सच्ची आध्यात्मिकता का मार्ग
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(डॉ. भीकनलाल जी आत्रेय)
भारत के एक प्रसिद्ध चित्रकार श्री कनु देसाई ने महात्मा गाँधी का एक चित्र बनाया है, जिसमें महात्मा जी अन्धेरी रात्रि में एक हाथ में छोटी-सी टिमटिमाती लालटेन और दूसरे हाथ में सहारा देने वाली लाठी को लिये घने जंगल में चले जा रहे हैं। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि यह चित्र मानव-जीवन का एक बहुत सुन्दर निदर्शन है। वास्तव में मानव-जीवन एक ऐसे घने, अंधेरे और अपार जंगल में यात्रा कर रहा है , जिसके सम्बन्ध में हमें कुछ भी ज्ञात नहीं है। हम कौन हैं? कहाँ से आये हैं? कहाँ जा रहे हैं? क्यों जा रहे हैं, किधर जाना है, कौन सा मार्ग उचित है- इन सब बातों का ठीक-ठाक पता यात्रियों में से किसी को नहीं है। सब अपने-अपने अनुभव के आधार पर, या दूसरों के कहने सुनने के आधार पर अपनी कल्पना से इन प्रश्नों का उत्तर गढ़ लेते हैं। इस घने जंगल में कोई सड़क नहीं है, जिस पर बिना खटके अन्तिम लक्ष्य-स्थान तक पहुँच जाने के लिये चल सकें। केवल हमसे पहले आने वाले यात्रियों की पगडंडियाँ ही कहीं-कहीं दिखाई पड़ती हैं। इनको देखने के लिये हमारे पास हार्दिक बल की टिमटिमाती लालटेन के सिवा और कुछ नहीं है। वे पगडंडियाँ भी एक दूसरे से मिली हुईं, कटी हुईं और जहाँ-तहाँ टूटी और मिटी हुई हैं, कभी-कभी कुछ दूर जाकर हमको यह मालूम होने लगता है कि हमको दूसरे मार्ग से चलना था तब हम पीछे लौटते हैं या दूसरा मार्ग ग्रहण करते हैं। अनेक यात्री इसी प्रकार इधर-उधर भटकते रहते हैं, और थककर, वृद्ध होकर, या आहत होकर गिर पड़ते हैं।
जीवन की यह दशा होते हुये हमें क्या करना चाहिये, यह कहना बहुत कठिन है। यात्रा को स्थगित करके बैठ जाना तो उचित नहीं जान पड़ता, क्योंकि पीछे से आने वाले यात्रियों के रास्ते में रुकावट होने के कारण हमारे दूसरों द्वारा कुचल दिये जाने की संभावना है। इस लिये अपने छोटे से प्रकाश से, दीपक-प्रकाश से लाभ उठाते हुए, हृदय में जीवन के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखते हुए चलते रहना ही उचित है। हाँ, एक बात जो निश्चित है वह यह है कि मेरी ही तरह और भी अनेक यात्री इस घने वन में भटक रहे हैं, मेरा और उनका मार्ग भले ही पृथक हो, पर वे सब हैं तो मेरे ही समान भटकते पथिक। उनके साथ सहानुभूति, प्रेम और सहयोग करना मेरे लिये इस कारण उचित है कि मैं स्वयं भी अपने प्रति उनकी सहानुभूति, प्रेम, सहयोग की आकाँक्षा रखता हूँ। मुझे चाहिये कि जैसा व्यवहार मैं दूसरों से अपने प्रति नहीं चाहता वैसा दूसरों के प्रति भी न करूं। महाभारतकार श्री वेद व्यास जी ने इस बात को ही ‘धर्म सर्वस्व’ या धर्म का सार बताया है-
श्रूयताँ ‘धर्म सर्वस्व’ श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्।।
न तत्परस्य कुर्वीत स्यादनिष्टं महात्मनः।
यद्यदात्म निचेच्छेत् तत्परस्यापि चिन्तयेत्।।
अर्थात् “धर्म का सार जो है उसको सुनो और सुनकर उसके ऊपर चलो। वह सार यह है- जो व्यवहार तुमको अपने लिये प्रतिकूल जान पड़े वैसा दूसरे के लिये न करो। जो अपने लिये अनिष्ट है उसे दूसरे के लिये न करो, और जिसे अपने लिये इच्छा करते हो दूसरे के लिए भी उसी की इच्छा करो।” जहाँ तक हम विचार सकते हैं इससे बढ़कर शुभ और स्पष्ट शिक्षा और किसी महात्मा ने नहीं दी है। इस पर आचरण करने से मनुष्य का जीवन निस्सन्देह सुखमय और यह जगत स्वर्ग के समान हो सकता है।

