विश्व कल्याण का प्रतीक स्वास्तिक
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(श्री रामलाल श्रीवास्तव)
‘स्वास्तिक’ वैदिक-संस्कृति का एक अत्यन्त महत्वशाली प्रतीक है। इसका अर्थ चिरन्तन सत्य, शाश्वत शान्ति और अनन्त सौंदर्य समझा जाता है। इसे धारण करने में आसुरी शक्ति सर्वथा असमर्थ है। सत्य और शान्ति का कोई सन्देश तो कोई भाग्यशाली ही दिया करता है। यह गौरव सदा से भारत को ही प्राप्त है। ‘स्वस्ति’ का उल्लेख सबसे पहले वेदों में ही मिलता है। सत्य, शिव और सुन्दर के रंगमंच पर अवस्थित विवेकी आर्य ही सभ्यता के आदिकाल में कहने का साहस कर सकता था :-
स्वस्ति मात्र उत पित्र नो अस्तु,
स्वस्ति गाोम्योजगते पुरुषेभ्यः।
विश्वं सुभूतं सुविदत्रं
नो अस्तु ज्योगेव द्दशेम सूर्यमा।।
(अथर्व. 1।31।4)
“हमारा माता के लिये कल्याण हो। पिता के लिये कल्याण हो। हमारे गोधन का मंगल हो। विश्व के समस्त प्राणियों का मंगल हो। हमारा यह सम्पूर्ण विश्व उत्तम धन और उत्तम ज्ञान से सम्पन्न हो। हम लोग चिरकाल तक प्रतिदिन सूर्य का दर्शन करते रहें। हम दीर्घजीवी हों”
आर्यों ने ऐसे ही स्वस्ति-वचनों के बल पर समस्त विश्व के लिये सुख और शान्ति के साम्राज्य- स्थापन की घोषणा कर जन-कल्याण की सिद्धि की थी। स्वास्तिक आर्यों का आदि माँगलिक प्रतीक है। स्वास्तिक आयु, प्रकाश, सूर्य और आकाश का मूर्त स्वरूप है। जैन, बौद्ध तथा अन्य भारतीय धर्मग्रन्थों में भी स्वास्तिक के महत्व पर बड़ा प्रकाश डाला गया है। उनमें स्वस्तिक के विभिन्न आकार-प्रकार तथा रूपरेखा की जानकारी मिलती है।
‘स्वस्तिक’ शब्द की ऐतिहासिकता के अध्ययन से पता चलता है कि स्वस्तिक हठयोग का एक आसन है। यह एक प्रकार के यन्त्र का नाम है, जो शरीर में गड़े शल्य आदि को बाहर निकाल लेता है। चतुष्पथ अथवा ‘चौराहा’ के लिये भी इसका प्रयोग होता है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह एक माँगलिक चिन्ह का नाम है, जो बहुत शुभ माना जाता है और गणेश पूजन के पहले माँगलिक द्रव्यों से विशेष उत्सवों और शुभ अवसरों पर अंकित किया जाता है। भगवान श्री रामचन्द्र और श्रीकृष्ण के चरण में इस प्रकार का चिन्ह था। जैनी लोग ‘जिन देवता’ के चौबीस लक्षणों में से एक इस भी मानते हैं। हिन्दू-संस्कृति से तो इसका सम्बन्ध सृष्टि के आदि काल से चला आता है। विश्व की समस्त जातियों में हिन्दू जाति ही प्रतीक उपासना को सर्वाधिक महत्व देती है। जिस विषय को समझने में मस्तिष्क और जिव्हा की सामर्थ्य समाप्त हो जाती है उसके बोध के लिये प्रतीक का हाथ पकड़ा जाता है।
स्वस्तिक की ऐतिहासिकता के सम्बन्ध में हम इतना ही कह सकते हैं कि यह उतना ही पुराना है जितने पुराने वेद हैं। वेदों में प्रकाश, कल्याण, दीर्घायु के अर्थ में अनेक स्थलों पर ‘स्वस्ति’ का प्रयोग मिलता है। कुछ विचारकों का मत है कि कहीं-कहीं इसे भ्रमणशील चक्र के आकार में इस लिये दिखलाया गया है कि उससे सूर्य के प्रतीक होने का बोध होता है। कुछ विद्वानों का मत है कि स्वस्तिक उन दो अरणियों (काठ के डण्डों) का प्रतीक हैं, जिनसे यज्ञ के लिये अग्नि पैदा की जाती है। इसका तात्पर्य यह कि स्वस्तिक प्रकाश का प्रतीक है। दक्षिण भारत में बहुत प्राचीन काल के बने कुछ मिट्टी के बर्तन मिले हैं जिन पर स्वस्तिक अंकित है। गौतम बुद्ध से भी पहले इसका प्रचार पाया गया है। प्राचीन शास्त्रों से यह भली प्रकार सिद्ध किया जा चुका है कि हिन्दू जाति ने ही संसार के अनेक भागों में अपने उपनिवेश बनाकर इस प्रतीक का विश्व व्यापी प्रचार किया था। मोहनजोदड़ो की खुदाई में मुद्राओं और पहियों पर स्वस्तिक अंकित मिलता है। पारसियों के एक प्राचीन मंदिर के द्वार पर सूर्य, चन्द्र और स्वस्तिक के चिन्ह बने हैं। ईस्वी सन् से चार सौ वर्ष पहले के कुछ सिक्के भी ऐसे मिले हैं जिन पर स्वस्तिक का चिन्ह है। इससे प्रकट होता है कि अशोक कालीन भारत में स्वस्तिक का पर्याप्त महत्व था।
वैदिक काल से ही स्वस्तिक की परम्परा अक्षुण्ण चली आयी थी, और महाकाव्य -काल तक स्वस्तिक का अर्थ एक प्रतीक ही नहीं रहा वरन् और भी अनेक वस्तुओं का यही नाम करण हो गया। रामायण में एक ऐसे जहाज का वर्णन मिलता है जिस पर स्वस्तिक का चिन्ह अंकित था। महाभारत के सभा पर्व में जरासन्ध वध का वर्णन करते हुए एक ऐसे नाग का नाम मिलता है जिसका स्वस्तिक था। कुछ समय पहले हस्त लिखित पुस्तकों की समाप्ति स्वस्तिक चिन्ह अंकित कर सूचित की जाती थी। बौद्धों और जैनियों ने भी इस चिन्ह को बड़ा महत्व दिया है। बौद्ध और जैन लेखों से संबंधित प्राचीन गुफाओं में स्वस्तिक का चित्रण मिलता है। अशोक के शिला लेखों में स्वस्तिक चिन्ह का बाहुल्य है। जैनियों के समस्त कर्म-विज्ञान का आधार स्वस्तिक है। जैन दर्शन के अनुसार एक दूसरे को परस्पर काटने वाली स्वस्तिक-रेखाएं आत्मा और पुद्गल (पुरुष और प्रकृति) की प्रतीक हैं। दोनों रेखाओं के एक दूसरे को परस्पर काटने पर चार भाग हो जाते हैं जो प्राकृत जगत के चार क्रम-पूर्ववर्ती सर्ग, वनस्पति सर्ग, मनुष्य सर्ग और देव सर्ग-के द्योतक हैं। मंदिरों में पूजा करते समय जैन स्वस्तिक चिन्ह का उपयोग करते हैं। आशीर्वाद अथवा स्वस्ति-दान में भी वे स्वस्तिक चिन्ह से काम लेते हैं। बौद्ध धर्म में भी यह चिन्ह अत्यन्त पूज्य माना जाता है। बुद्ध भगवान के चरणों के लक्षणों में स्वस्तिक की भी गिनती की जाती है। अमरावती के स्तूप में जो बौद्ध पद पर अंकित है, उसमें स्वस्तिक बना हुआ है। जापान, चीन आदि देशों में बुद्ध भगवान के चरणों की पूजा होने से वहाँ भी स्वस्तिक का प्रचार हो गया। बुद्ध धर्मानुयायी स्वस्तिक को बुद्ध भगवान के वक्ष का भी एक शुभ लक्षण मानते हैं। निस्संदेह भारत ने अपने उपनिवेशों और विदेशों में स्वस्तिक का प्रचार किया। अनेक देशों के सिक्कों में स्वस्तिक का चिन्ह देखने को मिलता है।
आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड में ‘मावरी’ जाति के लोग स्वस्तिक को अपने जीवन के शुभ प्रतीकों में से एक मानते हैं। जापानी स्वास्तिक को ‘मनजी’ के नाम से पुकारते हैं और बुद्ध की प्रतिमाओं में यह विशेष रूप से बनाया जाता है। जापान के परम पवित्र पहाड़ फ्यूजी यामा की चोटी पर जब यात्री पहुँचता है, तब उसे ऐसे घड़ों का जल पीने को दिया जाता है जिन पर स्वस्तिक के चिन्ह बने रहते हैं। यह जल दीर्घायु देने वाला माना जाता है। कोरिया में स्वस्तिक तामझाम और पालकी आदि में चित्रित दीख पड़ता है। चीन में स्वस्तिक असंख्यता का बोधक है, अधिकता का प्रतीक है। चीन निवासी भी इसे हिन्दुओं की तरह कल्याण, दीर्घायु और प्रकाश का प्रतीक मानते हैं। हजार वर्ष पहले भी स्वस्तिक का चिन्ह बनाते थे और उसे सूर्य का प्रतीक मानकर उसकी उपासना करते थे। तिब्बत के लोग अपने शरीर में स्वस्तिक के आकार का गोदना गोदवाते हैं। फारस में पुरोहितों के चोगों पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। अल्जीरिया और मिस्र में भी इसका काफी प्रचार है। मिस्र वालों का विश्वास है कि स्वस्तिक उनके देश में यूनान से आया। यूनान में मिट्टी, पीतल और सोने के बर्तनों पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया था। साइप्रेस द्वीप में देवताओं की मूर्ति पर स्वस्तिक का चिन्ह मिलता है। इटली में स्वस्तिक का प्रचार है और अन्य योरोपीय देशों में वहीं से इसका प्रचार हुआ है। पुराने ईसाइयों में यह विशेष और अत्यन्त पवित्र प्रतीक के रूप में प्रचलित था। स्काटलैण्ड के एबरडीन कस्बे में चालीस अक्षरों का एक शिलालेख मिला है, जिसके मध्य भाग में स्वस्तिक बना हुआ है। इस शिला लेख की लिपि पढ़ी नहीं जा सकी, जिससे उसका वास्तविक रहस्य जाना जा सकता। अमरीका में योरोपियनों के आगमन से बहुत पूर्व स्वस्तिक का प्रयोग होता था। कुछ टीलों की खुदाई में ऐसे सामान प्राप्त हुये हैं, जिन पर स्वस्तिक अंकित है। अमरीका में भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा भी मिली है, जिस पर स्वस्तिक अंकित है।
स्वस्तिक सर्वथा स्वस्ति अथवा कल्याणकारी है। हिन्दुओं तथा विदेशी जातियों के साँस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक जीवन में स्वस्तिक का उपयोग दिखाई पड़ता है। समस्त संसार ने इसे एक स्वर से माँगलिक प्रतीक स्वीकार कर लिया है। ईसाइयों का क्रास स्वस्तिक का ही एक रूपांतर है। ॐ शब्द की बनावट और वैज्ञानिक आकार की समीक्षा करने पर उसमें और स्वस्तिक में पूरा सादृश्य दिखलाई पड़ता है। ॐ अखण्ड चिदानन्द की सत्ता का प्रतीक है, भगवान का अक्षर-रूप है। इस लिये हम कह सकते हैं कि स्वस्तिक ही ॐ रूप में परमात्मा का प्रतीक है। परम सत्य, शान्ति और स्वस्ति का आश्रय है। इतिहास की पुनरावृत्ति तो होती ही रहती है; इसलिये निस्संकोच कहा जा सकता है कि विश्व एक दिन स्वस्तिक में समाविष्ट आदर्शों को अपना सकता है। उसकी सबसे बड़ी चाह है सत्य की प्राप्ति। उसकी सबसे बड़ी भूख है शान्ति की अनुभूति। उसका लक्ष्य है आत्मराज्य अथवा स्वराज्य। वस्तुतः स्वस्तिक विश्व कल्याण का दूत है।

