प्रतिभा का भटकाव
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इन दिनों दोनों की ही दुर्गति हुई है। वैज्ञानिक अविष्कारकों की एक पीढ़ी बहुत ही प्रसिद्ध और कृतकृत्य हुई थी। उसने सामान्य योग्यता रहते हुए भी ऐसे आविष्कार किये थे, जिससे जन- साधारण को असीम और असाधारण लाभ पहुँचा। बिजली का आविष्कार उसमें सर्वाधिक महत्त्व का है। अब वह मनुष्य जीवन का अविच्छिन्न अंग बनकर रह रही है। इसके बाद वाहनों का नम्बर आता है। साइकिल से लेकर रेल, मोटर, जलयान, वायुयान इसी स्तर के हैं, जिनने लम्बी यात्राएँ सरल बना दीं। भार वहन का खर्च भी बहुत कम कर दिया। फलतः व्यापार तेजी से पनपने लगे। टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन की उपयोगिता ऐसी ही है। एक युग था जब मनुष्य जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने में वैज्ञानिकों ने— उनके आविष्कारों ने असाधारण सेवा- सहायता की। उत्पादन में काम आने वाले अनेक छोटे- बड़े यन्त्र भी ऐसे हैं, जिनके लिए मनुष्य जाति उनकी सदा कृतज्ञ रहेगी। कोल्हू, चक्की, पम्प आदि की गणना ऐसे ही संयन्त्रों में होती है।
किन्तु वह वर्ग भी अपनी गरिमा दार्शनिकों की तरह अक्षुण्ण बनाये न रह सका। आविष्कारकों का अपना कोई उत्पादन क्षेत्र न था। उन्हें उत्पादक धनाध्यक्षों के लिए काम करने के लिए बाधित होना पड़ा। बात यहीं से गड़बड़ी की आरम्भ होती है। फिल्म उद्योग लोकशिक्षण का एक उपयोगी माध्यम हो सकता था, पर उसके उत्पादनों को देखकर दुःख होता है। फिल्म दर्शक और साहित्य पाठक अन्ततः इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि यदि इनसे दूर रहते तो भ्रम जंजाल से बचकर कहीं अधिक नफे में रहते।
इन दिनों प्रायः पचास हजार ऊँची श्रेणी के वैज्ञानिक मात्र युद्ध आयुध बनाने की नई- नई विधियाँ खोजने में निरत हैं। उन्हें इसके लिए पूरा सम्मान और पूरा पैसा दिया जा रहा है। इतना वे अन्यत्र कहीं नहीं पा सकते। इसलिए मौलिक चिन्तन के सुनियोजन का रास्ता ही बन्द है। सरलता और सुख- सुविधा हर किसी को प्रिय लगती है। चाहे दार्शनिक हो या वैज्ञानिक। स्थिति को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि दोनों ही क्षेत्रों में मौलिक विचारकता प्रायः समाप्त हो गई। दोनों को ही अपने मालिकों और धनाध्यक्षों के लिए काम करना पड़ रहा है।
किन्तु वह वर्ग भी अपनी गरिमा दार्शनिकों की तरह अक्षुण्ण बनाये न रह सका। आविष्कारकों का अपना कोई उत्पादन क्षेत्र न था। उन्हें उत्पादक धनाध्यक्षों के लिए काम करने के लिए बाधित होना पड़ा। बात यहीं से गड़बड़ी की आरम्भ होती है। फिल्म उद्योग लोकशिक्षण का एक उपयोगी माध्यम हो सकता था, पर उसके उत्पादनों को देखकर दुःख होता है। फिल्म दर्शक और साहित्य पाठक अन्ततः इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि यदि इनसे दूर रहते तो भ्रम जंजाल से बचकर कहीं अधिक नफे में रहते।
इन दिनों प्रायः पचास हजार ऊँची श्रेणी के वैज्ञानिक मात्र युद्ध आयुध बनाने की नई- नई विधियाँ खोजने में निरत हैं। उन्हें इसके लिए पूरा सम्मान और पूरा पैसा दिया जा रहा है। इतना वे अन्यत्र कहीं नहीं पा सकते। इसलिए मौलिक चिन्तन के सुनियोजन का रास्ता ही बन्द है। सरलता और सुख- सुविधा हर किसी को प्रिय लगती है। चाहे दार्शनिक हो या वैज्ञानिक। स्थिति को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि दोनों ही क्षेत्रों में मौलिक विचारकता प्रायः समाप्त हो गई। दोनों को ही अपने मालिकों और धनाध्यक्षों के लिए काम करना पड़ रहा है।


