गायत्री उपासना के अनुभव
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घर छोड़ने वाला व्यक्ति वापस आया
उरई (यू.पी.) से सु. शिवकान्ती देवी मिश्र लिखती हैं कि मेरे बहनोई श्री माधव प्रसाद मिश्र बिना सूचना दिये कहीं चले गये थे जिससे परिवार के सब लोग अत्यन्त दुखी थे। इस दुख की निवृत्ति के लिए हमने गायत्री जप किया और आचार्य जी से निवेदन किया। उन्होंने उनका चित्र मंगाकर गायत्री माता की कृपा प्राप्त कराई जिससे 7 जून को माधव प्रसाद जी घर वापस आ गये। इस कृपा के लिये मैं पूज्य गुरुदेव को श्रद्धाँजलि अर्पित करती हूँ।
साँप के काटे की प्राण रक्षा
कचनरा मंडी (पो. नवाबगंज, बरेली) से श्री विद्यराम गंगवार लिखते हैं कि, मैं ता. 15.7.57 को फावड़ा लेकर अपने खेत पर बाँध बाँधने गया। एक बाँध बाँध कर दूसरी तरफ जा रहा था कि एक साँप ने पैर में डस लिया। मैंने उसे फावड़े के नीचे दबा दिया और 4 खेत की दूरी पर लाठी लेने गया। वहाँ से लौटा तो साँप को वहीं पाया और लाठी से मार दिया। इसके बाद गायत्री मंत्र से वहाँ चीरा दिया और मंत्र पढ़कर बन्द लगा दिया। उस समय मुझे ठीक होश नहीं था, पर शाम तक माता की दया से मैं बिल्कुल चंगा हो गया।
काल के गाल से वापस
कसही बहरा (रायपुर म.प्रा.) से श्री रामगरीब अग्रवाल लिखते हैं कि मेरे पूज्य पिताजी का स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया था। जब डाक्टरी इलाज से कुछ लाभ नहीं हुआ तो मैं उनके स्वास्थ्य के लिये गायत्री जप करने लगा और उनसे भी आग्रह करके जप कराने लगा। इससे उनको काफी लाभ हुआ। फिर एक-एक कारबार में विशेष घाटा हो जाने से उनको बड़ा धक्का लगा और उन्होंने फिर खाट पकड़ ली। इससे रक्षा पाने को मैंने सवालक्ष अनुष्ठान आरम्भ किया पर सात-आठ दिन बीतने पर ही मुझे माता की तरफ से ऐसा आभास मिला कि तीन मास बाद तुम्हारे परिवार पर महान संकट आयेगा। ठीक तीन मास बाद चैत्र सुदी सप्तमी को पिताजी की हालत एकाएक बिगड़ गई और बचने की कोई आशा नहीं रही। पर उसी समय मेरा जप पूरा हुआ। मैंने कलश का कुछ जल पिताजी पर छिड़का और कुछ पिला दिया। इससे उनकी दशा में आश्चर्यजनक रूप से परिवर्तन हो गया और अब वे स्वस्थ हैं।
मरणासन्न रोग से मुक्ति
श्री रंगलाल मिश्र पछाये गाँव (इटावा) से लिखते हैं कि मेरी भाभी रक्तस्राव से मरणासन्न दशा में थी। चारपाई का सहारा देकर बैठाने में भी बेहोश हो जाती थी। हालत इतनी खराब थी कि इटावा से डॉक्टर बुलाने का भी समय नहीं रह गया था। अतः गायत्री के लघु अनुष्ठान का संकल्प किया तथा उसी अचेतावस्था में ताँगे में रखकर इटावा ले गया। रास्ते में कई बार प्राण निकलते जान पड़े, गायत्री माता की कृपा से इटावा पहुँच कर 4 दिन में निरोग हो गईं।
पारिवारिक कलह शाँति
श्री सीताराम श्रीवास्तव पछायागाँव (इटावा) से लिखते हैं कि मुझे सर्वप्रथम अक्टूबर 1955 को ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ने को मिली। उसके बाद जब मेरे परिवार में कलह हुई तो मैं लेटे ही लेटे मन में मन्त्र जपने लगा फलस्वरूप दो दिन में शाँति हो गई। इसी प्रकार मुझे बीड़ी पीने का दुर्व्यसन था जो छोड़ देने पर शरीर पर बुरा असर पड़ता था। मैंने गायत्री माता से इसके लिये प्रार्थना की। उसके बाद मैंने वह आदत त्याग दी और कोई शारीरिक कष्ट नहीं हुआ।
मसान रोग दूर हो गया
श्री श्यामलाल ‘दीन’ नगला सुम्मेर (जिला अलीगढ़) लिखते हैं कि मेरे गाँव में एक सजातीय भाई पीतम्बर का लड़का मसान रोग से पीड़ित था। वैद्यों और झाड़-फूँक करने वालों ने बहुत उपाय किये पर लाभ न हुआ। जब मुझसे कहा गया तो मैंने गायत्री मंत्र का जल और तपोभूमि की यज्ञ की भस्म दी जिससे बच्चा तुरन्त स्वस्थ हो गया। यह देखकर दर्शक चकित रह गये और गायत्री माता का गुणानुवाद करने लगे।
गायत्री माता की कृपा से यमदूत भाग गये
श्रीमती सावित्री देवी फिलौर (पंजाब) से लिखती हैं कि सन् 1956 की 21 अप्रैल को गायत्री तपोभूमि में जो ‘विशद् गायत्री महायज्ञ’ होने वाला था, उसमें आने का निमंत्रण मुझे आचार्य जी ने भेजा था, और मेरी उसे देखने की बड़ी अभिलाषा थी। अकस्मात् 17 ता. की रात को एक बड़ी दुर्घटना घटी। लगभग दस बजे मैं न जाने कैसे सोती हुई उठकर खड़ी-खड़ी गिर पड़ी और बड़ी देर तक मृत-तुल्य बनी रही। पर न मालूम कौन सी शक्ति ने मेरी प्राण-रक्षा की। मैं बड़ी कमजोर हो गई थी, तो भी 19 अप्रैल को मथुरा के लिये रवाना हो गई। यह गायत्री माता की महिमा ही थी कि मरते-मरते भी मैंने इस महायज्ञ के दर्शन कर लिये। जब मैं गिरी थी तो चोट लगने से सिर से बहुत सा खून निकल गया था और वह इतना कमजोर हो गया कि बरसात के दिनों में जरा भी हवा लगने से वह पत्थर की तरह सुन्न हो जाता था। इस घटना के बाद भी यमदूतों ने मेरे ऊपर बार-बार हमले किये पर गायत्री माता बराबर मेरी रक्षा करती रहीं। कई महीने तक कितने ही डाक्टरों, वैद्यों, हकीमों से मेरी चिकित्सा भी कराई गई, पर उससे प्रायः नुकसान ही हुआ। तब मैंने आचार्य जी को पत्र लिखा कि सात महीने से यमदूतों से मेरी लड़ाई हो रही है और मैंने अब गायत्री माता से कह दिया है कि अब मैं कोई दवाई नहीं खाऊंगी चाहे मौत ही आ जाये। आचार्य जी ने मुझे लिखा कि अब तुम ठीक हो जाओगी और उनके आशीर्वाद से अब मेरा स्वास्थ्य पहले से बहुत कुछ सुधर गया है।
मन की अशान्ति दूर हो गई
श्रीमती मगनदेवी अध्यापिका, बिजनौर (यू.पी.) से लिखती हैं कि पहले मेरा मन प्रायः अशाँत रहा करता था। पर जब से गायत्री जप व हवन का नियम बना लिया है तब से एक अजीब प्रकार की शान्ति का अनुभव हुआ करता है और अब कठिन से कठिन काम या समस्या आ जाने से भी कोई अशान्ति पैदा नहीं हो पाती। माता की कृपा से एक चमत्कार का अनुभव हुआ करता है।
मेरा जीवन ही बदल गया
श्री ताराचन्द अधरिया गाँव सोनासिली (जि. रायपुर) से लिखते हैं कि बचपन से मैं अनेक दुर्व्यसनों में फंस गया था; न मालूम किस आकर्षण से मैं गायत्री तपोभूमि मथुरा की तरफ खिंच गया और वहाँ 39 दिन में सवा-सवा लाख के तीन अनुष्ठान किये। इस बीच में एक दिन रात के आठ बजे गायत्री माता की मूर्ति के सामने बैठे-बैठे मुझे उन्माद सा हो गया और चीख मार कर माता के सामने गिर पड़ा तथा बीस मिनट के लगभग रोता हुआ पड़ा रहा। इस समय में मैं माता की अनोखी वाणी को भी सुनता रहा जिससे मेरी खराब आदतें सदा के लिये दूर हो गईं और मेरी समस्त शंकाओं का समाधान होकर मेरा जीवन ही बदल गया।
मनोकुल वर मिल गया
श्री भालचन्द्र नारायण कवटेकर बड़ौदा (गुजरात) से लिखते हैं कि मेरी लड़की चि. कमल सन् 1954 में मैट्रिक पास हुई थी और उसके लिये सुयोग्य वर ढूंढ़ने को मैं बड़ा चिन्तित रहता था। मैं किसी अमीर व्यक्ति से विवाह करना नहीं चाहता था, पर वह गायत्री माता की उपासना करने वाला हो तो बहुत ठीक है। इसी समय मेरा तबादला भी धोलका को हो गया और मैं अपने कुटुम्ब को छोड़कर वहाँ रहने लगा जिससे लड़की के विवाह की समस्या और भी कठिन हो गई। पर मैं लगातार गायत्री जप और माता जी की उपासना करता रहा जिसके फल से अनायास ही बड़ा सुयोग्य वर मिल गया और मेरा तबादला भी पुनः बड़ौदा को हो गया। इस प्रकार माता की कृपा से मेरी दोनों मनोकामनाएं पूरी हो गईं।
बच्चे की प्राण रक्षा हुई
श्री गोवर्द्धन भट्ट शास्त्री सीवानी मालवा (म.प्र.) से लिखते हैं कि यहाँ आँवली घाट पर अभी एक गायत्री महायज्ञ हुआ था जिसमें यजमान थे स्कूल इन्सपेक्टर श्री बैजनाथ प्रसाद शर्मा और कर्मकाण्ड मैं स्वयं करा रहा था। यज्ञ प्रारम्भ होने के दूसरे दिन साइकिल पर एक शिक्षक आये और इन्सपेक्टर साहब को सूचना दी कि आपका बच्चा बहुत बीमार है, बचने की आशा नहीं है। इन्सपेक्टर साहब ने कहा जो भी हो मैं पूर्णाहुति किये बिना यहाँ से नहीं हट सकता। लोगों ने बहुत समझाया कि जाकर बच्चे को देखिये, पर वे गायत्री माता में विश्वास रख कर अटल रहे। दूसरे दिन अन्य व्यक्ति आये और उनसे मालूम हुआ कि अब बच्चा बिलकुल स्वस्थ है। इस सूचना से यज्ञ में आनन्द छा गया और अन्त तक कार्यक्रम बड़ी ही श्रद्धा से पूर्ण हुआ।
इन्फ्लुएंजा अच्छा हो गया
श्री विश्वनाथ पाण्डेय, दानापुर (पटना) से लिखते हैं कि ता. 7 जून को मैं अपने चाचा के यहाँ पहुँचा। दरवाजे के बाहर से ही मुझे रोने, पीटने का शब्द सुनाई पड़ा। जैसे ही मैं अन्दर पहुँचा वे और भी जोर से विलाप करने लगे। मालूम हुआ कि विजय को इन्फ्लुएंजा हो गया है और उसकी बोली बन्द हो जाती है। डॉक्टर से इलाज कराया, पर लाभ न हुआ। मैंने चाचा से कहा कि किसी कुँए से एक हाथ से जल खींच कर ले आइये। मैंने तुलसीदल जल में डालकर गायत्री से उसे अभिमंत्रित किया तथा उससे विजय का मुख धुलवा दिया शेष पिला दिया। माता की कृपा से वह शाम तक ही चंगा हो गया।
प्रेत भाग गया
दानापुर में ही एक गायत्री उपासक हवन कर रहे थे कि उन पर प्रेत का आवेश हो आया। यह देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि गायत्री के समक्ष प्रेत कैसे आ गया? इससे तो गायत्री का विश्वास ही जाता रहेगा। उसी समय वे महाशय पूर्ववत् स्वस्थ हो गये। मालूम हुआ कि वे द्रव्य लेकर झाड़फूँक का काम किया करते हैं। यज्ञ करते समय उनको कुछ अहंकार हो गया और उसी के फल से प्रेत का आक्रमण हुआ, पर गायत्री उपासना के प्रभाव ने उनकी रक्षा की।
आर्थिक स्थिति सुधर गई
श्री सोहनलाल गाँव नंगी अनता, खास (जि. पीलीभीत) लिखते हैं कि मेरे भाई श्री पंचमलाल ‘सरल’ कहते हैं कि लगभग 3 वर्ष से, जब से मैंने गायत्री माता की शरण ली है, मेरे पास कभी धनाभाव नहीं रहा और मैं निरन्तर उन्नति करता जा रहा हूँ।
हनुमान जी का प्रादुर्भाव
श्री मक्खनलाल जी दीक्षित, “साहित्य रत्न” दिगौड़ा से लिखते हैं कि ता. 20, 21 अप्रैल को गायत्री परिवार, दिगौड़ा की ओर से देवरवा ग्राम में गायत्री-जप व हवन का विशेष आयोजन किया गया था। इस कार्य का संचालन करने के हेतु दादा दुर्गा प्रसाद जी टीकमगढ़ से निमंत्रित किये गये किन्तु किसी कारण वश वे प्रथम दिन न आ सके। उसी दिन रात को सोते समय किसी ने उनको आदेश दिया कि तुम शीघ्र ही आमंत्रित स्थान पर जाओ। दादा जी चौंक पड़े और दूसरे ही दिन प्रातः देवरवा पहुँच गये। देवरवा के मन्दिर में हनुमानजी की प्रतिमा थी वह सपाट पत्थर की तरह थी, उसी पर सिन्दूर चढ़ा दिया जाता था। दादाजी ने हनुमान जी का दर्शन किया और प्रेम विभोर होकर उनको नया सिन्दूर चढ़ाने लगे। अचानक मूर्ति पर वर्षों से चढ़ा अंगराग खसक पड़ा और भीतर से हनुमानजी की ऐसी सुरम्य और विशाल मूर्ति निकल पड़ी कि वैसी बहुत कम मन्दिरों में दिखाई पड़ती है। यह दृश्य देखकर जनता जय-जयकार कर उठी और सबके मुँह से यही निकलने लगा- “प्रेम से प्रकट होंहि भगवाना।”
भूतबाधा दूर हुई
श्री नर्मदाशंकर ब्रह्मचारी राजकोट से लिखते हैं कि “कुछ समय पहले मैं ‘सीतलानु कालापड़’ नामक काठियाबाड़ के एक गाँव में गया था। वहाँ मेरे दो मित्र बल्लभदास और जमनादास नाम के रहते हैं। उन दोनों की स्त्रियों पर अमरेली के किसी पापी ब्राह्मण का आवेश होता था, जिससे घर भर को बड़ा कष्ट था। इसके लिए सैंकड़ों उपाय कराये पर कोई फल न निकला। जमनादास की माता ने मुझे भी सब हाल सुनाया और विलाप करने लगी। मैंने उनको विश्वास दिलाया कि वेद माता गायत्री के प्रयोग से सब प्रकार की बाधा दूर हो सकती है। तब मैंने उनको पंचाक्षर मंत्र का 108 जप नित्य करने को बताया और अपने मन में संकल्प किया मैं इसके निमित्त सवालक्ष जप का अनुष्ठान करूंगा और इस अवसर पर नमक, मिर्च, तेल आदि त्याग कर केवल सात्विक भोजन करूंगा। यह सब करके मैं तो दूसरे दिन की गाड़ी से राजकोट वापस आ गया। वहाँ जब उन स्त्रियों को भूतबाधा हुई तो जमनादास ने गायत्री मंत्र पढ़कर पानी पिला दिया। वह भूत कहने लगा “मैं जाता हूँ”- “मैं जाता हूँ।” तब से वे सब कुशल से रहने लगे।
नदी में डूबने से बचा
श्री बसन्तीलाल श्रीवास्तव, भितरवा (म.प्र.) से लिखते हैं कि “एकबार मैं अपने गाँव की एक पहाड़ी नदी में तैर रहा था। अकस्मात् गहरे पानी में चला गया और पानी के तेज बहाव में बहने लगा। यह देखकर मेरे साथ के अन्य युवक डर कर गाँव को भाग गये। इतने में ऊपर से पानी भी बरसने लगा। मैं 15 मिनट तक बहते-बहते एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ नदी का पानी 175 फीट ऊपर से नीचे की तरफ बड़े वेग से गिरता था। यह देखकर मेरे भीतर शून्यता छा गयी और मेरी जबान बन्द हो गई। मेरे मन में एकाएक यह भाव आया कि गायत्री माता मेरे प्राण ले। मैं इतना ही संकल्प कर पाया कि ठीक उस जगह जा पहुँचा जहाँ से नदी नीचे गिरती थी। आधी मिनट में ही मेरी यह संसार यात्रा समाप्त हो जाने वाली थी। पर अचानक मैं एक बड़े पत्थर से जाकर रुका जो पानी में एक हाथ डूबा हुआ था। वहाँ मैं बड़े आराम से बैठ गया। मैं नहीं कह सकता कि मुझे किस प्रकार यह भान हुआ कि यहाँ चट्टान है और इससे मैं बच जाऊंगा। उस दिन से गायत्री माता की जप ही मेरे जीवन का प्रधान कार्य बना हुआ है।
विवाह की बाधा टल गई
बहराइच से श्री लालताप्रसाद जी पेन्शनर र. कानूनगो लिखते हैं- “मुझे तो यह संसार ही वेद-माता का चमत्कार जान पड़ता है और पग-पग पर उसके अनुभव दिखलाई पड़ते हैं। मुझे मोतियाबिन्द हो गया था समझा कि अब नौकरी से हटना पड़ेगा और इससे बहुत घबड़ाया। पर माता की कृपा से आपरेशन द्वारा दोनों आँखें ठीक हो गईं। इससे आठ साल तक काम करके पेन्शन मिली। अब 11 वर्ष से पेंशन ले रहा हूँ। मेरी भतीजी के विवाह में बड़ी अड़चनें पड़ीं। हमने वरिच्छा तिलक दे दिया पर ब्याह की तिथि पर उन्होंने इनकार कर दिया। अब तो हम लोगों के होश ठिकाने न रहे। तब गायत्री माता की शरण ली जिससे दूसरी जगह सुगमता से ब्याह हो गया और पहले से घर, वर सब अच्छा मिला। मेरी पोती मनोरमा देवी इन्ट्रेन्स क्लास में इंग्लिश में बहुत कमजोर थी पर गायत्री जप करते- करते वह एफ.ए., बी.ए., एम.ए, (प्रीवि.) कर चुकी है और अब एम.ए. (फायनल) की तैयारी कर रही है। मेरे एक रिश्तेदार बा. ज्योतिष स्वरूप जी पर जाल करने का सरकारी मुकदमा चलाया गया। तब तक मुकदमा चलता रहा वे नित्यप्रति 10 माला गायत्री मंत्र की जपते रहे, अवकाश न मिलने पर दूसरों से जप कराया। माता की दया से साफ छूट गये और पूरी तनख्वाह मिली।”

