धर्म का प्राचीन और नवीन स्वरूप
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(“एक जिज्ञासु”)
‘धर्म’ संसार का सबसे प्राचीन संगठन है। वह एक ऐसी संस्था है जिसने मनुष्य को पाशविक स्थिति से निकाल कर सभ्य और सुसंस्कृत बनाया है और उसको एक असहाय प्राणी के बजाय शक्तिशाली, सामाजिक प्राणी के रूप में बदल दिया है। अति प्राचीन काल से लोग धार्मिक क्रिया काण्डों, देवताओं की पूजा के उत्सवों, पवित्र तीर्थों के स्नान आदि के द्वारा ही परस्पर मिलने जुलने, विचार विनिमय करने और अपने को एक बड़े समुदाय के रूप में संगठित करने का प्रयत्न करते आये हैं। अगर ये सब साधन नहीं होते तो हमारे देश में ही काश्मीर से कन्याकुमारी तक और पेशावर से गौहाटी (आसाम) तक एक हिन्दू-संस्कृति का प्रचलन नहीं देख पाते। हमारा भारतवर्ष एक विशाल जन-संख्या वाला देश है, जो ऐसे सैंकड़ों हिस्सों में बँटा है जिनके लिये आपस में एक भाषा में बातचीत कर सकनी भी सम्भव नहीं है। यह धर्म-संस्था का ही प्रभाव है। जिसने इतने बड़े क्षेत्रफल में फैले हुए 38 करोड़ व्यक्तियों को एकता के सूत्र में बाँधने वाले कई प्रकार के साधन प्रदान किये हैं।
पर अब समय और परिस्थिति में बड़ा परिवर्तन हो गया है और अनेक भारतीय विद्वानों की तरफ से ही यह प्रश्न उठाया जाता है कि वर्तमान-युग में धर्म संस्था का क्या स्थान है? उसे समाज-संचालन का मुख्य आधार बनाया जा सकता है या नहीं? ये विद्वान धार्मिक सिद्धान्तों की सच्चाई- झुठाई पर बहस नहीं करते, वरन् केवल समाज-हित और उपयोगिता की दृष्टि से ही इन विषयों का निर्णय करना उचित समझते हैं। ऐसे ही एक विद्वान श्री लक्ष्मण शास्त्री ने प्राचीन धर्म के स्वरूप के सम्बन्ध में कई एतराज किये हैं। वे कहते हैं :-
“कुछ लोग कहते हैं कि मानव जीवन में ईश्वर का अस्तित्व, आत्मा का अमरत्व और कर्म विपाक की कल्पनाओं का कुछ मूल्य अवश्य है। सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान, सर्व गुण सम्पन्न परम कल्याणमय ईश्वर तर्क से सिद्ध हो या न हों; आत्मा का अमरत्व तर्क से समझ में आवे या न आवे, अथवा किसी व्यक्ति के किये हुए कर्मों का फल कभी उसी व्यक्ति को भोगना पड़ता है। यह बात प्रमाणों से साबित हो या न हो, पर इन वस्तुओं का अस्तित्व माने बिना मनुष्य इस संसार में समाज के प्रति अपना कर्तव्य या अन्य सत्कर्म धीरज से नहीं कर सकता, इसलिये इन वस्तुओं का अस्तित्व मान ही लेना चाहिए। मानव बुद्धि से परे की इन कल्पनाओं को स्वीकार करने से मनुष्य को कर्म की और जीवन की यथार्थता का अनुभव होता है। समाज की व्यवस्था को उत्तम रीति से संचालन करने के निमित्त ईश्वर, स्वर्ग, नर्क, आत्मा, पारलौकिक जीवन आदि वस्तुओं की सत्ता को मानना आवश्यक है।”
“इस कल्पना में अनेक दोष हैं। पहला यह कि संसार में सबसे बड़ी घटनायें ईश्वर-श्रद्धा और अमरत्व-भावना के आधार पर ही नहीं घटी हैं वरन् अन्य भौतिक आधारों पर भी घटी हैं। कला, विद्या, त्याग, शौर्य, पराक्रम आदि मानवी गुणों को पराकाष्ठा तक पहुँचाने में साँसारिक कारणों से ही प्रेरणा प्राप्त हुई है। जिन लोगों ने बड़ी-बड़ी राज्यक्राँतियाँ करके बड़े-बड़े राष्ट्रों को अन्याय- अत्याचार से मुक्त कराया है उनके हृदय में लोकसत्ता, स्वतंत्रता, बंधुत्व आदि आदर्शों की ही शक्ति काम कर रही थी। हमारे भारतवर्ष में भगत सिंह सरीखे लोग राष्ट्रीय स्वतंत्रता के ध्येय के लिये ही खुशी से फाँसी पर लटक गये। जहाँ पर जीवन-मरण का प्रश्न होता है, वहाँ भी अमरत्व और ईश्वर की भावना के बिना ही बड़े-बड़े कार्य अनेक देश और समाज हितैषी कर गये हैं। ईश्वर और आत्मा के अमरत्व पर जिनको श्रद्धा नहीं है, ऐसे अनेक बड़े-बड़े वैज्ञानिक भौतिक शास्त्र की खोज में रात दिन जी तोड़कर परिश्रम करते रहते हैं। वे लोग केवल ज्ञान की लालसा से, उपजीविका का साधन समझ कर, अथवा समाज-प्रीति से प्रेरित होकर ऐसे-ऐसे कार्य करते रहते हैं जिससे उनकी जान सदा जोखिम में रहती है और अनेकों के प्राण भी चले जाते हैं। माता अपने बच्चे के लिये जो कष्ट उठाती है वह स्वर्ग या ईश्वर की प्राप्ति के लिये नहीं होता, वरन् उसका जीव बच्चे के जीव के साथ एकमेक हो जाता है। अपने समूह या जमात के कायदे कानून पारलौकिक डर के बिना पूरी तरह से पालने की प्रवृत्ति जंगली लोगों में भी पायी जाती है। पर धार्मिक ध्येय के लिये प्रयत्न करने वाले व्यक्ति को अपनी पवित्रता की और पारलौकिक जीवन की ही अधिक चिन्ता रहती है। उसकी यह भावना प्रायः अत्यन्त स्वार्थी होती है।
दूसरा दोष यह है कि धर्म को आधार मान कर चलने वाले उन तमाम रीति−रिवाजों, भावनाओं, आचार-विचारों को, जो किसी समय तत्कालीन परिस्थिति के कारण प्रचलित किये गये थे, सदा के लिये अचल और अपरिवर्तनीय मान लेते हैं। ऐसे लोग कहते हैं कि यही परमेश्वरी आदेश या संकेत है, अथवा ऋषियों और महात्माओं का दिखाया महान सत्य यही है। इसका परिणाम यह होता है कि देश-काल और परिस्थिति के बदल जाने पर जब वे रीतिरिवाज या आचार-विचार निकम्मे या अनुपयोगी हो जाते हैं तो भी पारलौकिक विचार वाले व्यक्ति उन्हीं को चिपटे रहते हैं। इस प्रकार वे असामयिक विधि-निषेध समाज की प्रगति के मार्ग में रोड़ा बन जाते हैं। जिन धार्मिक आचार-विचारों को मनुष्य ने ही जन्म दिया और पाला-पोसा वही उसके ऊपर चढ़ बैठते हैं और नीचे गिराने का कारण बन जाते हैं। इसलिये अब ऐसे ध्येय और आदर्श चाहियें जो बुद्धिवाद पर आधारित हों और जो गरज पूरी हो जाने पर बदले जा सकें।
धार्मिक-आधार का तीसरा दोष यह है कि धर्म संस्था पर सत्ताधारी या शासक-वर्ग का प्रभाव पड़ता है और वे उन धार्मिक रीति-रिवाजों या विधि निषेधों का उपयोग जनता को गुलामी या अज्ञान पड़े रखने के लिये करते हैं। सब धर्मों का इतिहास बतलाता है कि ईश्वरवाद, अमरत्व, पाप-पुण्य और कर्म विपाक आदि धार्मिक समझे जाने वाले सिद्धान्तों का उपयोग सत्ता-धारियों ने अपने सामाजिक उच्च पद, भोग-साधन, स्वार्थ-साधन के लिये किया है। जातिभेद के विषत कायदों और अछूतपन की प्रथा को ऐसे ही ‘धर्म-सिद्धान्तों’ ने हजारों वर्षों तक जिन्दा रखा है।”
हम यह तो स्वीकार करते हैं कि धार्मिक आधार पर बनाये गये रीति रिवाज, विधि-निषेध कुछ काल बाद अन्ध श्रद्धा का रूप ग्रहण कर लेते हैं और अधिकाँश लोग उनके लाभ-हानि पर विचार न करके केवल ‘धर्म’ के नाम पर उनका पालन करते रहते हैं। इसका एक परिणाम यह भी होता है कि इस प्रकार आँख मूँद कर पालन करने से उन नियमों की उपयोगिता तो नष्ट हो जाती है और केवल ऊपरी खोल या छिलका शेष रह जाता है। पर इस त्रुटि या आक्षेप के कारण हम धर्म को ही सर्वथा त्याग दें यह विचारणीय है। जैसा लेखक ने कहा है, हम मानते हैं कि इतिहास में बड़ी-बड़ी घटनायें सामाजिक और नैतिक कारणों से घटी हैं और अनेक व्यक्तियों ने बिना पारलौकिक फल का विचार किए ही सार्वजनिक हित के लिये अपना बलिदान कर दिया है। पर हमारे मत से यह नियम समस्त जन-समूह पर लागू नहीं हो सकता। ऐसे उच्च विचारों या आदर्शों के व्यक्ति जो निःस्वार्थ भाव से या सामाजिक हित के नाम पर वास्तव में त्याग और कष्ट सहन कर सकें, समाज में थोड़े ही होते हैं। वर्तमान अवस्था में उनकी संख्या हमारे देश में 100 में से एक भी नहीं निकल सकती। शायद पाँच सौ में से ऐसा एकाध व्यक्ति मिले। तो फिर प्रश्न यह है कि शेष 499 व्यक्तियों के लिये कौन सा मार्ग स्थिर किया जाय। हम यह भी स्वीकार करते हैं कि आज कल मुँह से धार्मिक आदेशों को मानने की बात करते हुए भी अधिकाँश लोग उनका नाम मात्र को ही पालन करते हैं, तो भी अनुमान से यह कहा जा सकता है कि पूरी जनसंख्या नहीं तो उसका आधा भाग धार्मिक आदेशों और विधि निषेधों के कारण अनेक अनुचित और समाज-विरोधी कामों से बचा रहता है। इस लिये वर्तमान स्थिति में तो लेखक के मतानुसार धार्मिक-आधार को छुट्टी दे देना अपने ही लिये घातक होगा। हमको धर्म के ‘नित्य’ सिद्धान्तों का महत्व स्वीकार करके समाज को उन पर चलाना ही पड़ेगा।

