क्रान्ति का शंखनाद (kavita)
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आज अवनी मौन होकर देखती है राह मेरी।
आज अम्बर ने किसी के रक्त की लाली बिखेरी।।
त्रस्त मेरे आज भय से वायु भी थर्रा रही है।
मेघ के भी आज उर से चीख बाहर आ रही है।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।1।।
कान में तरु के समीरण ने जरा कुछ कह सुनाया।
वृक्ष ने देखा चतुर्दिक और मुझको सर झुकाया।।
दूर वह देखो क्षितिज में खिंच रही है स्वर्ण-रेखा।
इस तरह से शक्तिहीनों का पलटते भाग्य देखा।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।2।।
छत्र सत्ताधारियों के रौंद डालूँ एक क्षण में।
रत्नमय कितने मुकुट आकर लुढ़कते हैं चरण में।।
दीन हो वैभव बिचारा है दिखाता दाँत आकर।
चूर होता गर्व उसका ठोकरों की चोट खाकर।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।3।।
देखते ही देखते ऊँचे महल श्मशान होते।
ताव देते मूँछ पर जो बैठ सर को पीट रोते।।
मैं भरे घर को उजाडूँ और उजड़े को बसाऊँ।
हाथ ले संहार वीणा भव्य-युग के गीत गाऊँ।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।4।।
स्वप्न ही में सृष्टि के कितने युगों को लौट डालूँ।
उठ पड़ूँ तो सृष्टि में अध्याय नूतन जोड़ दूँ मैं।
और पीड़ा का पका फोड़ा तनिक में फोड़ दूँ मैं।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।5।।
नाच उठता काल मेरी आँख का पाकर इशारा।
जाग उठती है प्रलय मुस्कान का पाते सहारा।।
देखते हैं लोग कितने कब्र से मुँह को निकाले?
भागती है खुद ‘गुलामी’ आप मुँह पर लाज डाले।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।6।।
भूख का उन्मुक्त-हाहाकार जन्म-स्थान मेरा।
आँसुओं के साथ शैशव-काल में करती बसेरा।।
सिसकियों की थपकियाँ सोती हुई मुझको जगातीं।
घोर जन-संहार अरु बलिदान से मैं खाद्य पाती।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।7।।
मोद है शासन उलटना, खेलना-संहार मेरा।
है सदा उन्मत्त स्वेच्छाचारियों के बीच डेरा।।
शक्तियों का ह्रास अरु, उत्थान है करवट बदलता।
अरु कठिन संघर्ष में होता सदा मेरा सम्हलना।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।8।।
ये खड़े वीरान-खँडहर देख गौरव-चित्र मेरे।
फड़फड़ाते गीध अरु, चमगादड़ें हैं मित्र मेरे।।
झनझनाहट शस्त्र की चीत्कार है आह्लाद निर्भय।
क्षुद्र-मानव का रचित इतिहास है संक्षिप्त-परिचय।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।9।।
गेह कारागार मेरा यातनायें हैं सहेली।
खूब अत्याचार से खेलूँ खुशी होकर अकेली।।
देश-निर्वासन किसी का है विजय-प्रस्थान मेरा।
क्रूर-कोड़े और फाँसी में सफल सन्मान मेरा।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।10।।
शक्तियाँ आगे खड़ी हैं सन्धि का उपहार लेकर।
यों भुलाया चाहती हैं निर्बलों का ग्रास देकर।।
चाहती है आज पर्दे में मुझे दुनिया छिपाया।
पर बचाये से बचेगा क्या जिसे मैंने चबाया।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।11।।
हथकड़ी की मोदमय झँकार ने मुझको जगाया।
दुर्बलों की आह ने उन्माद का आसव पिलाया।।
शक्तियों की शक्तिमय-संघर्ष ने यौवन दिया है।
स्फूर्ति दे दी आज स्वेच्छाचार ने जादू किया है।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।12।।
क्षुब्ध-सागर की गरज में मुक्त-स्वागत-गान मेरा।
युद्ध की हुँकार में है आज अभ्युत्थान मेरा।।
विश्व में मेरी विजय की बज रही है आज भेरी।
खूब मानव-सभ्यता मेरी बनी है आज चेरी।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।13।।
ले हथेली पर फिरें सर जो बनें मेरे पुजारी।
प्राण देने में जिन्हें आता सदा आनन्द भारी।।
मैं उन्हीं के तो गले में डालती जयमाल आकर।
वे चलेंगे विश्व में फिर गर्व से सीना उठाकर।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।14।।
क्योंकि आखिर ‘क्रान्ति’ हूँ मैं।।14।।
*समाप्त*

