उच्च पदवी पाकर आप नम्र और सत्यप्रेमी बनिये
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(श्री शंकरलाल गोयल, उदयपुर)
आधुनिक शिक्षा पद्धति विद्यार्थियों में पुस्तकीय शिक्षा के अतिरिक्त एक मनोवैज्ञानिक असर- “झूठी शान” को भी उत्पन्न कर देती है। इससे देश के युवकों में ईर्ष्या-द्वेष, झूठा घमण्ड, परनिन्दा आदि अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं, जो देश की हानि करने के साथ ही स्वयं उनको भी पतन के मार्ग की तरफ ले जाते हैं।
इस दूषित शिक्षा के परिणाम स्वरूप हमारे नवयुवकों में कैसे दोष पैदा हो जाते हैं, इसका पता किसी छोटे बड़े अफसर के रहन-सहन को देखने से भली प्रकार लग सकता है। इनको नौकरी मिलते ही झूठी शान शौकत दिखाने का चस्का सा लग जाता है। वह अपने मित्रों के बीच अपनी पोजीशन ऊंची जाहिर करने के लिये अनेक प्रकार के अवगुणों को अपना लेता है। जरा दूर चलने के लिये ताँगे या किसी अन्य सवारी का सहारा लेता, घर की सफाई व भोजन बनाने को नौकर रखता, साग का थैला उठाने में भी नौकर की आवश्यकता अनुभव करता है। इस तरह वह परिश्रम का महत्व भूलकर झूठे दिखावे की तरफ अग्रसर होता है। इसी प्रकार चाय सिगरेट, बराँडी का एकाध ‘डोज’ भी इन लोगों में आवश्यकीय बातें मानी जाने लगती हैं। आजकल के शिक्षित वर्ग में चाय और सिगरेट की काफी खपत है, और वे इनसे होने वाली हानि को समझकर भी इनसे छूटने का प्रयत्न नहीं करते।
इसी प्रकार उच्च पदवी प्राप्त व्यक्ति मनुष्यता से भी बहुत कुछ वंचित हो जाते हैं। अंगरेज हमारे लिये एक छोटा सा शब्द ‘रेसपेक्ट’ ऐसा छोड़ गये हैं कि उसका असली अर्थ भुला कर हम अपने को देवता सदृश्य पुजवाना चाहते हैं। आपने देखा होगा कि बूढ़ा चपरासी हाथ जोड़कर ‘जय रामजी की’ करता है, पर अफसर साहब उसकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते। वह सब बात कहने के लिये गिड़गिड़ाता है, पर अफसर उसे सच न मान कर ‘बेईमान, नालायक, हरामखोर’ आदि शब्दों से उसके मन को ठेस पहुँचाते हैं। नौकर से जरा सी गलती होने पर या कार्य में देर होने पर अनेकों अफसरों के मुँह से ऐसी गालियों की बौछार निकलती है जो एक सभ्य मनुष्य के लिये सरासर शर्म की बात है।
नौकरी पेशा वालों में दूसरे सहयोगियों के प्रति ईर्ष्या-द्वेष की भावना भी प्रायः देखने में आती है। यह एक तरह का छूत का रोग है। जब कोई नया व्यक्ति आफिस में पैर रखता है तो कुछ समय आफिस में रहने के बाद ही यह उसको लग जाता है, और उसके पवित्र मन को कलुषित बना देता है। यह ईर्ष्या की भावना उच्च अधिकारियों में अधिक देखने में आती है। अगर किसी संस्था में दो अधिकारी एक ही प्रकार का काम करते हों और उनके वेतनों में अन्तर हो तो आये दिन मालिकों के पास एक दूसरे की बुराई के कागजात पहुँचते रहते हैं। इस मनोवृत्ति के कारण वे अपना कर्तव्य भी भली प्रकार पूरा नहीं कर सकते।
उच्च-पदवी प्राप्त अधिकारी एक भावना के भावावेश में आकर तुच्छ होता हुआ भी अपने को ‘उच्च’ मानता है। हालाँकि उसके भी ऊपर अधिक वेतन वाले अफसर होते हैं और उनके आगे उसे ‘आज्ञाकारी सेवक’ बनकर सदा झुकना पड़ता है, पर अपने से छोटों के सामने वह ‘देवता’ ही बनना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति बड़ी हानिकर है। उनको सदैव अपने को जनता का एक साधारण सेवक समझकर अपने कर्तव्य पालन करने में तत्पर रहना चाहिये। तभी वे वास्तव में उच्च अधिकारी हो सकेंगे और सब हृदय से उनका सम्मान करेंगे।

