युग परिवर्त्तन-नियन्ता का सुनिश्चित आश्वासन
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प्रस्तुत समय की समस्याओं की तुलना समुद्र में बहते रहने वाले उस हिम खण्ड से की जा सकती है जिसका लगभग १/१० भाग ऊपर तैरता दिखाई देता है एवं शेष पानी में डूबा अदृश्य बना रहता है। जो नाविक इस तथ्य से अनभिज्ञ होते हैं, वे अनजाने विशाल समुद्र में अपने जहाजों को इनसे टकरा देते हैं एवं जीवन तथा सम्पदा खो बैठते हैं। आज जो दृश्यमान है, वही सब कुछ है, यह सोचने की आत्म प्रवंचना हमें नहीं करना चाहिए।
युद्धोन्माद, जघन्य स्तर के अपराध, पवित्र स्थलों का आश्रय लेकर धर्म के नाम पर हिंसा व अलगाववाद की दुहाई, सम्प्रदायवाद, जातीय आधार पर टिकी राजनीति के, राजघरानों के जमाने के षड्यंत्र एवं दुरभिसन्धियाँ बीसवीं सदी के इस सातवें- आठवें दशक की त्रासदी भरी कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। इन्हें देखते- देखते गत बीस- पच्चीस वर्षों में हम मोटी चमड़ी के हो गए हैं। अब हमें ये समस्याएँ नजर नहीं आतीं, जीवन का अभिन्न अंग लगती हैं। लेकिन जो भुक्त भोगी हैं, वे बहुसंख्यक हैं एवं वे समस्याओं का समाधान किसी भी स्थिति में चाहते हैं कि विश्व- वसुधा की नैया युग विभीषिकाओं के इस आइसवर्ग से टकरा- टकरा कर चूर- चूर हो जाए।
नियन्ता भी यह नहीं चाहता। चाहता होता तो सृष्टि रचता ही क्यों? उस परम सत्ता की एक ही इच्छा है कि मानवी पराक्रम- आत्मबल स्वयमेव उभरकर आए और इन विध्वंसक शक्तियों से मोर्चा ले। श्रुति का कथन सच है कि आत्मबल का पूरक परमात्मबल है। वह परमसत्ता तभी अपनी भूमिका निभाने आगे आती है, जब मनुष्य अपने सारे प्रयास करके थक जाता है एवं रक्षा हेतु गुहार लगाता है।
स्थिति बहुत गंभीर है- जो समझदार हैं, वे समय की इस विषमता को भली- भाँति समझते हैं। वे जानते हैं कि बड़े राष्ट्रों द्वारा अस्त्र एकत्र कर लेने का अर्थ है- सामूहिक आत्मघात। बढ़ती जनसंख्या एवं संव्याप्त प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रदूषण की परिणति भी वे जानते व भली- भाँति समझते हैं। वे इस तथ्य से भी अवगत हैं कि पूँजी के आधार पर विलासिता की पृष्ठभूमि पर एवं चिन्तन को विकृत कर देने वाले साधनों के बलबूते यह विश्व तकनीकी दृष्टि से कितना भी बढ़ा- चढ़ा होने पर भी वस्तुतः विनाश को ही प्राप्त होगा।
इस सम्बन्ध में द्वितीय विश्व युद्ध के समय फ्रांस के आश्चर्यजनक पतन का प्रसंग उल्लेखनीय है। जर्मनी के खूँखार डिक्टेटर हिटलर ने जब नस्लवाद के नाम पर अपनी विनाश लीला का आरंभ किया, तब पोलैण्ड को तो उसने पहले ही दाँव में धूर्त्तता से हथिया लिया। उसके समक्ष एक विस्तृत साम्राज्य फ्रांस का था, जिसे हस्तगत करने पर विश्व विजय की उसकी सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाती। विदेशी आक्रामकों के बर्बर इरादों से अनभिज्ञ फ्रांसीसी सुरक्षा के स्थान पर विलासिता के मद में चूर बने हुए थे। हिटलर ने अपनी शक्ति, सैनिक बल, धन इस कार्य में अधिक नष्ट करना उचित न समझा। सुरा- सुन्दरी के नशे में डूबे फ्रांसीसियों ने मात्र चौबीस घण्टे में आत्मसमर्पण कर दिया और हिटलर फ्रांस में अपना झण्डा फहराकर नये मोर्चे की तैयारी करने लगा। तत्कालीन विचारकों ने चिन्तन करने पर पाया कि आत्मबल की दृष्टि से हीन, खोखले नागरिकों को जीता नहीं गया, उन्होंने स्वयं आत्मसमर्पण कर दिया।
जिन्हें भगवान् ने थोड़ी भी समझ दी है वे भली- भाँति जानते हैं कि आज सारे विश्व की स्थिति लगभग वैसी ही है जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के समय थी। राष्ट्रीयता, नैतिक अनुशासन मात्र किताबों में लिखने के लिये रह गया है। अश्लील साहित्य हमारे अपने ही देश में नहीं, सारे विश्व में इतनी बड़ी मात्रा में छपता व नित्य पढ़ा जाता है, जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। नशीली दवाओं की खपत नित्य बढ़ती चली जा रही है। हशीश, कोकीन, चरस, हिरोइन जैसी घातक- मादक वस्तुओं की एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे देश में तस्करी का ऐसा जाल बिछा हुआ है जो तोड़ने में नहीं टूटता। फिल्मों ने ऐसे अवसर पर एक उत्प्रेरक (केटेलिस्ट) की भूमिका निभाने का दायित्व उठाया है। वे अपराधों, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता एवं आत्मघाती उन्मादी मनोवृत्ति को जन्म देने वाली प्रवृत्तियों को ही प्रश्रय देती नजर आती हैं।
समाचार पत्र- पत्रिकाओं ने भी मानो नैतिक अनुशासन के पतन में भागीदार बनने का दायित्व अपने हाथों में ले लिया है। मात्र वे ही समाचार प्रकाश में आते हैं, जिनसे अन्यों को उन्हीं (पतनोन्मुखों) का अनुकरण करने की प्रेरणा मिले। राज्य प्रमुखों- राष्ट्राध्यक्षों कर्मचारी वर्गों में ईमानदारी का अंश उतना ही है जितना कि पानी मिले दूध में घी का हो सकता है। वे एक ओर देश भक्ति की दुहाई देते दिखाई देते हैं, दूसरी ओर क्षेत्रवाद, जातिवाद का नारा लगाते दिखते हैं। आज एक दल में हैं, तो कल अन्तरात्मा की पुकार पर दूसरे दल में पहुँचकर निष्ठावान् होने की शपथ गीता पर हाथ रखकर लेते हैं। एक वर्ग उनका रह जाता है, जिन्हें हम अर्थतन्त्र की बागडोर सँभालने वाले पूँजीपति नाम दे सकते हैं। अपनी मनमर्जी से, मिलावट, रिश्वतखोरी का आश्रय लेकर चरित्रहीन व्यक्ति धन- कुबेर बने बैठे उन सभी को अँगूठा दिखाते नजर आते हैं, जो दिन भर मेहनत कर आधा पेट भरने लायक रोटी भी नहीं कमा पाते।
युद्धोन्माद, जघन्य स्तर के अपराध, पवित्र स्थलों का आश्रय लेकर धर्म के नाम पर हिंसा व अलगाववाद की दुहाई, सम्प्रदायवाद, जातीय आधार पर टिकी राजनीति के, राजघरानों के जमाने के षड्यंत्र एवं दुरभिसन्धियाँ बीसवीं सदी के इस सातवें- आठवें दशक की त्रासदी भरी कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। इन्हें देखते- देखते गत बीस- पच्चीस वर्षों में हम मोटी चमड़ी के हो गए हैं। अब हमें ये समस्याएँ नजर नहीं आतीं, जीवन का अभिन्न अंग लगती हैं। लेकिन जो भुक्त भोगी हैं, वे बहुसंख्यक हैं एवं वे समस्याओं का समाधान किसी भी स्थिति में चाहते हैं कि विश्व- वसुधा की नैया युग विभीषिकाओं के इस आइसवर्ग से टकरा- टकरा कर चूर- चूर हो जाए।
नियन्ता भी यह नहीं चाहता। चाहता होता तो सृष्टि रचता ही क्यों? उस परम सत्ता की एक ही इच्छा है कि मानवी पराक्रम- आत्मबल स्वयमेव उभरकर आए और इन विध्वंसक शक्तियों से मोर्चा ले। श्रुति का कथन सच है कि आत्मबल का पूरक परमात्मबल है। वह परमसत्ता तभी अपनी भूमिका निभाने आगे आती है, जब मनुष्य अपने सारे प्रयास करके थक जाता है एवं रक्षा हेतु गुहार लगाता है।
स्थिति बहुत गंभीर है- जो समझदार हैं, वे समय की इस विषमता को भली- भाँति समझते हैं। वे जानते हैं कि बड़े राष्ट्रों द्वारा अस्त्र एकत्र कर लेने का अर्थ है- सामूहिक आत्मघात। बढ़ती जनसंख्या एवं संव्याप्त प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रदूषण की परिणति भी वे जानते व भली- भाँति समझते हैं। वे इस तथ्य से भी अवगत हैं कि पूँजी के आधार पर विलासिता की पृष्ठभूमि पर एवं चिन्तन को विकृत कर देने वाले साधनों के बलबूते यह विश्व तकनीकी दृष्टि से कितना भी बढ़ा- चढ़ा होने पर भी वस्तुतः विनाश को ही प्राप्त होगा।
इस सम्बन्ध में द्वितीय विश्व युद्ध के समय फ्रांस के आश्चर्यजनक पतन का प्रसंग उल्लेखनीय है। जर्मनी के खूँखार डिक्टेटर हिटलर ने जब नस्लवाद के नाम पर अपनी विनाश लीला का आरंभ किया, तब पोलैण्ड को तो उसने पहले ही दाँव में धूर्त्तता से हथिया लिया। उसके समक्ष एक विस्तृत साम्राज्य फ्रांस का था, जिसे हस्तगत करने पर विश्व विजय की उसकी सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाती। विदेशी आक्रामकों के बर्बर इरादों से अनभिज्ञ फ्रांसीसी सुरक्षा के स्थान पर विलासिता के मद में चूर बने हुए थे। हिटलर ने अपनी शक्ति, सैनिक बल, धन इस कार्य में अधिक नष्ट करना उचित न समझा। सुरा- सुन्दरी के नशे में डूबे फ्रांसीसियों ने मात्र चौबीस घण्टे में आत्मसमर्पण कर दिया और हिटलर फ्रांस में अपना झण्डा फहराकर नये मोर्चे की तैयारी करने लगा। तत्कालीन विचारकों ने चिन्तन करने पर पाया कि आत्मबल की दृष्टि से हीन, खोखले नागरिकों को जीता नहीं गया, उन्होंने स्वयं आत्मसमर्पण कर दिया।
जिन्हें भगवान् ने थोड़ी भी समझ दी है वे भली- भाँति जानते हैं कि आज सारे विश्व की स्थिति लगभग वैसी ही है जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के समय थी। राष्ट्रीयता, नैतिक अनुशासन मात्र किताबों में लिखने के लिये रह गया है। अश्लील साहित्य हमारे अपने ही देश में नहीं, सारे विश्व में इतनी बड़ी मात्रा में छपता व नित्य पढ़ा जाता है, जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। नशीली दवाओं की खपत नित्य बढ़ती चली जा रही है। हशीश, कोकीन, चरस, हिरोइन जैसी घातक- मादक वस्तुओं की एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे देश में तस्करी का ऐसा जाल बिछा हुआ है जो तोड़ने में नहीं टूटता। फिल्मों ने ऐसे अवसर पर एक उत्प्रेरक (केटेलिस्ट) की भूमिका निभाने का दायित्व उठाया है। वे अपराधों, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता एवं आत्मघाती उन्मादी मनोवृत्ति को जन्म देने वाली प्रवृत्तियों को ही प्रश्रय देती नजर आती हैं।
समाचार पत्र- पत्रिकाओं ने भी मानो नैतिक अनुशासन के पतन में भागीदार बनने का दायित्व अपने हाथों में ले लिया है। मात्र वे ही समाचार प्रकाश में आते हैं, जिनसे अन्यों को उन्हीं (पतनोन्मुखों) का अनुकरण करने की प्रेरणा मिले। राज्य प्रमुखों- राष्ट्राध्यक्षों कर्मचारी वर्गों में ईमानदारी का अंश उतना ही है जितना कि पानी मिले दूध में घी का हो सकता है। वे एक ओर देश भक्ति की दुहाई देते दिखाई देते हैं, दूसरी ओर क्षेत्रवाद, जातिवाद का नारा लगाते दिखते हैं। आज एक दल में हैं, तो कल अन्तरात्मा की पुकार पर दूसरे दल में पहुँचकर निष्ठावान् होने की शपथ गीता पर हाथ रखकर लेते हैं। एक वर्ग उनका रह जाता है, जिन्हें हम अर्थतन्त्र की बागडोर सँभालने वाले पूँजीपति नाम दे सकते हैं। अपनी मनमर्जी से, मिलावट, रिश्वतखोरी का आश्रय लेकर चरित्रहीन व्यक्ति धन- कुबेर बने बैठे उन सभी को अँगूठा दिखाते नजर आते हैं, जो दिन भर मेहनत कर आधा पेट भरने लायक रोटी भी नहीं कमा पाते।


