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Magazine - Year 1957 - Version 2

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चमत्कार को नमस्कार

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(श्री सत्यदेव शर्मा)

अखण्ड ज्योति एवं गायत्री परिवार की विशेषता उसमें सम्मिलित आदर्शवादी सत्पुरुष ही हैं। उनके द्वारा भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का जो महत्वपूर्ण कार्य इस थोड़े समय में हो रहा है उसे देखते हुए भविष्य के सम्बन्ध में सहज ही यह आशा की जा सकती है कि यह संगठन युग निर्माण की भूमिका में महत्वपूर्ण पार्ट अदा करेगा। कुछ परिजनों के परिचय इस अंक में उपस्थित करते हैं। यह परिचय क्रम आगे भी जारी रहेगा।

श्री माधोलाल शर्मा

झालावाड़ शाखा के मन्त्री श्री माधोलाल जी प्रतिज्ञा पर जान की बाजी लड़ा देने वाले, कर्तव्यपरायण धर्मनिष्ठ व्यक्तियों में से हैं। जिस कार्य को हाथ में लेते हैं उसे पूरा किये बिना चैन नहीं लेते। इस कर्तव्य परायणता ने ही उन्हें 8/- मासिक की नौकरी वाले जीवन से ऊपर उठाकर शिक्षा विभाग के वर्तमान प्रतिष्ठित पद तक पहुँचाया है।

श्री माधोलाल जी ने विशद् गायत्री महायज्ञ के समय 46 लक्ष सामूहिक महापुरश्चरण झालावाड़ में कराने का संकल्प किया था। और उसकी पूर्ति तक उपवास, भूमिशयन आदि अनेक कठोर व्रत लिये थे। दैव दुर्विपाक ने माधोलाल जी की परीक्षा लेने के लिए आसुरी संकट उत्पन्न कर दिये। फिर भी वे हताश न हुए, अपने व्रत पर डटे रहे। अनुष्ठान की पूर्णाहुति के समय आर्थिक प्रबन्ध कुछ भी न था पर माता के अनुग्रह का चमत्कार देखिए, दो-चार दिन में ही सब कुछ हो गया। इतने आनन्द और उत्साह के वातावरण में वह सफल हुआ कि देखने वाले अभी तक उसका आश्चर्य मानते हैं।

साधनों का मूल्य तुच्छ है, मनुष्य की लगन ही सब कुछ है। साधनहीन व्यक्ति भी अपनी प्रबल निष्ठा के बल पर क्या कर सकते हैं यह माधोलाल जी की हँसती हुई सूरत किसी को अनायास ही सिखाती रहती है।

श्री सत्यनारायण जी तिवारी

कहते हैं कि- “ज्यों-ज्यों मनुष्य बूढ़ा होता जाता है और मौत के निकट पहुँचता जाता है त्यों-त्यों उसकी ममता और तृष्णा बढ़ती जाती है।” प्राचीन काल में लोग 40 वर्ष के बाद वानप्रस्थ बनाकर लोक सेवा की तैयारी करते थे और 60 वर्ष बाद संन्यास लेकर धर्म प्रचार के लिए परिव्राजक बन जाते थे। पर आज तो बुड्ढों को जितना मोह और तृष्णा देह, धन तथा कुटुम्ब की है उतनी जवानों को भी नहीं होगी। मृत्यु के जो जितना निकट पहुँचता जाता है वह परलोक को उतना ही भूलता जाता है यह हैरत में डालने वाली मनोवृत्ति आज सर्वत्र दीख पड़ती है और कलियुग का प्रभाव बढ़ चला मालूम देता है।

इतने पर भी अपवादों का अभाव नहीं है। इन्दौर के श्री सत्य नारायण जी तिवारी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों को लगभग पूर्ण कर चुके हैं। उनके सभी बच्चे सुशिक्षित और उच्च पदों पर हैं। स्वयं को भी पेन्शन मिलती है अब तिवारी जी ने शेष जीवन उपासना और धर्म सेवा के लिए लगाना निश्चित किया है। प्रतिदिन 10 घन्टे लगाकर अपना 24 लक्ष महापुरश्चरण करने में इन दिनों बड़ी श्रद्धा और तन्मयता के साथ संलग्न हैं।

श्री आनन्दराव मंडलोई

किसान की सीधी सादी पोशाक में कसराबद निवासी श्री. आनन्द राव मंडलोई की विशेषताओं को ढूंढ़ निकालना कठिन है। वे प्रदर्शन और शेखी खोरी से कोसों दूर रहकर जीवन को सुव्यवस्थित बनाने के पक्षपाती रहे हैं। उन्होंने गृहस्थ-योग के आदर्शों को अपना कर अपने परिवार को सम्भ्रान्त और सुशिक्षित बनाने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया है। परिवार के सभी बालक उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं पर साथ ही कृषक परिवार की श्रम शीलता और सादगी को उनमें से किसी ने भी छोड़ा नहीं है। सदाचार सेवा भावना, सात्विकता और सादगी को मंडलोई जी ने अपने तक ही सीमित न रखकर अपने परिवार और नगर में भरपूर मात्रा में फैलाया है। भाषणों की अपेक्षा अपना उदाहरण पेश करने वाले प्रशंसनीय सत्पुरुषों में श्री. आनन्द राव मंडलोई की गणना बड़े गर्व के साथ की जा सकती है।

श्री पातीराम त्रिपाठी

चपुन्ना (इटावा) में किराने की एक छोटी सी दुकान करने वाले पं. पातीराम त्रिपाठी अपने धर्म सहयोगी पं. विशेश्वर दयाल जी द्विवेदी के साथ विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति में मथुरा आये थे। गायत्री और यज्ञ का घर-घर प्रचार करने की आचार्य जी की अपील से प्रभावित होकर आप दोनों ने अपने आस-पास के 24 गाँवों में 24 यज्ञ कराने का संकल्प लिया। आप लोगों ने कठिन परिश्रम करके उस संकल्प को पूरा किया। फिर अन्त में 24 गाँवों का एक सामूहिक बड़ा यज्ञ चपुन्ना में हुआ। जिस खेत में यज्ञ हुआ था वह पक्की सड़क से बिलकुल सटा हुआ श्री पातीराम त्रिपाठी का है। उन्होंने उसे गायत्री माता को अर्पण कर दिया। इस खेत में अब एक सुन्दर बगीचा लग रहा है और जल्दी ही पक्का गायत्री मन्दिर तथा यज्ञशाला बनने वाली है। श्री पातीराम जी त्रिपाठी और विशेश्वर दयाल जी दुबे की युगल जोड़ी ने उस क्षेत्र में 24 गायत्री परिवार की शाखाएं स्थापित करने का संकल्प लिया है आशा है कि वह पूरा होकर रहेगा। जिनके सच्ची लगन हो वे पातीराम जी की तरह बहुत कुछ कर सकते हैं।

डॉ. रामनारायण भटनागर

इटौआ धुरा (बरेली) के डॉ. रामनरायन जी भटनागर वहाँ की ग्राम पंचायत के प्रधान तथा एक सेवाभावी होम्योपैथिक डॉक्टर हैं। आपने जीवन भर बड़ी कठोर गायत्री साधना अनेक व्यक्तियों के साथ पूरी की है। घर में रहकर सफेद कपड़े पहनते हुए भी कोई व्यक्ति जिस प्रकार सच्चे संत का जीवन व्यतीत कर सकता है डॉक्टर साहब इस बात के एक प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, वे स्वयं तो नैष्ठिक गायत्री उपासक हैं ही उन्होंने अपने प्रयत्न से उस क्षेत्र में दूर-दूर तक अनेकों गायत्री उपासक बनाये हैं। गायत्री तपोभूमि के सभी प्रवृत्तियों में डॉक्टर साहब सदा अग्रणी रहते हैं।

श्री नन्दकिशोर शर्मा

सुसनेर (मन्दसोर) शाखा के मन्त्री पं. नन्दकिशोर शर्मा बड़ी लगन के कर्मनिष्ठ धर्म प्रेमी हैं। सन् 40 के अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य हैं और गत 17 वर्षों से धर्म प्रचार के कार्य में अपने व्यक्तिगत अन्य कार्यों की तरह ही दिलचस्पी लेते रहे हैं। उस प्रदेश के पिछड़े लोगों के हृदय जीतकर आपने हजारों से मद्य माँस का सेवन छुड़ाया और जनेऊ धारण कराके पवित्र जीवन व्यतीत कराने का व्रत लिवाया है। इस वर्ष ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्ति के लिए आपने 108 छोटे बड़े हवन कराने का संकल्प लिया है जिसमें से अधिक संकल्प पूरा भी हो चुका है। एक वर्ष में शर्माजी द्वारा 108 यज्ञ पूरा होने की पूर्ण सम्भावना है।

श्री कन्हैयालाल श्रीवास्तव

रिसिया (बहरायच) शाखा के मन्त्री श्री कन्हैयालाल जी श्रीवास्तव एम.ए. वहाँ के सरस्वती उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य तथा जिला अध्यापक मंडल के प्रधान हैं। व्यक्तिगत जीवन में उच्च चरित्र एवं अधिकाधिक उपासना पर आप जितना ध्यान देते हैं उतना ही सार्वजनिक सेवा, लोकहित और जन कल्याण का महत्व भी समझते हैं। आपने प्रयत्न से रिसिया शाखा के सदस्यों के एक 24 हजार का सामूहिक अनुष्ठान प्रति दिन पूरे एक वर्ष तक करने का निश्चय किया है। यह संकल्प बड़े आनन्द पूर्वक निभ रहा है। इस संकल्प के एक वर्ष पूरा होने पर एक बड़ा सामूहिक यज्ञ करने तथा रिसिया गायत्री मन्दिर एवं यज्ञशाला बनाने का ठोस कार्यक्रम अभी से बन रहा है। प्रभाव शाली व्यक्ति अपने प्रभाव का उपयोग जनता को सन्मार्ग में प्रवृत्त करने के लिये करें तो वे श्री कन्हैयालाल जी की तरह बहुत उपकार कर सकते हैं।

श्री महादेव प्रसाद माहेश्वरी

स्नातकोत्तर बुनियादी प्रशिक्षण महाविद्यालय भोपाल के लैक्चरार श्री महादेव प्रसाद जी माहेश्वर एम.ए. एल.टी. बी.एड. अपनी शिक्षा समाप्त करने के बाद में स्कूलों के इन्सपैक्टर आदि कई महत्वपूर्ण शिक्षा अधिकारी पदों पर कार्य करते रहे हैं। आपका अनेकों व्यक्तियों से नित्य संपर्क होता है और अनेक प्रकार के विचार विनिमय करने पड़ते हैं। उस विचारों के आदान प्रदान से आप गायत्री की महत्ता की चर्चा भी करते रहते हैं। इस प्रकार आपने अब तक हजारों गायत्री उपासक बनाये। श्री माहेश्वरी जी की भाँति लोग अपने मिलने वालों से यदि गायत्री की महत्ता की चर्चा करते रहने का स्वभाव बना लें तो वे सहस्रों मनुष्यों को सन्मार्ग प्रवृत्त करने का पुण्य लाभ कर सकते हैं।

श्री गिरिजासहाय खरे

श्री गिरिजा सहाय झाँसी जिले के ग्राम बानपुर के रहने वाले तथा रेलवे में डी.एस. आफिस में क्लर्क हैं। गत वर्ष झाँसी में होने वाले नव कुण्डी यज्ञ आयोजन में इनका संपर्क भी बालकृष्ण अग्रवाल से हो गया और उसी समय से ये बालकृष्णजी के अभिन्न साथी बन गये। अपने नौकरी के समय के बाद अक्सर ये बालकृष्ण जी के साथ कार्य करते देखे जाते हैं। उनके कामों में हाथ बटाने लगे और आते ही इस कार्य क्षेत्र में जुट पड़े। झाँसी में अब गायत्री परिवार में लगभग 100 सदस्य हैं जिसमें अधिकाँश इन्हीं से प्रभावित होकर बने हैं। इनके परिवार के सब आदमी बच्चे, बूढ़े, स्त्रियाँ सभी गायत्री उपासक हो गये हैं। इन्होंने संकल्प किया है कि अपने क्षेत्र में गायत्री माता और यज्ञ पिता का संदेश घर-घर और जन-जन में सुनायेंगे। इन्होंने झाँसी के अतिरिक्त बानपुर, टीकमगढ़, नतरा, बुल्हार आदि स्थानों में गायत्री का प्रचार किया।

जब से ये गायत्री माता की शरण में आये हैं इनका जीवन ही बदल गया है। अब ये परम सात्विक एवं सदाचारी जीव हो गये हैं। अब नौकरी के सिवाय सारा समय उपासना और धर्म कार्यों में जाता है। जो कोई भी इनके संपर्क में आता है चाहे मित्र, रिश्तेदार अथवा मिलने वाला हो उससे गायत्री माता और यज्ञ पिता का सन्देश सुनाकर उनको अपनाने की अपील करते रहते हैं।

इन्होंने श्री बालकृष्ण जी अग्रवाल और अन्य गायत्री परिवार के सदस्यों के साथ झाँसी जिले के गाँव-गाँव में गायत्री प्रचार करने का व्रत लिया है।

श्री देवेन्द्रनाथ साहु

खूँटी (राँची) के श्री देवेन्द्र नाथ साहु को राजर्षि कहा जा सकता है। राजनीति के प्रकाण्ड पंडित काँग्रेस के प्रमुख पदाधिकारी, अनेक संस्थाओं के संचालक, उस क्षेत्र के प्रभावशाली जन नेता होते हुए भी आपकी आत्मा उस प्रकार के कार्यों से सन्तुष्ट न हुई। आज की परिस्थिति में उन्होंने चरित्र निर्माण साँस्कृतिक पुनरुत्थान एवं अध्यात्म उपासना को ही मनुष्य जाति की सर्वोपरि आवश्यकता समझा है। आप प्रतिदिन 6-6 घन्टे गायत्री उपासना में तन्मय रहते हैं, हवन आपका नित्य नियम है। उस प्रदेश में दूर-दूर तक गायत्री प्रसार आपने किया हैं। खूँटी में एक बहुत बड़ा गायत्री यज्ञ करा चुके हैं। वहाँ की शाखा आपके प्रयत्न स्वरूप बड़ा कार्य कर रही है।

श्री माँगीलाल वर्मा

संयोग एवं प्रारब्धवश धन अनेकों घटिया मनुष्यों को भी मिल जाता है पर आदर्शवाद की उच्च भावनायें किन्हीं विरले ही भाग्यशाली मनुष्यों को प्राप्त होती हैं। आन्तरिक महानता ही वह तत्व है जिसके उपलब्ध होने से छोटी स्थिति के मनुष्य भी चिरस्मरणीय महापुरुष बन जाते हैं। आज के नवयुवकों में अनेक दिशाओं में अग्रसर होने की महत्वाकाँक्षाएं हिलोरें मारती हैं पर ऐसे तरुण ढूंढ़े नहीं मिलते जो मानव-महामानव बनने की महत्वाकाँक्षा से अनुप्राणित होते हों। कोई राष्ट्र या समाज सच्चे अर्थों में आदर्शवादी नर रत्नों से धनी बनता है।

मोड़क के अध्यापक माँगीलाल वर्मा की आदर्शवादिता उनके हर कार्य से टपकती है। उन्हें जितना समीप से देखा जाय उतना ही उनकी ऊंचाई को समझा जा सकता है। गत वर्षों में उन्होंने जिस तत्परता से गायत्री माता के प्रसार में आत्मदान किया है वह भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य है।

श्री गे.घो. गोखले

सुविधाजनक परिस्थितियों के बीच मनुष्य बड़े -बड़े कार्य आसानी से कर सकता है, उसमें उसकी रुचि ही प्रशंसनीय है। पर उसकी निष्ठा की परीक्षा तब होती है जब अभाव और कठिनाइयों की परीक्षा से गुजर कर अपने खरेपन और श्रद्धा की गहराई की परीक्षा देनी पड़ती है।

नागपुर के वायरलैस आपरेटर श्री गोखले अपनी दुर्बल काया और ऐसी पारिवारिक कठिनाइयों के बीच हंसते रहते हैं जिनमें कोई और होता तो घबड़ा गया होता। गोखले जी उन लोगों में से नहीं हैं जो अमुक सुविधा मिलने पर अमुक सत्कार्य करने की शर्त लगाते हों। वे परिस्थितियों की परवाह किये बिना कर्तव्य करते रहने वाले आदर्शवादी हैं। उसने अपने सहयोगियों की सहायता से नागपुर में अच्छा गायत्री प्रचार किया है।

पं. ब्रह्मानन्द शर्मा

आँवा (कोटा) हाईस्कूल के अध्यापक श्री. ब्रह्मानन्द शर्मा नौकरी के लिए मास्टरी करने वाले कर्मचारी नहीं वरन् सच्चे अर्थों में छात्रों का जीवन निर्माण करने वाले उपाध्याय हैं। ज्ञान प्रसार उनके जीवन का व्रत है। इस पुनीत कार्य को उन्होंने अपना एक धर्म कर्तव्य बना लिया है। स्कूल में छात्रों को वे केवल पाठ्यक्रम ही पूरा नहीं कराते वरन् उच्च चरित्र बनाने का व्यावहारिक मार्ग भी सुझाते हैं। स्कूल से बाहर भी वे घर में बाजार में रिश्तेदारों में, स्वजन सम्बन्धियों में, परिचित अपरिचितों में धर्म प्रसार करते रहते हैं। श्री ब्रह्मानन्द जी की प्रेरणा से अनेकों ने अपने कुविचार और दुष्कर्म छोड़े हैं तथा परमार्थिक उपेक्षा छोड़कर गायत्री उपासना में श्रद्धा स्थापित की है। मनुष्य सच्चे मन से जिस काम में लगता है उसमें सफलता प्राप्त होती ही है। परमार्थिक लक्ष धारण करने वाले लोग अपनी अभीष्ट दिशा में चुपचाप धीरे-धीरे चलते रहकर भी कितने आगे बढ़ सकते हैं इसका एक प्रमाण ब्रह्मानन्द जी हैं।

श्री मकेन्द्रनाथ भार्गव

मथुरा निवासी श्री. महेन्द्रनाथ भार्गव सज्जनता, उदारता और सेवा भावना की प्रतिमा हैं। जीवन भर उन्होंने ऊँचे व्यवसायी के रूप में हजारों लाखों रुपयों का व्यापार किया है तथा प्रतिष्ठित काँग्रेस कार्यकर्ता के रूप में जीवन के आरम्भ से ही राष्ट्रीय कार्य करते रहे हैं। आपके पिताजी बड़े चरित्रवान सरकारी अफसर थे, वे बड़े उत्तरदायित्व पूर्ण पद पर थे पर कभी एक पैसा रिश्वत का छुआ तक नहीं और नौकरी से छुट्टी पाते ही संन्यास लेकर हिमालय में तप करने चले गये। ये सद्गुण श्री महेन्द्रनाथ को भी अपने पिताजी से विरासत में मिले हैं। अनेकों व्यक्ति, अपनी अनेक कठिनाइयों में सहायता प्राप्त करने के लिए श्री भार्गव जी को ढूंढ़ते उनके पीछे लगे फिरते देखे जा सकते हैं। और वे बिना किसी से कोई भौतिक लाभ उठाये परम निस्वार्थ भाव से उनका कार्य कर देने में अपना समय लगाते रहते हैं। गायत्री तपोभूमि को निरन्तर उनके समय, श्रम और सहयोग की वर्षों से महत्वपूर्ण सेवा मिल रही है।

श्री कृष्ण कुमारी जी पाण्डेय

सब प्रकार के मानवीय अधिकारों से वंचित आज की भारतीय नारी ईश्वर उपासना के अधिकार से भी धर्म ध्वजियों द्वारा वंचित कर दी गई है। मुसलमान स्त्री कुरान पढ़ सकती है, ईसाई स्त्री बाइबिल पड़ सकती है पर अभागिनी हिन्दू स्त्री अपने धर्म कर्तव्यों की आकाँक्षा करती है। भारतीय धर्म की मूल गंगोत्री गायत्री की उपासना करना चाहती है तो अनुदार, अविवेकी एवं प्रतिगामी लोग उन्हें रोकने में विरोध करने में ही अपनी शेखी समझते हैं।

प्रसन्नता की बात है कि नारी में विवेक जागृत हुआ है और इन सड़े-गले बन्धनों की परवा न करके मानव जीवन की वास्तविकता तक पहुँचने का साहस पूर्वक प्रयत्न कर रही है। उसने उपासना के ऋषि आदर्शों की ओर भी कदम बढ़ाया है। श्री कृष्णा कुमारी ने 24 लक्ष के कई महापुरश्चरण किये हैं। अगणित उपासिकाएं बनाई हैं। अभी छिबरायज्ञ में एक बड़ा यज्ञ कराया है। कई बार तपोभूमि आई हैं। इनके पतिदेव तथा बच्चे सभी अनन्य गायत्री उपासक हैं।

श्री यादराम शर्मा

आज सर्वत्र पक्षपात, स्वार्थ, पार्टीबन्दी एवं खुदगर्जी का बोलबाला है। जिसका जिससे मतलब निकलता है। वह उसको खुश करने और अपने पक्ष में रखने की कोशिश करता है। इस पार्टीबन्दी ने ग्रामीण क्षेत्र की पंचायतों पर बुरी तरह कब्जा कर लिया है। सच्चे, इन्साफ पसंद, बुराई को रोकने वाले और इन्साफ का समर्थन करने वाले पंच कहीं बड़ी कठिनाई से ही ढूंढ़े मिलते हैं।

पला कसेर (बुलन्द शहर) निवासी श्री यादराम शर्मा, एक आदर्श सरपंच हैं, जिनका अनुकरण देश की पंचायतों के पंच सरपंच कर सकते हैं। पीड़ितों के समर्थन में किसी का बुरा बनना पड़े और उससे अपनी कुछ हानि भी उठानी पड़े तो भी उसकी परवाह न करके सत्य पर दृढ़ रहना मनुष्य के खरेपन का चिन्ह है। गायत्री परिवार को श्री यादरामजी जैसे सच्चे लोगों पर बड़ा गर्व है।

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