स्थिति की भयंकरता
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आज का यह संकट सबसे बड़ा है। भले ही वह प्रत्यक्ष आँखों के सामने खड़ा दीखता हो और तत्काल अपनी भयंकरता के प्रमाण प्रस्तुत न करता हो, तो भी यह निश्चित है कि किसी का भी जीवन या भविष्य सुरक्षित नहीं। कोई ऐसा अधपगला स्टोरकीपर इस बारूद के भण्डार में एक तीली फेंककर- बटन दबाकर वह दृश्य उपस्थित कर सकता है, जिसकी चर्चा इन पंक्तियों में की जा रही है। एक ओर आक्रमण हो और दूसरा चुप बैठा रहे, यह भी नहीं हो सकता। प्रश्न हलके- भारी आक्रमण का नहीं, उसका थोड़ा- सा प्रयोग भी सर्वनाश कर सकता है। उससे न शत्रु पक्ष के लोग बचने वाले हैं और न मित्र पक्ष के। पिछले युद्धों में यह कठिनाई नहीं थी, उसमें प्रति पक्षियों को मारने का ही ताना- बाना बुना जाता था, पर इसमें तो वैसा भेद भी नहीं हो सकता। वायु किसी क्षेत्र में सीमित नहीं रहती। विकिरण फैलने पर उसकी परिणति समस्त क्षेत्र को ही सहनी पड़ती है, भले ही उसमें मित्र- समुदाय ही क्यों न रहता हो? समस्त विश्व के प्रत्येक घटक को अपनी विभीषिका- परिधि में चपेटे हुए इस अणु युद्ध की सम्भावना को आज की महती समस्या माना जा सकता है एवं सर्व प्रमुख महत्त्व की भी।
कुछ दिन पूर्व तक यह जखीरे रूस, अमेरिका के पास ही थे, पर अब वे फ्रांस, ब्रिटेन, चीन आदि के पास भी हैं। इसलिए कौन, कब, क्या कर बैठे? इस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस विस्तार से गुत्थी उलझी ही है।
समाधान सोचने से पूर्व इस संकट के उत्पन्न होने और बढ़ने के कारणों पर तनिक विचार कर लें, तो ठीक होगा। हिटलर हारा तो उसकी पोटली में से अणु बम का नुस्खा निकल आया। अमेरिका ने उसे विकसित किया और जापान के विरुद्ध उसका छोटा उपयोग भी कर लिया। जापान इस बड़े आघात के लिए तैयार न था, उसने आत्म समर्पण कर दिया। बात यहीं से आरंभ होती है। हर वरिष्ठ राष्ट्र के मुँह में पानी भर आया कि वह भी अपने प्रति पक्षियों के विरुद्ध यही चाल चल सकता है और उसे देखते- देखते नीचे दबा सकता है। जो कर सकते थे, उनने यह होड़ आरम्भ कर दी और रूस एवं अमेरिका इस निर्माण में औरों से आगे निकल गये। अब प्रमुख प्रतिद्वन्द्विता इन्हीं दो के बीच चल रही है। इन्हीं के दो खेमे अब बन गए हैं।
समाधान आसान नहीं है-
असमंजस इस बात का है कि न आगे बढ़ते बन पड़ रहा है, न पीछे हटते। आगे बढ़ते चलने में अनेक समस्याएँ सामने हैं। जितने बन चुके, वे प्रतिपक्षी को ही नहीं, समस्त संसार को धूल में मिला देने के लिए पर्याप्त हैं। फिर और अधिक बनाकर उनका क्या किया जाय? इतने पर भी यह प्रश्न सामने है कि इस कार्य में जितने कारखाने, जितने वैज्ञानिक लगे हुए हैं, उनका क्या हो? फिर शत्रु ने कोई और भी बड़ा आयुध निकाल लिया, तो पिछड़ जाने का जोखिम कौन मोल ले?
बन्द करने पर दूसरा पक्ष जारी रखे रहा, तो अन्य प्रकार का ऐसा आयुध ढूँढ़ निकाला जा सकता है, जिसमें अब तक निर्माण छोटा साबित हो। ऐसी दशा में प्रतिद्वंद्वियों का आतंक और पिछड़ जाने का भय दोनों ही ऐसे हैं, जो हाथ रोकने की सलाह नहीं देते।
जारी रखने में यह प्रश्र है कि अब तक जो बन चुका उसका क्या होगा? इस कार्य पर जो असाधारण लागत लग रही है, वह कब तक लगती रहेगी। फिर प्रयोग में दस- पाँच आयुध ही आने के उपरान्त जो बचेंगे, उन्हें कहाँ रखा जायेगा? वे विकिरण फैलाते हैं और अन्त में कहीं- न समापन के लिए जगह माँगते हैं। इन भट्ठियों में से निकली हुई राख कितनी भयानक होती है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। निर्माण जारी रखने पर न केवल विनिर्मित निर्माण का, वरन् राख का भी सवाल है, जो उससे अधिक पेचीदा है।
इन कारणों को देखते हुए लाभ इसमें है कि जापान जैसा प्रयोग कोई एक किसी दूसरे के विरुद्ध कर ले और तत्काल लाभ उठा ले। पर ऐसा कर सकना वर्तमान परिस्थितियों में सम्भव नहीं रहा। जापान के पास बदला लेने के साधन नहीं थे, पर आज तो कोई भी बदला ले सकता है। चीन, ईरान और इजराइल जैसे वैज्ञानिक प्रगति में पिछड़े समझे जाने वाले देश भी बदला लेने की स्थिति में हैं। फिर कोई किसी की सहायता पर भी तो आ सकता है। यही है वह असमंजस जिसके कारण प्रहार करने की हिम्मत भी नहीं पड़ती और पीछे हटने की जोखिम भी उठाये नहीं उठती। इस निर्माण कार्य में जो कारखाने और वैज्ञानिक विपुल पूँजी अपने पेट में समाये बैठे हैं, उस सबका क्या हो? आक्रमण से पूर्व अब बचाव का प्रश्र और अहम है। अपनी ओर से हाथ खींचें तो सामने वाला भी वैसा करेगा। इसका कोई भरोसा नहीं। जारी रखा जाय तो कैसे, कब तक? अभी कितनी और पूँजी इस गोरख-धन्धे में लगानी पड़ेगी? वह आयेगी कहाँ से?
आत्म रक्षा को महत्त्व देने वाली समर- नीति समझौतों की चर्चा की इजाजत नहीं देती। पुरानी बात अलग थी, जब आन- बान ही सब कुछ थी। अब मूँछें मरोड़ने और तत्काल उन्हें नीची कर लेने में किसी को संकोच नहीं लगता। ऐसी दशा में पहल होना भी कठिन है और हाथ रुकना भी उससे कठिन। क्रम यही चलता रहा, तो इस जखीरे का, उस कचरे- कूड़े का, उसमें लगे साधनों का क्या होगा? ये प्रश्र ऐसे हैं, जिनके उत्तर सरल नहीं हैं। जापान का उदाहरण देखकर जो कल्पनाएँ की गई थीं, वे हजारों मील दूर गईं।
कोई भी राज हड़पना चाहता हो, सो बात भी नहीं है। कभी प्रजातन्त्र और साम्यवाद का नशा जोरों पर था। अपने मत का संसार बना लेने की झक कभी थी, इसलिए जिहाद बोल देने का भी जोश था। अब वह ठण्डा पड़ गया। अब प्रजातन्त्र, राजतन्त्र, साम्यवाद की मिली- जुली खिचड़ी पक रही है और सभी के मस्तिष्क राष्ट्रवादी संकीर्णता पर आकर अवरुद्ध हो गये हैं। अपने यहाँ कोई किसी सिद्धांत का पालन करे, तो दूसरे देशों में उसे चलना ही चाहिए। इसका किसी को आग्रह नहीं। ऐसी दशा में शासन पद्धति अपने हिसाब से बनाने के लिए कोई बाहरी देशों में जाकर युद्ध जैसी जोखिम उठाने को तैयार नहीं। शीत युद्ध में गुपचुप सहायता इस या उस पक्ष की करता रहे, यह बात दूसरी है। यह समस्त परिस्थितियाँ यह बताती हैं कि न महायुद्ध छेड़ना सरल है, न उससे हाथ खींचना। स्थिति को यथावत बनाये रखना इतना खर्चीला है कि वह भी लम्बे समय तक इसी प्रकार चलते रहने नहीं दिया जा सकता। आखिरकार देने वाले भी इतना बोझ कब तक वहन करेंग
।
जापान पर हमले के दिनों में सभी को वह प्रक्रिया बहुत लाभदायी लगी थी, पर अब वैसी बात नहीं रही। सभी पक्ष पीछे हटना चाहते हैं। जो अपने हाथ हैं, उसे बचाये रखने में ही खुशी देखते हैं। आक्रमण का जोश ठण्डा पड़ता जाता है, पर प्रतिपक्ष के प्रति अविश्वास और भय का भाव इतना अधिक बढ़ा हुआ है कि कोई निर्णय करते नहीं बन पड़ता। अब वायदों का कोई भी तो मूल्य नहीं रह गया है।
समाधान की दिशाधारा- यह स्थिति का विश्लेषण हुआ। समाधान एक ही है कि पैर पीछे हटाना और हाथ समेटना पड़ेगा। इसके लिए भय, आशंका और आतंक इन तीनों का सामना करना पड़ेगा। एक पक्ष को जोखिम उठानी पड़ेगी। दोनों पक्ष सहमत हो जायें तब कहीं राजी- नामा हो, यह कठिन है। फिर वही राजी- नामा चलेगा, इसकी क्या गारण्टी है? यहाँ ऐसा आत्मबल उत्पन्न होने की आवश्यकता है, जो यह सोचने पर विवश कर दें कि युद्ध में नष्ट होने की अपेक्षा शान्ति के लिए पहल करने में जो जोखिम है, उसे उठाया जाए। गाँधी जी ने यही कर दिखाया था। अंग्रेजों की शक्ति असीम थी, वे सशस्त्र थे। दमन के द्वारा वे कुछ भी कर सकते थे। पर भयभीत रहकर कुछ न करने की अपेक्षा संकट मोल लेना और आपत्ति को चुनौती देना उन्होंने अंगीकार किया। लड़ाई बराबर की नहीं थी, तो भी वह जीती गयी और यह अनुभव किया गया कि नैतिकता का अपना पक्ष है, उसका अपना बल है। वह जिस पलड़े में भारी पड़े, उसके पराजित होने की संभावना कम रहती है। पर पराजय मिलेगी तो भी युद्ध विनाश की तुलना में कम ही रहेगी
।
यह समझदारी उत्पन्न करने के लिये हम अपनी सूक्ष्मीकरण द्वारा उपार्जित शक्ति का उपयोग करेंगे। दोनों को पीछे हटने के लिए दबाव डालेंगे और यह विश्वास किसी न किसी प्रकार करा सकेंगे कि आक्रमण की तुलना में पीछे हटने में बुद्धिमत्ता है। इस दबाव से आज का आक्रोश ठण्डा होगा। समझदारी और जिम्मेदारी का नया दौर चलेगा। गरम- युद्ध शीत- युद्ध में बदलेंगे और शीत- युद्ध उस स्थिति में जा पहुँचेंगे जिसे लम्बे समय के लिए- सदा के लिए युद्ध विराम के रूप में देखा जा सके।
[समाधान कैसे होगा? इस संदर्भ में ये पंक्तियाँ जुलाई ८४ तक की अखण्ड ज्योति में छपी थीं। उस समय कोई उस प्रकार होने की कल्पना भी नहीं कर सकता था; परन्तु १९८७ में रसिया के राष्ट्रपति श्री गोर्वाचोव की एक तरफा पहल के बाद वैसा ही हुआ, जैसा युगऋषि ने घोषित किया था।]
कुछ दिन पूर्व तक यह जखीरे रूस, अमेरिका के पास ही थे, पर अब वे फ्रांस, ब्रिटेन, चीन आदि के पास भी हैं। इसलिए कौन, कब, क्या कर बैठे? इस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस विस्तार से गुत्थी उलझी ही है।
समाधान सोचने से पूर्व इस संकट के उत्पन्न होने और बढ़ने के कारणों पर तनिक विचार कर लें, तो ठीक होगा। हिटलर हारा तो उसकी पोटली में से अणु बम का नुस्खा निकल आया। अमेरिका ने उसे विकसित किया और जापान के विरुद्ध उसका छोटा उपयोग भी कर लिया। जापान इस बड़े आघात के लिए तैयार न था, उसने आत्म समर्पण कर दिया। बात यहीं से आरंभ होती है। हर वरिष्ठ राष्ट्र के मुँह में पानी भर आया कि वह भी अपने प्रति पक्षियों के विरुद्ध यही चाल चल सकता है और उसे देखते- देखते नीचे दबा सकता है। जो कर सकते थे, उनने यह होड़ आरम्भ कर दी और रूस एवं अमेरिका इस निर्माण में औरों से आगे निकल गये। अब प्रमुख प्रतिद्वन्द्विता इन्हीं दो के बीच चल रही है। इन्हीं के दो खेमे अब बन गए हैं।
समाधान आसान नहीं है-
असमंजस इस बात का है कि न आगे बढ़ते बन पड़ रहा है, न पीछे हटते। आगे बढ़ते चलने में अनेक समस्याएँ सामने हैं। जितने बन चुके, वे प्रतिपक्षी को ही नहीं, समस्त संसार को धूल में मिला देने के लिए पर्याप्त हैं। फिर और अधिक बनाकर उनका क्या किया जाय? इतने पर भी यह प्रश्न सामने है कि इस कार्य में जितने कारखाने, जितने वैज्ञानिक लगे हुए हैं, उनका क्या हो? फिर शत्रु ने कोई और भी बड़ा आयुध निकाल लिया, तो पिछड़ जाने का जोखिम कौन मोल ले?
बन्द करने पर दूसरा पक्ष जारी रखे रहा, तो अन्य प्रकार का ऐसा आयुध ढूँढ़ निकाला जा सकता है, जिसमें अब तक निर्माण छोटा साबित हो। ऐसी दशा में प्रतिद्वंद्वियों का आतंक और पिछड़ जाने का भय दोनों ही ऐसे हैं, जो हाथ रोकने की सलाह नहीं देते।
जारी रखने में यह प्रश्र है कि अब तक जो बन चुका उसका क्या होगा? इस कार्य पर जो असाधारण लागत लग रही है, वह कब तक लगती रहेगी। फिर प्रयोग में दस- पाँच आयुध ही आने के उपरान्त जो बचेंगे, उन्हें कहाँ रखा जायेगा? वे विकिरण फैलाते हैं और अन्त में कहीं- न समापन के लिए जगह माँगते हैं। इन भट्ठियों में से निकली हुई राख कितनी भयानक होती है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। निर्माण जारी रखने पर न केवल विनिर्मित निर्माण का, वरन् राख का भी सवाल है, जो उससे अधिक पेचीदा है।
इन कारणों को देखते हुए लाभ इसमें है कि जापान जैसा प्रयोग कोई एक किसी दूसरे के विरुद्ध कर ले और तत्काल लाभ उठा ले। पर ऐसा कर सकना वर्तमान परिस्थितियों में सम्भव नहीं रहा। जापान के पास बदला लेने के साधन नहीं थे, पर आज तो कोई भी बदला ले सकता है। चीन, ईरान और इजराइल जैसे वैज्ञानिक प्रगति में पिछड़े समझे जाने वाले देश भी बदला लेने की स्थिति में हैं। फिर कोई किसी की सहायता पर भी तो आ सकता है। यही है वह असमंजस जिसके कारण प्रहार करने की हिम्मत भी नहीं पड़ती और पीछे हटने की जोखिम भी उठाये नहीं उठती। इस निर्माण कार्य में जो कारखाने और वैज्ञानिक विपुल पूँजी अपने पेट में समाये बैठे हैं, उस सबका क्या हो? आक्रमण से पूर्व अब बचाव का प्रश्र और अहम है। अपनी ओर से हाथ खींचें तो सामने वाला भी वैसा करेगा। इसका कोई भरोसा नहीं। जारी रखा जाय तो कैसे, कब तक? अभी कितनी और पूँजी इस गोरख-धन्धे में लगानी पड़ेगी? वह आयेगी कहाँ से?
आत्म रक्षा को महत्त्व देने वाली समर- नीति समझौतों की चर्चा की इजाजत नहीं देती। पुरानी बात अलग थी, जब आन- बान ही सब कुछ थी। अब मूँछें मरोड़ने और तत्काल उन्हें नीची कर लेने में किसी को संकोच नहीं लगता। ऐसी दशा में पहल होना भी कठिन है और हाथ रुकना भी उससे कठिन। क्रम यही चलता रहा, तो इस जखीरे का, उस कचरे- कूड़े का, उसमें लगे साधनों का क्या होगा? ये प्रश्र ऐसे हैं, जिनके उत्तर सरल नहीं हैं। जापान का उदाहरण देखकर जो कल्पनाएँ की गई थीं, वे हजारों मील दूर गईं।
कोई भी राज हड़पना चाहता हो, सो बात भी नहीं है। कभी प्रजातन्त्र और साम्यवाद का नशा जोरों पर था। अपने मत का संसार बना लेने की झक कभी थी, इसलिए जिहाद बोल देने का भी जोश था। अब वह ठण्डा पड़ गया। अब प्रजातन्त्र, राजतन्त्र, साम्यवाद की मिली- जुली खिचड़ी पक रही है और सभी के मस्तिष्क राष्ट्रवादी संकीर्णता पर आकर अवरुद्ध हो गये हैं। अपने यहाँ कोई किसी सिद्धांत का पालन करे, तो दूसरे देशों में उसे चलना ही चाहिए। इसका किसी को आग्रह नहीं। ऐसी दशा में शासन पद्धति अपने हिसाब से बनाने के लिए कोई बाहरी देशों में जाकर युद्ध जैसी जोखिम उठाने को तैयार नहीं। शीत युद्ध में गुपचुप सहायता इस या उस पक्ष की करता रहे, यह बात दूसरी है। यह समस्त परिस्थितियाँ यह बताती हैं कि न महायुद्ध छेड़ना सरल है, न उससे हाथ खींचना। स्थिति को यथावत बनाये रखना इतना खर्चीला है कि वह भी लम्बे समय तक इसी प्रकार चलते रहने नहीं दिया जा सकता। आखिरकार देने वाले भी इतना बोझ कब तक वहन करेंग
।
जापान पर हमले के दिनों में सभी को वह प्रक्रिया बहुत लाभदायी लगी थी, पर अब वैसी बात नहीं रही। सभी पक्ष पीछे हटना चाहते हैं। जो अपने हाथ हैं, उसे बचाये रखने में ही खुशी देखते हैं। आक्रमण का जोश ठण्डा पड़ता जाता है, पर प्रतिपक्ष के प्रति अविश्वास और भय का भाव इतना अधिक बढ़ा हुआ है कि कोई निर्णय करते नहीं बन पड़ता। अब वायदों का कोई भी तो मूल्य नहीं रह गया है।
समाधान की दिशाधारा- यह स्थिति का विश्लेषण हुआ। समाधान एक ही है कि पैर पीछे हटाना और हाथ समेटना पड़ेगा। इसके लिए भय, आशंका और आतंक इन तीनों का सामना करना पड़ेगा। एक पक्ष को जोखिम उठानी पड़ेगी। दोनों पक्ष सहमत हो जायें तब कहीं राजी- नामा हो, यह कठिन है। फिर वही राजी- नामा चलेगा, इसकी क्या गारण्टी है? यहाँ ऐसा आत्मबल उत्पन्न होने की आवश्यकता है, जो यह सोचने पर विवश कर दें कि युद्ध में नष्ट होने की अपेक्षा शान्ति के लिए पहल करने में जो जोखिम है, उसे उठाया जाए। गाँधी जी ने यही कर दिखाया था। अंग्रेजों की शक्ति असीम थी, वे सशस्त्र थे। दमन के द्वारा वे कुछ भी कर सकते थे। पर भयभीत रहकर कुछ न करने की अपेक्षा संकट मोल लेना और आपत्ति को चुनौती देना उन्होंने अंगीकार किया। लड़ाई बराबर की नहीं थी, तो भी वह जीती गयी और यह अनुभव किया गया कि नैतिकता का अपना पक्ष है, उसका अपना बल है। वह जिस पलड़े में भारी पड़े, उसके पराजित होने की संभावना कम रहती है। पर पराजय मिलेगी तो भी युद्ध विनाश की तुलना में कम ही रहेगी
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यह समझदारी उत्पन्न करने के लिये हम अपनी सूक्ष्मीकरण द्वारा उपार्जित शक्ति का उपयोग करेंगे। दोनों को पीछे हटने के लिए दबाव डालेंगे और यह विश्वास किसी न किसी प्रकार करा सकेंगे कि आक्रमण की तुलना में पीछे हटने में बुद्धिमत्ता है। इस दबाव से आज का आक्रोश ठण्डा होगा। समझदारी और जिम्मेदारी का नया दौर चलेगा। गरम- युद्ध शीत- युद्ध में बदलेंगे और शीत- युद्ध उस स्थिति में जा पहुँचेंगे जिसे लम्बे समय के लिए- सदा के लिए युद्ध विराम के रूप में देखा जा सके।
[समाधान कैसे होगा? इस संदर्भ में ये पंक्तियाँ जुलाई ८४ तक की अखण्ड ज्योति में छपी थीं। उस समय कोई उस प्रकार होने की कल्पना भी नहीं कर सकता था; परन्तु १९८७ में रसिया के राष्ट्रपति श्री गोर्वाचोव की एक तरफा पहल के बाद वैसा ही हुआ, जैसा युगऋषि ने घोषित किया था।]


