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Magazine - Year 1957 - Version 2

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योगाभ्यास द्वारा अशुभ कर्मों का नाश

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(प्रो. लालजी राम शुक्ला)

भारतीय अध्यात्म-विद्या के जानकारों ने चार प्रकार के योग माने हैं- मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग, राज योग। मन्त्रयोग में किसी मन्त्र के सहारे चित्त को एकाग्र किया जाता है। किसी मन्त्र का उच्चारण करने तथा उसके अर्थ की भावना करने से साधक का मन संसार के विभिन्न विषयों से खिंचकर एक लक्ष्य की ओर लग जाता है। किसी बाहरी मूर्ति का भी इसमें सहारा लिया जा सकता है। मन्त्रयोग आत्मा की परोक्ष अनुभूति कराने का अन्यतम उपाय है। चेतन सत्ता को अपने से पृथक मानकर उसकी आराधना की जाती है। मन्त्रयोग, भक्ति का एक रूप है। जब ध्यान करने वाले और ध्येय में अत्यन्त घनिष्ठता हो जाती है तो उनका ऐक्य हो जाता है। अपने ही स्वरूप को अपने से पृथक कल्पना करके उस तक पहुँचने की चेष्टा मन्त्रयोग द्वारा की जाती है।

दूसरा हठयोग है। मन्त्रयोग में आत्मा के स्वरूप की विस्मृति रहती है। हठयोग में व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक अपने आपको बाहरी विषयों और विचारों से अलग करना चाहता है। आत्मा से पृथक प्रत्येक पदार्थ से विचारों को अलग करने की चेष्टा हठयोग में होती है। जिस-जिस जगह मन जाय, उस-उस स्थान से मन को अलग करते रहने का प्रयास करना हठयोग है। हठयोग के द्वारा आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता की अनुभूति होती है। क्योंकि जब हम अपनी मनोवृत्तियों का सदा नियन्त्रण करते रहते हैं, तो हमें यह ज्ञान हो जाता है कि हम वृत्तियों से पृथक कोई स्वतन्त्र पदार्थ हैं। इस प्रकार का ज्ञान मानसिक झंझटों का अन्त करने के लिये अत्यन्त आवश्यक है। पहले पहल मन जिस विषय से प्रयत्न करने पर भी नहीं हटता, उसी विषय पर से हठयोग का अभ्यास करने से शीघ्रता से हट जाता है।

मान लीजिये, हमारा मन बार-बार किसी प्रकार की खाने की वस्तु में जाता है, हठयोग के द्वारा मन को उस वस्तु के प्रति उदासीन किया जा सकता है। स्वामी रामतीर्थ को सेब से बड़ा प्रेम था। वे जब सेब को देखते तो उनका मन और सब बातें भूलकर उसी का चिन्तन करने लगता था। इस प्रकार मन के चंचल हो जाने से विचार में विक्षेप हो जाता था। इस कमजोरी को दूर करने के लिए उन्होंने एक सेब खरीदा और उसे अपने पढ़ने की मेज के ऊपर सामने ही रख लिया। वे प्रतिदिन उसकी ओर टकटकी लगाकर देखते थे। इस प्रकार आठ दिन तक उन्होंने उसकी ओर देखा। फिर जब वह सूख गया तो उसे उठाकर फेंक दिया। इस प्रकार उन्होंने एक महीने तक अभ्यास किया और कई सेबों को सड़ाकर फेंका। इसके बाद उनके मन में सेब की बात कभी नहीं आती थी। बार-बार वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने से वे शिथिल हो जाती हैं और मन वश में हो जाता है।

मनुष्य जिस प्रकार का निर्देश अपने आपको देता है, उसका स्वभाव वैसा ही बन जाता है। उसमें अज्ञात शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं। जब मनुष्य प्रतिदिन यह अभ्यास करता है तो सुन्दर से सुन्दर वस्तु के प्रति आकर्षित नहीं होता। इसका एक उदाहरण ‘साइकोलॉजी एण्ड मोरल्स’ नामक पुस्तक में दिया गया है। एक व्यक्ति को कोकीन खाने की आदत पड़ गयी थी। वह चाहता था कि मैं इस हानिकारक आदत को छोड़ दूँ पर अनेक प्रयत्न करने पर भी वह नहीं छूटती थी। वह अपने पास कोकीन नहीं रखता था, पर जब कभी कोकीन की दुकान के पास से निकलता तो अनायास वहाँ ठहर जाता और कोकीन खरीद कर खा लेता। इस लत को नष्ट करने के लिये उसे ‘मति-निर्देश’ का अभ्यास कराया गया। इस अभ्यास में वह व्यक्ति कल्पना में अपने को उस दुकान के पास से निकलता और उसकी कुछ भी परवा न करता हुआ ध्यान करता था। इस प्रकार के अभ्यास से कुछ समय में उसमें अद्भुत परिवर्तन हो गया। अब उस व्यक्ति को उस दुकान के पास से बार-बार निकल जाने पर भी उसकी याद नहीं आती थी और इससे उसका कोकीन का व्यसन छूट गया।

किसी विचार को मन से भुलाने के लिये किसी भी एक तार होने वाली क्रिया पर ध्यान देना अथवा लययोग का अभ्यास करना उपयोगी होता है। कानों में भीतर से आने वाली ध्वनि पर मन को लगाना, श्वास-प्रश्वास की ध्वनि पर मन को लगाना, ॐ की ध्वनि करना, अथवा किसी बाजे की एकाकार ध्वनि में मन को लगा देना आदि विधियों से भी मन शाँत हो जाता है। आत्म-निर्देश भी मन को शाँत अवस्था में ले जाता है। अपने आपको बार-बार यह सुझाने से कि ‘मैं शान्त हूँ’ मन शान्त हो जाता है।

राज योग में आध्यात्मिक विचार की प्रधानता रहती है। जब मनुष्य को अपने स्वरूप का निश्चय हो जाता है, तब उसे प्रसन्न करने वाले नये-नये विचार उत्पन्न होते हैं। तब वह बाहरी विषयों से उत्तेजित होकर विचार नहीं करता, वरन् भीतर से प्रेरणा होने पर विचार करता है। उसके विचार रचनात्मक होते हैं। जब तक मनुष्य के विचार किसी निश्चय से प्रेरित होकर क्रियमाण नहीं होते, तब तक वे संसार का वास्तविक कल्याण नहीं करते। अपने आपका और संसार का कल्याण करने वाले विचार आत्म-प्रेरणा से तथा निश्चयात्मक मनोवृत्ति से उत्पन्न होते हैं। जब मनुष्य को अपने स्वरूप का निश्चय हो जाता है, तब फिर वह आत्मतत्व को ही सब ओर देखता है और उसे सभी कामों में आत्म-साक्षात्कार होता है-

जहँ-जहँ जाऊं सोइ परिक्रमा, जोइ-जोइ करुँ सो पूजा। सहज समाधि सदा उर राखूँ, भाव मिटाऊँ दूजा।।

राजयोग सभी लोगों के लिये संभव नहीं होता। जब तक मनुष्य अपने आपको परमात्मा का एक यंत्रमात्र नहीं मान लेता और सभी प्रकार के कर्म अहंभाव छोड़कर नहीं करता तभी तक उसके कर्म उसके बंधन के कारण बनते हैं। पर जब कोई काम मनुष्य अपने आपको सर्वात्मा का यंत्रमात्र मानकर करता है, तब उसके कर्म और विचार, पुराने अशुभ कर्मों और विचारों के संस्कारों को नष्ट कर देते हैं। राजयोग और आत्मज्ञान की मनोवृत्ति में कोई भेद नहीं है। राजयोगी या ज्ञानी को मन से संघर्ष नहीं करना पड़ता। वह मन को किसी न किसी प्रकार के व्यवसाय से लगाये रहता है। वह व्यवसाय के करने में आनन्द की अनुभूति करता है और व्यवसाय करना ही उसका स्वतः लक्ष्य बन जाता है। जहाँ दूसरे लोग बाहरी फल के लिये लालायित रहते हैं और फल प्राप्त होने पर अपने-आपको भाग्यशाली मानते हैं, आत्म-ज्ञानी बाह्य को नहीं देखता, वह क्रिया के लिये ही क्रिया करता है। इस प्रकार की क्रिया का बाह्य शुभ परिणाम भी होता है, परन्तु इस परिणाम को प्राप्त करना उसके कार्य का उद्देश्य नहीं रहता। काम करने में जो आनन्द रहता है, उसका वही लक्ष्य रहता है।

जो ज्ञान मनुष्य को आत्म निर्देश अथवा अंतर्दर्शन के रूप में प्राप्त हुआ है और जिससे उसे अलौकिक शान्ति प्राप्त हुई है, उसका दूसरे लोगों में वितरण करना भी बड़ा पुनीत कार्य है। इस कार्य से आत्म साक्षात्कार में सहायता मिलती है। ज्ञान जितना ही अधिक दूसरों को दिया जाता है, उतना ही वह बढ़ता है। बार-बार किसी भावना को मन में लाने से वह भावना दृढ़ होती है। वह मनुष्य के चेतन मन से फिर अचेतन मन में चली जाती है और उसके स्वभाव का अंग बन जाती है।

योगाभ्यास कर्म-संस्कारों का नाशक है। किसी भी भले अथवा बुरे कर्म के फल मनुष्य के मन में रहते हैं। ये हमारे अदृश्य मन में संस्कार रूप में पड़े रहते हैं। ये संस्कार समय आने पर फल देते हैं। हमारी पुरानी अनुभूतियाँ अनेकों प्रकार की वासनायें उत्पन्न करती हैं ये वासनायें फिर बाह्यजगत में प्रकाशित होती हैं। इन पुराने संस्कारों तथा वासनाओं को योगाभ्यास द्वारा नष्ट किया जा सकता है। कोई भी भावना, प्रतिकूल भावना द्वारा नष्ट हो सकती है। कर्मों की जड़ अज्ञान और बहिर्मुखता में है। जब मनुष्य आत्म ज्ञान के लिये यत्न करने लगता है और अन्तर्मुखी होने की चेष्टा करता है, तब उसके अनेक कर्म संस्कार अपने आप नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानाग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है। थोड़े समय का योगाभ्यास भी अनेक जन्म के अशुभ कर्मों के फल को नष्ट करने में समर्थ होता है।

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