
विचार शक्ति के चमत्कार
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जड़ जगत की शक्तियों में कोयला, भाप, तेल, बिजली आदि के उत्पादन शक्तिशाली माने जाते हैं। रसायन, शस्त्र और मशीनों की क्षमता भी इसी गणना में आती है। यों पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु भी शक्ति पुँज से भरी हुई है। इस प्रकार जड़ जगत दृश्य रूप से स्थिर होते हुए भी उपरोक्त साधनों की सहायता से इतना शक्तिशाली बन जाता है कि उसकी कल्पना तक से दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है।
आमतौर से जड़ शक्ति का ही लोगों को परिचय है। उसी का उपयोग करके लोग शक्तिशाली बनते हैं। किन्तु रात इतने तक ही सीमित नहीं है। एक दूसरी शक्ति चेतना की भी है। उसका प्रयोग तो होता है पर अनुभव नहीं। शरीर में प्राण हैं उसे सभी जानते हैं। प्राण निकल जाने पर युवा शरीर भी निरर्थक हो जाता है। पशु-पक्षियों में- जीवधारियों में प्राण है, इतनी जानकारी होते हुए भी इस तथ्य को एक प्रकार से विस्मृत ही रखा गया है कि प्राण का उत्कर्ष- उद्दीपन कैसे हो सकता है और उसके सहारे कोई सामान्य से असामान्य कैसे बन सकता है। प्राण का सामान्य उपयोग शरीर से काम लेना है। मानवी चेतना आमतौर से इतने तक ही सीमित रहती है। इन्द्रियों का, बुद्धि का, उपलब्ध साधन सामग्री का उपयोग करने में प्राण चेतना का उपयोग सीमित रहते देखा जाता है। इससे कुछ कदम आगे बढ़ा जा सके तो फिर चमत्कार ही चमत्कार है।
पदार्थ अपने सामान्य रूप में अति सामान्य है उनका निर्वाह शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी करने मात्र के लिए होता है। विशेष प्रयत्नों से ही वह असामान्य सामर्थ्य का परिचय देता है। वैसा कुछ न किया जाय तो पदार्थ का बाजारू मूल्य अत्यल्प है। यही बात प्राण चेतना के सम्बन्ध में भी है। उसे शरीर निर्वाह का ताना-बाना बुनने में संलग्न देखा जाता है। उसकी विशेष क्षमता देखनी हो तो ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी व्यक्तियों के पौरुष पराक्रम में देखी जानी चाहिए। सामान्य स्थिति में मनुष्य भी एक जानवर है। उसे नर पशु भी कहा जाता है। पेट प्रजनन के दैनिक कार्यों में वह भी लगा रहता है किन्तु जब कभी प्राण का विशेष उत्कर्ष या उपयोग किया जाता है तो ऐसा ही चमत्कार उत्पन्न होता है, जैसा मिट्टी के ढेले में सन्निहित अणु-शक्ति का विशेष उपयोग होने पर देखा जाता है।
चेतना क्षेत्र की विशिष्ट सामर्थ्य को विचार शक्ति कहा जाता है। इसी के आधार पर मनुष्य शरीर का उपयोग करता, योजनाएँ बनाता और उन्हें पूरी करता है। विचारशील व्यक्ति सामर्थ्यवान माने जाते हैं। विचारहीनों की गणना नर पशुओं में होती है। विचार, शक्ति को बढ़ाने के लिए स्वाध्याय, चिन्तन, परामर्श, पर्यटन आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते वे कूप मण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। इसलिए जहाँ चेतना की शक्ति पर विचार किया जाता है वहाँ प्रकारांतर से उसे विचार शक्ति का विशेष उपयोग कहा जाता है। विचारशील ही महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।
आश्चर्य इस बात का है कि पदार्थ विज्ञान का जितना महत्व समझा जाता है उतना विचार विज्ञान का- आत्मविज्ञान का नहीं। होना यह चाहिए कि पदार्थ जगत की तुलना में असंख्यों गुने शक्तिशाली प्राण विज्ञान का महत्व समझा जाता और विचार शक्ति के स्वरूप रहस्य एवं उपयोग के सम्बन्ध में ध्यान केन्द्रित किया जाता। जो ऐसा कर पाते हैं वे उस केन्द्रीकरण का समुचित लाभ भी उठाते हैं। अनपढ़, अनगढ़, असभ्य मनुष्य की तुलना में किसी विचारशील सुसंस्कृत व्यक्ति के स्तर में कितना अन्तर होता है, इसे सहज ही समझा जा सकता है। यही कारण है कि विचार शक्ति कह महिमा की चर्चा समय-समय पर स्थान-स्थान पर होती रहती है।
विचार विज्ञान पर प्रकाश डालते हुए उसे दो वर्गों में विभाजित करना होगा- एक साधारण- दूसरा असाधारण। साधारण वह, जिसे शारीरिक तृप्ति या उन्नति तक सीमित समझा जाना चाहिए। यह वक्रिक बुद्धि सभी चतुर-कुशल कहलाने वाले व्यक्तियों में पाई जाती है। चोर उचक्के इस कला में प्रवीण होते हैं। ठगी इसी के सहारे सम्भव होती है। धनी, विद्वान, विशेषज्ञ बुद्धि के इसी पक्ष का उपयोग करके अपने-अपने क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करते हैं। बहुज्ञ और अनुभवी व्यक्ति इसी के कारण सराहे जाते हैं।
विचार शक्ति का दूसरा पक्ष यह है- जिसे आदर्श कहा जाता है। आदर्शवादिता भी एक गौरवशाली सफलता है, जिसके लिए अन्य क्षेत्रों के सफल व्यक्तियों की तरह अपने आपको विशेष रूप से तैयार करना पड़ता है।
संसार के महामानव भी अन्य क्षेत्र के दुस्साहसी लोगों की तरह होते हैं। महत्वपूर्ण खोजें एवं यात्राएँ करने वाले सराहे जाते हैं। महत्वपूर्ण खोजें एवं यात्राएँ करने वाले सराहे जाते हैं। आविष्कारकर्ताओं को भी ऐसा ही श्रेय मिलता है। युद्ध जीतने वाले भी ऐसी ही विजयश्री का वरण करते हैं। प्रतियोगिताओं में पुरस्कार पाने वाले भी सराहे जाते हैं। यह विचार शक्ति और पराक्रम का सम्मिश्रण है।
आदर्शवादी अपने आपको इसके लिए तैयार करते हैं। आकाँक्षाओं, विचारणाओं, भावनाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालते और संकल्प द्वारा उसे परिपक्व करते हैं। उनके सामने महामानवों की जीवन गाथाएँ रहती हैं। भले ही ऐसे व्यक्ति सामने दिखाई न पढ़ते हों। इतिहास की गाथाओं का स्मरण करके भी वे उनसे उतनी प्रेरणाएँ प्राप्त कर लेते हैं जितनी सामने उपस्थित व्यक्ति सामने बैठकर सलाह और प्रोत्साहन दे रहे हों।
आदर्शवादी मार्गावलम्बन में साधारण कल्पना शक्ति या विचार शक्ति अपनाने से काम नहीं चलता। इसके लिए संकल्प शक्ति चाहिए। मनोबल का गहरा पुट लगना चाहिए। निष्ठा उतनी चाहिए जितनी की महाकवि रवीन्द्र के प्रख्यात गीत में व्यक्त की गई है- “एकला चलो रे-एकला चलो रे।”
विनोबा, अमृतलाल ठक्कर, कालेलकर जैसे सर्वोदयी और नेहरू, पटेल जैसे काँग्रेसी दृढ़ निश्चय करके एक मार्ग पर चले और जब तक जीवित रहे तब तक दूसरी कोई बात ही दिमाग में न आने दी। इन दृढ़ निश्चयी लोगों ने जिधर कदम उठाया उससे कभी दाँये बाँये मुड़कर नहीं देखा। यही कारण है कि इन आदर्शों को देखकर जिनमें कच्चापन था, वह भी पक्का हुआ। वे एक उदाहरण बने और समुद्र में खड़े प्रकाश स्तम्भ की तरह अनेकों को डूबने से बचाते और सीधी राह चलाते रहे। जहाँ दृढ़ निश्चयी लोगों में अनेकों को राह दिखाने की शक्ति होती है वहाँ पथ भ्रष्ट लोग भी एक उदाहरण बनते हैं। भगोड़े सिपाही जहाँ दो चार मैदान छोड़कर भागते हैं वहाँ उनकी देखा-देखी और भी बहुतों के पैर उखड़ जाते हैं और वे उस कायरों की भीड़ में शामिल हो जाते हैं।
उदाहरण प्रस्तुत करना एक बड़ा काम है। अच्छा हो या बुरा, दृढ़ निश्चयी मनस्वी लोग जहाँ खड़े होते हैं। जिधर चलते हैं उधर ही कमजोर मन वालों की पंक्ति चल पड़ती है। सामान्यजनों की बात दूसरी है पर जहाँ अन्तिम पंक्ति में चलने वाले प्रतिभाशाली लोगों का प्रश्न है वहाँ एक बड़ी बात यह भी है कि वे अनेकों का मनोबल बढ़ाते या गिराते हैं। आदर्शवादी लोगों को मनस्वी माना जाता है। सामान्य जन तो रोटी खाते, कपड़ा पहनते हैं उन्हें अपने मतलब से मतलब होता है। आदर्शों से उन्हें कुछ लेना देना नहीं होता। उनका उदाहरण किसी को प्रभावित नहीं करता। महत्व उन लोगों का है जिनने आदर्शों के पथ पर चलने का निश्चय किया है उनकी मनस्विता जहाँ असाधारण रूप से सराही जाती है वहां यदि वे पथ भ्रष्ट होते हैं तो निन्दनीय भी कम नहीं होते। भीड़ में भगदड़ मचाने वाले कुछ ही लोग होते हैं। वे भागते हैं तो दूसरे लोग भी बिना कारण पूछे उन भागने वालों के साथ भागने लगते हैं।
आदर्शवादिता मनुष्य जाति की मुकुट मणि है। महान कार्य उन्हीं के बलबूते सम्पन्न होते हैं। वे आगे चलते हैं, तो पीछे चलने वाले भी कम नहीं रहते। भूदान जैसे अनेकों आन्दोलनों में कुछ ही लोगों ने आगे चलकर अनेकों को उस मार्ग पर चलाया है इसलिए उन अग्रगामियों को सदा सराहा और श्रेय दिया जाता है। साथ ही वे लोग एक खतरा भी उत्पन्न करते हैं। सरकस दिखाने वाले कलाकारों की प्रशंसा भी होती है पर साथ ही यदि रस्सी पर से गिरते हैं तो चोट भी अधिक लगती है और उपहास भी अधिक होता है।
चर्चा यहाँ आदर्शवादियों की हो रही है उनका व्यक्तित्व सामाजिक उत्कर्ष की रीढ़ है। वे तनकर खड़े रहें तो सत्प्रवृत्तियों का ढाँचा भी ठीक से खड़ा रहता है पर यदि वे झुकते या टूटते हैं तो फिर शरीर के ऊपर कुरूपता छा जाती है और काय-कलेवर निकम्मा हो जाता है।
मानवी आदर्श अपनाये, यह समूची मानव जाति का सौभाग्य है पर साथ ही यह भी ध्यान रखने योग्य है कि बुरा उदाहरण उपस्थित करने वाले अग्रगामी अपना ही उपहास नहीं कराते समूची परम्परा को ही लड़खड़ाते हैं। इसलिए अनुकरणीय कदम उठाने से पूर्व अपने भीतर दृढ़ता का समावेश कर लेना भी आवश्यक है। विचार शक्ति के चमत्कार इसी प्रकार प्रस्तुत किये जाते हैं। विचारों के चमत्कार सदैव मनस्वी ही प्रस्तुत करते हैं।