परमात्मा ही प्रकाश है।
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(श्री रिचर्ड व्हाइटवेल)
ईसाई धर्म के एक बहुत बड़े महात्मा संत जान्स ने अपने युग के धार्मिकजनों के नाम एक बहुत छोटा-सा सन्देश भेजा था जिसमें कहा गया था कि “परमात्मा ही प्रकाश है और उसमें नाम मात्र को भी अंधकार नहीं है।” इसके बाद हमारे पारस्परिक मानव सम्बन्धों को छूते हुए उसने जो कुछ लिखा है, वह इन्हीं शब्दों की विस्तृत व्याख्या मात्र है। उसका दूसरा महत्व पूर्ण कथन यह है कि “परमात्मा ही प्रेम है और जो प्रेम में वास करता है स्वयं परमात्मा उसमें वास करता है।” उसके ये दोनों कथन एक दूसरे से स्वाभाविक सम्बन्धित हैं।
इस कथन के अनुसार यदि परमात्मा अन्धकार रहित प्रकाश है और द्वन्द्व रहित प्रेम है, तो यह स्पष्ट है कि संसार में जो बुराइयाँ दिखलाई पड़ती हैं वे उसकी इच्छा का परिणाम कदापि नहीं हैं। ऐसी अवस्था में हम अन्य अनेक व्यक्तियों के इस कथन को हर्गिज स्वीकार नहीं कर सकते कि “अच्छाई और बुराई दोनों परमात्मा की ही देन हैं।” हम इस सिद्धान्त से कदापि सहमत नहीं हो सकते, न इसकी सच्चाई को स्वीकार कर सकते हैं। परमात्मा शुद्ध प्रकाश स्वरूप है, अन्धकार उससे भिन्न है।
“परमात्मा ही प्रकाश है- ऐसा प्रकाश जिसके बिना सृष्टि असम्भव है और धर्म ग्रंथों में जिसे जीवन का स्रोत कहा गया है।” इसका क्या आशय है? कुछ समय पूर्व सर आलिवर लाज ने, विज्ञान के नाम पर बोलते हुए यह मान लिया है कि “प्रकाश स्वयं एक सृजनात्मक शक्ति है।” अर्थात् उसकी उत्पत्ति और कहीं से नहीं होती है वरन् वही अन्य वस्तुओं का निर्माण करता है। इसी तथ्य को धर्म-ग्रंथों में इन गम्भीर शब्दों में प्रकट किया है कि “ईश्वर ने आदि में ही कहा ‘प्रकाश हो’ और उसके ऐसा कहते ही दिव्य सृष्टि उत्पन्न हो गई।” यदि परमात्मा ही प्रकाश-स्वरूप-व तेज-स्वरूप है तो इसका अर्थ यही समझना चाहिये कि वह अपनी सृष्टि में प्रवेश कर चुका है और अब भी प्रवेश कर रहा है।
फिर परमात्मा की सृष्टि का क्या रूप है, जो कि उसकी स्वयं की पूर्णता से प्रकट हुई है? क्या वह स्वयं प्रेम जनित होने के कारण सत्य, शिव और सुन्दर रूप नहीं है? उस आदि-स्रोत से अन्य क्या सम्भव हो सकता है? फिर क्या यह वही सत्ता नहीं है जो आदि में थी, वर्तमान में है और अनन्त रूप से भविष्य में भी रहेगी? वह सत्य का ही राज्य है, जिसमें जैसे ही हम प्रविष्ट होकर पूर्णता से वास करेंगे, वैसे ही हमारे जीवन परमात्मा के प्रेम से चमक उठेंगे। भगवान की दुनिया वही है जो सब स्थिर रहेगी और परमात्मा के प्रकाश से जगमगाती रहेगी। इसके अतिरिक्त एक दूसरी भी दुनिया है जिसके विषय में कहा गया है कि “वह अपनी संपूर्ण वासनाओं के साथ नष्ट हो जायेगी।” यह दुनिया मनुष्य के मन की विकृत सृष्टि है, जिसके फलस्वरूप माया की उत्पत्ति होती है और मनुष्य एक बड़े भारी भ्रम में पड़ जाता है।
जब हम परमात्मा को प्रकाश रूप में देखें, तब हमें ऐसे प्रकाश के रूप में नहीं देखना चाहिये जिसे हम साधारण तथा आकाश स्थित ग्रहों का प्रकाश कहते हैं और जिस के निकट ही अन्धकार भी पाया जाता है। हमें तो उसे स्वयं सूर्य पिण्ड से निकलने वाले शक्ति और तेज के प्रकाश पुँज के रूप में ग्रहण करना चाहिये, जिसके निकट अन्धकार फटक ही नहीं सकता।
अब हम सब मिलकर बोलें- “हमारा धर्म प्रेम है, हमारा पथ सेवा है, हमारा अन्तिम लक्ष्य परमात्मा है।”

