नयी सूझबूझ उभरेगी
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इन असमंजसों का हल किसी को सूझ नहीं रहा है। न आगे बढ़ने में ठिकाना, न पीछे हटने में। ऐसी दशा में सर्वनाश के अतिरिक्त और क्या हल हो सकता है? यह ढूँढ़ना समझदारी का काम है। समय रहते यह प्रकट होगी। नये विकल्प सूझेंगे। पीछे हटने में भलाई लगेगी। विनाश- साधन बनाने के स्थान पर सृजन के लिए अभी नये निर्माण का क्षेत्र बहुत बड़ा खाली पड़ा है। उसकी ओर मुड़ने में, दिशा बदलने में वर्तमान ढर्रे में उलट- पुलट तो बहुत करनी पड़ेगी पर ऐसा नहीं है, जो न हो सके।
यह कार्य चारों मूर्धन्यों के मनःक्षेत्र में यदि नयी सूझ- बूझ उदित हो, तो हो सकता है। वह होगी भी। शासनाध्यक्ष अपने ढंग से सोचेंगे और धनाध्यक्षों की पूँजी सुरक्षित रखने और बढ़ाने के लिये नये विकल्प ध्यान में आयेंगे। वैज्ञानिकों को नये मार्ग मिलेंगे। सूर्य- ऊर्जा का दोहन, समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाना, खाद्य उत्पादन जैसे कितने ही काम ऐसे हैं जो वैज्ञानिकों द्वारा इन्हीं दिनों किये जाने चाहिए। अन्तरिक्ष यात्रा और सर्वनाशी आयुध बनाना उतना जरूरी नहीं है। इसी प्रकार साहित्यकारों, कलाकारों के लिए मानवी गरिमा को मान्यता देने वाली विचारणा एवं भाव संवेदना देने का बहुत बड़ा काम करने के लिए सूना पड़ा है। क्या आवश्यकता कि वे धनाध्यक्षों के लिए ‘कसाई के कूकर (कुत्ते)’ की भूमिका निबाहें और वह करें, जो न तो आवश्यक है और न ही शोभनीय।
[प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति ‘कसाई के कूकर’ की भूमिका में क्यों रहे? इस वाक्य में युगऋषि की सूक्ष्म दृष्टि के साथ उनके अन्दर की पीड़ा की भी झलक मिलती है। बहेलिया जंगल के तेज दौड़ने वाले जानवरों को स्वयं नहीं पकड़ सकते। वे खास प्रजाति के कुत्ते पालते हैं, जो उन्हें पकड़कर बधिक का काम आसान कर देते हैं। उन कुत्तों की सहायता से वे बहेलिया जानवरों का शिकार करने में सफल हो जाता है, शेष का लाभ बधिक उठाता है। धनाध्यक्ष जनता की जेब से सीधे पैसा नहीं निकलवा सकते, वे विभिन्न प्रतिभा सम्पन्नों से यह काम करवाते हैं। उस शोषण की कमाई का एक अंश उन्हें देकर शेष लाभ वे स्वयं उठाते रहते हैं। यदि प्रतिभा सम्पन्न जनता के शोषण बनने के माध्यम से इनकार कर दें, तो उन्हें शायद अपनी थोड़ी सुविधाएँ कम करनी पड़ें, किन्तु शोषण में सहायक के पातकों आक्षेपों से बचकर अपनी गरिमा की रक्षा कर सकते हैं।]
अगले दिनों इन चारों वर्गों में परस्पर फूट पड़ेगी। अभी तो मिलजुल कर काम कर रहे हैं और संयुक्त प्रयास से गाड़ी प्रलय युद्ध की ओर सरपट चाल से दौड़ रही है। पर अगले दिनों चारों घोड़े अपनी- अपनी मर्जी प्रकट करेंगे और अलग- अलग दिशा में चलने की सोचने लगेंगे और अपनी मर्जी के अनुरूप दिशा निर्धारित करेंगे, तो यह विनाश- तंत्र इस रूप में न रहेगा, जिसमें कि आज है।
युद्ध के उपरान्त दूसरी समस्या है, औद्योगीकरण की। विशालकाय यंत्रों ने जनता का शहरीकरण किया है और उसके कारण संकट भरी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। उपनिवेशवाद को उसी के कारण प्रोत्साहन मिला है। पूँजीवाद पनपा है। प्रदूषण के कारण सर्वत्र विष व्याप्त है। यह भी एक धीमा महायुद्ध है जो चलता रहा, तो सर्वनाश किये बिना रुकेगा नहीं। भले ही अणु युद्ध की तुलना में देर लगे।
हमारा प्रयत्न होगा कि सादगी आंदोलन चले। विकेन्द्रीकरण की बात सूझे। लोग हाथ से बनी वस्तुओं से काम चलाने की आदत डालें। फैशन छोड़ें। अपव्यय, ठाट- बाट के विरुद्ध जनता में घृणा- भाव उत्पन्न हो। लोग शहरों से विमुख हों। कस्बे पनपें। गाँधीजी ने स्वराज्य आंदोलन के साथ- साथ खादी को जोड़ा था। तब यह विचित्र लगता था। पर अब अर्थशास्त्र का दूरदर्शी विद्यार्थी यह स्वीकार करता है कि यदि शान्ति से रहना है, तो सादगी को जीवनचर्या में अविच्छिन्न स्थान देना पड़ेगा। बड़े कारखाने मात्र मशीन बनाने जैसे अनिवार्य प्रयोजनों के लिए रहें, पर उन्हें जन- जीवन की आवश्यकताओं के क्षेत्र में प्रवेश न करने दिया जाय। वस्त्र- उद्योग विशेषतया हथकरघों के लिए सुरक्षित रहें। दैनिक आवश्यकता की अन्यान्य वस्तुएँ गाँव में बनें।
इस कार्य में शायद पूँजीपति और सरकारें सहमत न हों। तो भी यह सादगी की, हाथ उद्योग की, देहातों में लौटने की हवा जनसामान्य में प्रारम्भ करनी होगी। इसके बिना बेकारी का और कोई विकल्प नहीं। प्रदूषण से निपटने के लिए छोटे उद्योग, छोटे कारखाने, देहातों में चलाने से काम बन सकता है। खाली स्थानों पर पेड़ लगाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किये जायें, क्योंकि बढ़ते प्रदूषण से बचने के लिए वही एक कारगर उपचार है। वाहनों की द्रुतगामिता कम की जा सकती है। बैलगाड़ियाँ काम में लाई जा सकती हैं। बिजली से चलने वाले वाहन भी विनिर्मित हो सकते हैं। साइकिल युग तो लौटने ही वाला है।
[समीक्षात्मक अध्ययन करने से यह तथ्य सामने उभर कर आते हैं कि युगऋषि द्वारा इस प्रकार की घोषणा करने के बाद सन् ८७- ८८ से प्रतिभा शक्तियों के चिन्तन एवं प्रयासों की दिशाधारा में तेजी से परिवर्तन आया है। औद्योगीकरण से होने वाली हानियों के प्रति पर्यावरण संतुलन के प्रति जागरूकता बढ़ी है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के स्थान पर जैविक कृषि, पशु ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों के विकास की दिशा में प्रतिभाओं ने उल्लेखनीय कार्य कर दिखाया है। विकासशील देशों के वैज्ञानिकों ने विकसित देशों को पर्यावरण बिगड़ने वाली गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण रखने की चुनौतियाँ दी हैं। धन की अंधी दौड़ के रास्ते में मानवाधिकारों की रक्षा के जोरदार आग्रह उभरने लगे हैं।]
शिक्षा क्रान्ति इन्हीं सिद्धान्तों पर अवलम्बित है। नौकरी के लिए उच्चशिक्षा प्राप्त करने की वर्तमान भेड़चाल ने युवा वर्ग को दिग्भ्रान्त, निराश एवं क्षुब्ध किया है। शिक्षा ऐसी हो जो दैनिक जीवन की सभी आवश्यकताओं की जानकारी दे। जो विशेषज्ञ बनने के इच्छुक हैं, वे उन विषयों को पढ़ें। सर्वसाधारण पर व्यर्थ भार न लदे।
अभी तो समूची मानव- जाति अनेक टुकड़ों में बँटी है और विश्व परिवार का कोई सुयोग नहीं बन पड़ रहा है। पर वह दिन दूर नहीं, जब एक राष्ट्र, एक भाषा, एक संस्कृति और एक व्यवस्था इस संसार में चलेगी और विग्रह न्यायालयों द्वारा निपटाया जाया करेंगे। बड़े युद्धों की कहीं आवश्यकता नहीं पड़ेगी। स्थानीय झंझट पुलिस निपटा लिया करेगी। सामर्थ्य भर काम- आवश्यकतानुरूप दाम की जब अर्थ नीति चलेगी और विलास तथा संग्रह पर अंकुश रहेगा, तो अपराधों का आधारभूत कारण ही समाप्त हो जायेगा। चिंतन, चरित्र और व्यवहार में जब शिक्षा व्यवस्था तथा प्रचलन- परंपरा द्वारा आदर्शों के समावेश का भरपूर प्रयत्न रहेगा, तो कोई कारण नहीं कि उन जघन्य अपराधों का अस्तित्व बना रहे, जो आज सर्वत्र बेतरह छाए हुए हैं। जन- जन को आशंकित- आतंकित बनाये रहते हैं।
राजनेता, धनाध्यक्ष, वैज्ञानिक, मनीषी- यह चार वर्ग जन- सामान्य की वर्तमान दुर्दशा के लिए उत्तरदायी हैं। इन चारों को ही व्यापक स्तर पर ढूँढ़ा, झकझोरा और कचोटा जाएगा। यह कार्य एक स्थूल शरीर से सम्भव नहीं हो पा रहा था। इसके लिए असंख्यों तक पहुँचने की आवश्यकता समझी गई। उसे अगले दिनों सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न करके रहा जाएगा। उत्पादित सामर्थ्य और ईश्वरेच्छा का समन्वय इस कठिन कार्य को सरल बना दे, तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
यह कार्य चारों मूर्धन्यों के मनःक्षेत्र में यदि नयी सूझ- बूझ उदित हो, तो हो सकता है। वह होगी भी। शासनाध्यक्ष अपने ढंग से सोचेंगे और धनाध्यक्षों की पूँजी सुरक्षित रखने और बढ़ाने के लिये नये विकल्प ध्यान में आयेंगे। वैज्ञानिकों को नये मार्ग मिलेंगे। सूर्य- ऊर्जा का दोहन, समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाना, खाद्य उत्पादन जैसे कितने ही काम ऐसे हैं जो वैज्ञानिकों द्वारा इन्हीं दिनों किये जाने चाहिए। अन्तरिक्ष यात्रा और सर्वनाशी आयुध बनाना उतना जरूरी नहीं है। इसी प्रकार साहित्यकारों, कलाकारों के लिए मानवी गरिमा को मान्यता देने वाली विचारणा एवं भाव संवेदना देने का बहुत बड़ा काम करने के लिए सूना पड़ा है। क्या आवश्यकता कि वे धनाध्यक्षों के लिए ‘कसाई के कूकर (कुत्ते)’ की भूमिका निबाहें और वह करें, जो न तो आवश्यक है और न ही शोभनीय।
[प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति ‘कसाई के कूकर’ की भूमिका में क्यों रहे? इस वाक्य में युगऋषि की सूक्ष्म दृष्टि के साथ उनके अन्दर की पीड़ा की भी झलक मिलती है। बहेलिया जंगल के तेज दौड़ने वाले जानवरों को स्वयं नहीं पकड़ सकते। वे खास प्रजाति के कुत्ते पालते हैं, जो उन्हें पकड़कर बधिक का काम आसान कर देते हैं। उन कुत्तों की सहायता से वे बहेलिया जानवरों का शिकार करने में सफल हो जाता है, शेष का लाभ बधिक उठाता है। धनाध्यक्ष जनता की जेब से सीधे पैसा नहीं निकलवा सकते, वे विभिन्न प्रतिभा सम्पन्नों से यह काम करवाते हैं। उस शोषण की कमाई का एक अंश उन्हें देकर शेष लाभ वे स्वयं उठाते रहते हैं। यदि प्रतिभा सम्पन्न जनता के शोषण बनने के माध्यम से इनकार कर दें, तो उन्हें शायद अपनी थोड़ी सुविधाएँ कम करनी पड़ें, किन्तु शोषण में सहायक के पातकों आक्षेपों से बचकर अपनी गरिमा की रक्षा कर सकते हैं।]
अगले दिनों इन चारों वर्गों में परस्पर फूट पड़ेगी। अभी तो मिलजुल कर काम कर रहे हैं और संयुक्त प्रयास से गाड़ी प्रलय युद्ध की ओर सरपट चाल से दौड़ रही है। पर अगले दिनों चारों घोड़े अपनी- अपनी मर्जी प्रकट करेंगे और अलग- अलग दिशा में चलने की सोचने लगेंगे और अपनी मर्जी के अनुरूप दिशा निर्धारित करेंगे, तो यह विनाश- तंत्र इस रूप में न रहेगा, जिसमें कि आज है।
युद्ध के उपरान्त दूसरी समस्या है, औद्योगीकरण की। विशालकाय यंत्रों ने जनता का शहरीकरण किया है और उसके कारण संकट भरी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। उपनिवेशवाद को उसी के कारण प्रोत्साहन मिला है। पूँजीवाद पनपा है। प्रदूषण के कारण सर्वत्र विष व्याप्त है। यह भी एक धीमा महायुद्ध है जो चलता रहा, तो सर्वनाश किये बिना रुकेगा नहीं। भले ही अणु युद्ध की तुलना में देर लगे।
हमारा प्रयत्न होगा कि सादगी आंदोलन चले। विकेन्द्रीकरण की बात सूझे। लोग हाथ से बनी वस्तुओं से काम चलाने की आदत डालें। फैशन छोड़ें। अपव्यय, ठाट- बाट के विरुद्ध जनता में घृणा- भाव उत्पन्न हो। लोग शहरों से विमुख हों। कस्बे पनपें। गाँधीजी ने स्वराज्य आंदोलन के साथ- साथ खादी को जोड़ा था। तब यह विचित्र लगता था। पर अब अर्थशास्त्र का दूरदर्शी विद्यार्थी यह स्वीकार करता है कि यदि शान्ति से रहना है, तो सादगी को जीवनचर्या में अविच्छिन्न स्थान देना पड़ेगा। बड़े कारखाने मात्र मशीन बनाने जैसे अनिवार्य प्रयोजनों के लिए रहें, पर उन्हें जन- जीवन की आवश्यकताओं के क्षेत्र में प्रवेश न करने दिया जाय। वस्त्र- उद्योग विशेषतया हथकरघों के लिए सुरक्षित रहें। दैनिक आवश्यकता की अन्यान्य वस्तुएँ गाँव में बनें।
इस कार्य में शायद पूँजीपति और सरकारें सहमत न हों। तो भी यह सादगी की, हाथ उद्योग की, देहातों में लौटने की हवा जनसामान्य में प्रारम्भ करनी होगी। इसके बिना बेकारी का और कोई विकल्प नहीं। प्रदूषण से निपटने के लिए छोटे उद्योग, छोटे कारखाने, देहातों में चलाने से काम बन सकता है। खाली स्थानों पर पेड़ लगाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किये जायें, क्योंकि बढ़ते प्रदूषण से बचने के लिए वही एक कारगर उपचार है। वाहनों की द्रुतगामिता कम की जा सकती है। बैलगाड़ियाँ काम में लाई जा सकती हैं। बिजली से चलने वाले वाहन भी विनिर्मित हो सकते हैं। साइकिल युग तो लौटने ही वाला है।
[समीक्षात्मक अध्ययन करने से यह तथ्य सामने उभर कर आते हैं कि युगऋषि द्वारा इस प्रकार की घोषणा करने के बाद सन् ८७- ८८ से प्रतिभा शक्तियों के चिन्तन एवं प्रयासों की दिशाधारा में तेजी से परिवर्तन आया है। औद्योगीकरण से होने वाली हानियों के प्रति पर्यावरण संतुलन के प्रति जागरूकता बढ़ी है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के स्थान पर जैविक कृषि, पशु ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों के विकास की दिशा में प्रतिभाओं ने उल्लेखनीय कार्य कर दिखाया है। विकासशील देशों के वैज्ञानिकों ने विकसित देशों को पर्यावरण बिगड़ने वाली गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण रखने की चुनौतियाँ दी हैं। धन की अंधी दौड़ के रास्ते में मानवाधिकारों की रक्षा के जोरदार आग्रह उभरने लगे हैं।]
शिक्षा क्रान्ति इन्हीं सिद्धान्तों पर अवलम्बित है। नौकरी के लिए उच्चशिक्षा प्राप्त करने की वर्तमान भेड़चाल ने युवा वर्ग को दिग्भ्रान्त, निराश एवं क्षुब्ध किया है। शिक्षा ऐसी हो जो दैनिक जीवन की सभी आवश्यकताओं की जानकारी दे। जो विशेषज्ञ बनने के इच्छुक हैं, वे उन विषयों को पढ़ें। सर्वसाधारण पर व्यर्थ भार न लदे।
अभी तो समूची मानव- जाति अनेक टुकड़ों में बँटी है और विश्व परिवार का कोई सुयोग नहीं बन पड़ रहा है। पर वह दिन दूर नहीं, जब एक राष्ट्र, एक भाषा, एक संस्कृति और एक व्यवस्था इस संसार में चलेगी और विग्रह न्यायालयों द्वारा निपटाया जाया करेंगे। बड़े युद्धों की कहीं आवश्यकता नहीं पड़ेगी। स्थानीय झंझट पुलिस निपटा लिया करेगी। सामर्थ्य भर काम- आवश्यकतानुरूप दाम की जब अर्थ नीति चलेगी और विलास तथा संग्रह पर अंकुश रहेगा, तो अपराधों का आधारभूत कारण ही समाप्त हो जायेगा। चिंतन, चरित्र और व्यवहार में जब शिक्षा व्यवस्था तथा प्रचलन- परंपरा द्वारा आदर्शों के समावेश का भरपूर प्रयत्न रहेगा, तो कोई कारण नहीं कि उन जघन्य अपराधों का अस्तित्व बना रहे, जो आज सर्वत्र बेतरह छाए हुए हैं। जन- जन को आशंकित- आतंकित बनाये रहते हैं।
राजनेता, धनाध्यक्ष, वैज्ञानिक, मनीषी- यह चार वर्ग जन- सामान्य की वर्तमान दुर्दशा के लिए उत्तरदायी हैं। इन चारों को ही व्यापक स्तर पर ढूँढ़ा, झकझोरा और कचोटा जाएगा। यह कार्य एक स्थूल शरीर से सम्भव नहीं हो पा रहा था। इसके लिए असंख्यों तक पहुँचने की आवश्यकता समझी गई। उसे अगले दिनों सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न करके रहा जाएगा। उत्पादित सामर्थ्य और ईश्वरेच्छा का समन्वय इस कठिन कार्य को सरल बना दे, तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।


