वह शान्त हो सकती है- समाप्त हो सकती है।
इन दिनों मनुष्य जाति के सामने कठिनाइयाँ कम नहीं हैं। सहने की आदत बनती जाने से लोग बड़ी से बड़ी कठिनाई को सह लेते हैं। यह सन् 57 का वर्ष जिन कठिनाइयों में होकर गुजर रहा है उसे यदि सहने की आदत से अलग करके देखा जाय तो निस्सन्देह वह एक भारी मुसीबत का समय दिखाई देगा। सन् 1857 में जैसी मारकाट का गदर हुआ था वैसा तो नहीं पर अन्य प्रकार से यह भी एक तरह का गदर ही है। सौ वर्ष पूर्व जितनी धन जन की हानि और अशान्ति 1857 में हुई थी उससे अनेकों गुनी इस समय मौजूद है। भाषावाद, प्रान्तवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, वर्गवाद आधिपत्यवाद के स्वार्थों को लेकर लोग इस दुर्बल राष्ट्र को तबाह कर डालने पर तुले हुए हैं। यह 1857 जैसा गदर तो नहीं है पर एक प्रकार का गदर ही। मुसीबतें जो उस समय लोगों को उठानी पड़ी थीं आज उससे अधिक ही हैं कम नहीं। सन् 62 तक अगले 5 वर्ष ऐसी ही उलझनों से भरे हुए हैं। एक कठिनाई हल होने से पूर्व कई अन्य आपत्तियाँ उठ खड़ी होती हैं। एक गुत्थी सुलझने नहीं पाती कि दूसरी और नई उलझनें सामने आ जाती हैं। व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में- सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में यह अड़चनें जल्दी ही निपट जायेंगी यह आशा नहीं है। अगले पाँच वर्ष पग-पग पर कस-कस कर हमारी परीक्षा लेंगे।
इस वास्तविकता को जान लेने पर हमें निराश होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि संसार में बड़े से बड़े संकट जहाँ मौजूद हैं वहाँ उनके निवारण के उपाय भी उपलब्ध हैं। मनुष्य का पुरुषार्थ सर्वोपरि है, वह विधि के विधान तक को बदल डालने में समर्थ है। ईश्वर का अविनाशी अंश-मनुष्य अपने परम पिता परमात्मा की सभी क्षमताएं एवं शक्तियाँ अपने अन्दर धारण किये हुए हैं। वह अपनी शक्तियों को ईश्वरीय शक्तियों के साथ जोड़ दे तो ईश्वर के समान ही सब कुछ कर सकने वाला बन सकता है। निर्माण को विनाश में और विनाश को निर्माण में बदल सकता है। दुर्दैव का जो कोप सामने उपस्थित है वह संसार के अशुभ कर्मों का वैसा ही परिपाक है जैसे शरीर में संचित मल वर्षा ऋतु में उपयुक्त अवसर पाकर फोड़े, फुँसी, दस्त, दर्द आदि के रूप में प्रकट होते हैं। अनिष्ट कर ग्रह दशा भी वर्षा ऋतु की भाँति एक अनुकूल अवसर है जब कि संसार के संचित दुष्कर्म एक बारगी फटते फूटते हैं। यदि शरीर पहले से ही शुद्ध हो या उन्हीं दिनों भी शुद्ध कर लिया जाय तो वर्षा ऋतु में भी फोड़े, फुँसी या दस्त, दर्द की संभावना नहीं रहती। उसी प्रकार दुर्दैव का समय आने पर भी सत्कर्मों द्वारा यज्ञानुष्ठानों की चिकित्सा द्वारा उसका शमन हो सकता है।
वर्तमान काल की कठिन समस्या को सरल बनाने के लिए ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान एक असाधारण आध्यात्मिक प्रयत्न है। यों भौतिक प्रयत्न सामाजिक संस्थाओं, अर्थ-तंत्रों, सरकारों द्वारा चलते ही हैं और उनसे कुछ न कुछ लाभ भी होता ही है पर अदृश्य जगत में छाये हुये सूक्ष्म कारणों की निवृत्ति के लिये सूक्ष्म विज्ञान से सम्बन्धित आध्यात्मिक प्रयत्नों की भी आवश्यकता है। उनकी उपेक्षा करके केवल भौतिक उपचारों से कठिनाइयों को हल नहीं किया जा सकता। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसे सफल बनाने के लिये प्रयत्न करना- सहयोग देना एक ऐसा दूरदर्शिता पूर्ण कार्य है जिससे हम स्वयं अपने आपको ही संभावित आपत्तियों की चक्की में पिसने से नहीं बचाते वरन् अन्य असंख्यों प्राणियों का जीवन दान जैसा उपकार करते हैं। इससे बढ़कर पुण्य और सत्कर्म इस समय और कोई हो नहीं सकता। प्रतिदिन 24 लक्ष जप 24 हजार आहुतियाँ, 24 हजार मन्त्र लेखन, 24 हजार पाठ का जो ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इन दिनों चल रहा है उसे सफल बनाने के लिए हर धर्म प्रेमी का सहयोग आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति के पाठकों में से अनेकों ने इस दिशा में सक्रिय कदम उठाये हैं पर अधिकाँश अभी ऐसे हैं जिन्होंने इधर कुछ ध्यान नहीं दिया है। यह उपेक्षा अखरने और खटकने वाली है। अखण्ड-ज्योति परिवार धर्मनिष्ठ, कर्तव्य परायण एवं जागरुक सत्पुरुषों का संगठन है। इसके हर सदस्य से यह आशा की जाती है कि मानव जाति की सुख, शान्ति एवं सुरक्षा के लिये उन्हें कुछ करना ही चाहिये। थोड़ा समय और श्रम देकर हममें से प्रत्येक गायत्री उपासना का कुछ नियमित संकल्प लेकर ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का भागीदार बन सकता है। चूँकि यह सामूहिक संकल्प है इसलिये इसमें अकेले-अकेले कुछ जप तप कर लेने से काम न चलेगा। अपने निकटवर्ती धर्म प्रवृत्ति के लोगों को इस मार्ग की प्रेरणा देकर उन्हें एक संगठन सूत्र में सम्बद्ध करके ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में लगाया जा सकता है। जहाँ इस प्रकार के थोड़े से भी व्यक्ति सामूहिक रूप से गायत्री उपासना करने को तैयार हों वहाँ गायत्री परिवार की एक शाखा स्थापित कर लेनी चाहिये। और मिल जुल कर अधिकाधिक गायत्री साधन द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने में सहायक होना चाहिये।
विवेकवान् धर्म प्रेमियों से हमारा आग्रह पूर्वक अनुरोध है कि वे समय की भयंकरता को देखते हुए उसके शमन के लिए कुछ धर्म कर्तव्य पालन करने को कटिबद्ध हों। तपोभूमि को ऐसे शिक्षित नर नारियों की भारी आवश्यकता है तो पारिवारिक उत्तर दायित्वों से निवृत्त हो चुके हों, और केवल शरीर निर्वाह की व्यवस्था प्राप्त करके विश्व शान्ति के इस महान आयोजन ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने में योगदान करें। हम चाहते हैं कि कुछ सज्जन आगामी पाँच वर्ष सच्चे मन से परमार्थ के लिये लगा दें। गायत्री उपासना एवं यज्ञानुष्ठानों के प्रचार के लिए सच्चे परिव्राजकों की तरह धर्म फेरी करें। कुछ लोग तपोभूमि में रहकर यहाँ यज्ञानुष्ठान में तत्पर रह कर अपना तथा समस्त संसार का भारी हित साधन कर सकते हैं। आगामी पाँच वर्ष बड़े ही महत्वपूर्ण हैं, इन्हें जो सफल बना सकें उन्हें ही सच्चे भाग्यवान कहा जायेगा। जो लोग इन धर्मानुष्ठानों की उपेक्षा करके व्यक्तिगत लाभ उपार्जन में लगे हुए हैं वे मूर्ख हैं क्योंकि उनकी उपार्जित वस्तुयें दुर्दैव के एक ही थपेड़े में चूर-चूर हो जाने वाली हैं। छप्पर में आग लग जाने पर जो काम धन्धा छोड़कर उसे बुझाने में लग पड़ता है वह बुद्धिमान है और जो बुढ़िया आग को दूर समझ कर अपने काम से काम रखकर चक्की पीसती रहती है वह बुढ़िया अपने आप से ही नहीं अपने शरीर से भी हाथ धो बैठती है। आपकी परिस्थिति ऐसी ही हैं और वे सभी धन प्रेमियों को अपना समय इन सत्कार्यों में लगाने की प्रेरणा करती हैं।

