निष्काम सेवा ही सच्चा यज्ञ है।
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(महात्मा गाँधी)
गीता में ‘यज्ञ’ शब्द का व्यवहार बारम्बार किया गया है। हमने भी नित्य का महायज्ञ रचा है। इसलिये ‘यज्ञ’ शब्द पर विचार कर लेना जरूरी है। इस लोक में या परलोक में कुछ भी बदला लिये या चाहे बिना, परार्थ के लिये किये हुए किसी भी कर्म को ‘यज्ञ’ कहेंगे। कर्म कायिक हो या मानसिक, चाहे वाचिक, कर्म का विशाल अर्थ लेना चाहिये। ‘परार्थ’ का मतलब केवल मनुष्य-वर्ग नहीं, बल्कि जीव मात्र से लेना चाहिये। अहिंसा की दृष्टि से भी, मनुष्य जाति की सेवा के लिये भी, दूसरे जीवों का होमना या नाश करना यज्ञ की गिनती में नहीं आ सकता। वेदादि में अश्व, गाय इत्यादि को होमने की जो बात बतलाई जाती है, उसे हमने गलत माना है। वहाँ पशु हिंसा का अर्थ लें तो सत्य और अहिंसा की तराजू पर ऐसे होम नहीं चढ़ सकते। शास्त्रों में जो वचन धर्म के नाम से प्रसिद्ध हैं उनका ऐतिहासिक अर्थ करने में हम नहीं फंसते। हम यह भी स्वीकार करते हैं कि वैसा अन्वेषण करने की हममें योग्यता भी नहीं है। इस प्रकार की योग्यता को हम प्राप्त भी नहीं करना चाहते, क्योंकि ऐतिहासिक अर्थ से जीव हिंसा संगत भी ठहरे तो भी अहिंसा को सर्वोपरि धर्म मानने के कारण हमारे लिये यह त्याज्य है।
इस व्याख्या के अनुसार विचारने पर हम देख सकते हैं कि जिस कर्म में अधिक से अधिक जीवों का, अधिक से अधिक क्षेत्र में कल्याण हो, और जो कर्म अधिक से अधिक मनुष्य अधिक से अधिक सरलता से कर सकें, और जिसमें अधिक से अधिक सेवा होती हो, वही महायज्ञ अथवा अच्छा यज्ञ है। अतः किसी की भी सेवा के निमित्त अन्य किसी का अकल्याण चाहना या करना यज्ञ-कार्य नहीं है और यज्ञ के अलावा किया हुआ कार्य बन्धन रूप है, यह हमें भगवत् गीता सिखलाती है।
ऐसे यज्ञों के बिना यह जग क्षण भर भी नहीं टिक सकता। इसलिये गीताकार ने ज्ञान की कुछ झलक दूसरे अध्याय में दिखाकर तीसरे अध्याय में उसकी प्राप्ति का साधन बतलाया है और साफ शब्दों में कहा है कि हम यज्ञ को जन्म से ही साथ लाये हैं। यहाँ तक कि हमें यह शरीर केवल परमार्थ के लिये मिला है और यज्ञ किये बिना जो खाता है वह चोरी का खाता है, ऐसी सख्त बात गीताकार ने कह डाली है। जो शुद्ध जीवन बिताना चाहता है उसके सब काम यज्ञ रूप होते हैं। हमारे यज्ञ-सहित जन्म लेने का मतलब है हम हर दम ऋणी या देनदार हैं। इसलिये हम जग के सदा सेवक हैं। इसलिये इस जगत् का स्वामी हमसे सेवा कराने के लिए जो अन्न वस्त्रादि देता है वह कृतज्ञतापूर्वक लेना चाहिये। पर यह न समझना चाहिये कि हमको जो मिलता है उस पर हमारा हक है, और वह न मिले तो हम मालिक को दोष लगायेंगे। हमें यह समझना चाहिये कि हमारी देह उसी की है, वह चाहे रखे या न रखे। यह स्थिति दुखद या दयनीय नहीं है, जैसा कुछ लोग ख्याल करते रहेंगे। अपने लिये कोई चिन्ता न करना, सब परमेश्वर को सौंप देना, ऐसा आदेश मैंने तो सब धर्मों में पाया है, और मेरी सम्मति में यह स्थिति सब प्रकार से सुखद और चाहने योग्य है।
पर इन विचारों से किसी को डरना न चाहिये। मन को स्वच्छ रख कर सेवा का आरम्भ करने वाले को, इसकी आवश्यकता दिन पर दिन स्पष्ट होती जाती है और वैसे ही उसकी श्रद्धा बढ़ती जाती है। जो स्वार्थ छोड़ने को तैयार ही नहीं है, अपनी जन्म की स्थिति को पहिचानने को तैयार ही नहीं हैं, उसके लिये तो सेवा के सभी मार्ग मुश्किल हैं। उसकी सेवा में तो स्वार्थ की गंध आती ही रहेगी। पर ऐसे नितान्त स्वार्थी जगत में थोड़े ही होते हैं। कुछ न कुछ निःस्वार्थ सेवा हम सब जाने अनजाने करते ही रहते हैं।
यज्ञ नित्य कर्तव्य है, चौबीस घन्टे आचरण में लाने की वस्तु है, इस विचार से यज्ञ का अर्थ सेवा समझ कर “परोपकाराय सताँ विभूतय” वचन कहा गया है। निष्काम सेवा परोपकार नहीं है, बल्कि अपने निज के ऊपर उपकार है, जैसे कर्ज चुकाना परोपकार नहीं, बल्कि अपनी सेवा है, अपने ऊपर उपकार है, अपने ऊपर से भार उतारना है, अपने धर्म को बचाना है। इसलिये यह समझ लेना चाहिये कि मनुष्य मात्र की पूँजी सेवा के लिये ही है। ऐसा विचार कर लेने से जीवन में भोग का खात्मा हो जाता है- जीवन त्यागमय हो जाता है। या यों कहें कि मनुष्य का त्याग ही उसका भोग है। मनुष्य और पशु के जीवन में यही भेद है।
कुछ लोग कहते हैं कि जीवन का ऐसा अर्थ समझने से जीवन शुष्क बन जायेगा, कला का नाश हो जायेगा। पर ऐसा कहना ‘त्याग’ का अनर्थ करना है। त्याग का अर्थ संसार से भागकर जंगल में जा बसना नहीं है, बल्कि जीवन की प्रत्येक प्रवृत्ति में त्याग की भावना का होना है। गृहस्थ जीवन त्यागी और भोगी दोनों हो सकता है। मोची का जूते सीना, किसान का खेती करना, व्यापारी का व्यापार करना और नाई का हजामत बनाना, त्याग भावना से भी हो सकता है और उसमें भोग की लालसा भी हो सकती है। जो यज्ञार्थ व्यापार करता है, वह करोड़ों के व्यापार में भी लोक-सेवा का ही ख्याल रखेगा, किसी को धोखा नहीं देगा, अनुचित साहस नहीं करेगा, करोड़ों की सम्पत्ति रहते हुए भी सादगी से रहेगा, करोड़ों कमाते हुए भी किसी की हानि नहीं करेगा। किसी की हानि होती होगी तो करोड़ों से हाथ धो लेगा। इन बातों को सुनकर कोई यह न समझे कि ऐसा व्यापारी मेरी कल्पना में ही बसता है। संसार के सौभाग्य से ऐसे व्यापारी पश्चिम और पूर्व दोनों में हैं। वे चाहे अंगुलियों पर गिने जाने की संख्या में ही हों, पर एक भी जीवित उदाहरण रहने पर फिर उसे कल्पना की वस्तु नहीं कह सकते। मैंने इसी सिद्धान्त के अनुसार आचरण करने वाले एक दरजी, एक नाई और एक कपड़ा बुनने वाले को भी देखा है। तलाश करने पर हमें सभी तरह के व्यवसायों में यज्ञार्थ अपना धन्धा करने वाले और उसी लिये जीवन बिताने वाले आदमी मिल सकते हैं।
यह सत्य है कि ऐसे यज्ञार्थ कार्य करने वाले भी अपने धन्धे से ही अपनी जीविका प्राप्त करते हैं। पर वे धन्धा आजीविका के निमित्त नहीं करते, आजीविका उनके लिये उस धन्धे का गौण फल है। भावना बदल जाने से धन्धा ही यज्ञरूप बन जाता है उसमें पवित्रता आ जाती है, और दूसरे के सुख का विचार उत्पन्न हो जाता है। उसी समय ऐसे धंधा करने वाले के जीवन में कला का प्रवेश हो जाता है। सच पूछा जाय तो यज्ञमय जीवन कला की पराकाष्ठा है, सच्चा रस उसी में है, क्योंकि उसमें से रस के नित्य नये झरने प्रकट होते हैं, जिन्हें पीकर मनुष्य अघाता नहीं है और न वे झरने कभी सूखते हैं। यज्ञ यदि भार रूप जान पड़े तो वह न यज्ञ है और न उसमें त्याग है। भोग का अन्त नाश है, त्याग का अन्त अमरता है; रस स्वतंत्र वस्तु नहीं है, रस तो हमारी वृत्ति में मौजूद है। किसी को नाटक के पर्दों में मजा आता है और किसी को आकाश में नित्य प्रकट होने वाले नये-नये दृश्यों में। रस परिशीलन या समझने का विषय है। जो बात रस के रूप में बचपन में सिखाई जाती है, या जिसका रस के नाम से जनता में प्रवेश कराया जाता है, वही रस मान लिया जाता है। हम ऐसे उदाहरण बतला सकते हैं कि जिस बात में एक देश वालों को खूब रस या मजा आता है, दूसरे देश वालों को वह नितान्त रस हीन जान पड़ती है।
यज्ञ करने वाले अनेक ‘सेवक’ ऐसा समझते हैं कि चूँकि हम निष्काम भाव से सेवा करते हैं, इस लिये हमको लोगों से अपनी आवश्यकता के अनुसार अनावश्यक सामग्री भी लेने का अधिकार है। पर जहाँ किसी सेवक के मन में ऐसा विचार आया तो समझ लो कि उसकी ‘सेवकाई’ गई और ‘सरदारी’ आ गई। सेवा में अपनी सुविधा का विचार करने की गुंजाइश ही नहीं है। सेवक की सुविधा तो स्वामी-ईश्वर ही देखता है, उसे देना होगा तो वह दे देगा। यह ख्याल रखते हुए सेवक को चाहिये कि उसके पास जो कुछ आ जाय सबको निजी ही न समझ बैठे। आवश्यकता भर को ही ले, बाकी का त्याग कर दे। अपनी सुविधा में बाधा पड़ने पर भी शान्त रहे, रोष न करें, मन में खिन्नता न लावें। याज्ञिक का बदला, सेवक की मजदूरी -यज्ञ सेवा ही है। उसी में संतोष प्राप्त हो सकती है।

