यह कठिन है पर असंभव नहीं-
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परिवर्तन शब्द कहने- सुनने में सरल है, रुचिकर भी है, अभीष्ट भी। किन्तु विडम्बना एक ही है कि लगभग असम्भव तो नहीं, किन्तु कष्ट साध्य इस प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिये न तो साधन जुटाने से काम चल सकता है, न तो अनर्थक परिश्रम से कोई प्रयोजन सध सकता है। इस प्रयोजन की पूर्ति हेतु तो आदर्शवादी श्रद्धा का उथला नहीं गहरा स्तर चाहिए। यह जब तक न होगा सारे ब्राह्योपचार निरर्थक हैं। युग बदल सकने में समर्थ इस बहुमूल्य पूँजी का भाण्डागार मानवी व्यक्तित्व के गहन अन्तराल में छिपा पड़ा है जिसे कुरेदने, उभारकर प्रखर बनाने की आवश्यकता है। यही समस्त समस्याओं का समाधान है। यदि आस्थाओं में आमूल- चूल परिवर्तन हो, उनका सुनियोजन भी हो गया, तो मानना चाहिये कि श्रुति की मान्यतानुसार कलियुग चला गया एवं सतयुग का पदार्पण हो गया।
हम इसी आशावादी दृष्टिकोण के साथ उन चिरायु तपस्वी ऋषियों की युग साधना में सहभागी बने हैं कि नवयुग अवश्य आयेगा। वह श्रद्धायुग कहा जायेगा। आस्थाओं के स्तर के मीटर के आधार पर ही किसी की महानता- क्षुद्रता का मूल्यांकन किया जायेगा। महाप्रज्ञा का तत्त्वदर्शन जन- जन के मन- मन में प्रविष्ट होगा एवं विवेक का सारथी उन मूर्धन्यों की ज्ञानेन्द्रियों का संचालन करेगा; जिनके हाथों में अर्थ, सुरक्षा, शासन एवं विचार तंत्र है। सूक्ष्मीकरण साधना के इस पुरुषार्थ के बलबूते ही हम यह कह सकते हैं कि छोटे- छोटे अकिंचन माने जाने वाले मनुष्य इतनी समर्थ भूमिका निभायेंगे कि पर्वत जैसी अवांछनीयताओं को उलट पाना एवं स्वाति नक्षत्र की वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों का नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके। जो समर्थ होता है, वही यह पुरुषार्थ कर दिखाने का दावा कर सकता है।
[युगऋषि ने यहाँ लिखा है कि वे चिरायु तपस्वी ऋषियों की युग साधना में भागीदार बने हैं। इस सन्दर्भ में विवरण जानने के लिए ‘हमारी वसीयत और विरासत’ पुस्तक का अध्ययन किया जा सकता है।]
विचार- क्रान्ति शब्द तो अच्छा है, किन्तु व्यवहार में इसे प्रयुक्त कर दिखाने के लिये एक समर्थ, दैवी तन्त्र का संरक्षण चाहिए। हमारा दावा है कि असम्भव को सम्भव कर दिखाने का यह पुरुषार्थ आगामी कुछ दशकों में सम्पन्न होकर रहेगा। विवेक और श्रद्धा के जिस समन्वित ऋतंभरा रूप का आद्यशक्ति का हमने अवलम्बन लिया है, उसमें लाखों- करोड़ों को अपना सहभागी बनाया है। प्रत्यक्ष जितना किया जा सकता था, हो चुका। वह पृष्ठभूमि तैयार हो गयी, जो नियन्ता को अभीष्ट थी। अब राष्ट्रीय नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबल क्राइसिस के निवारणार्थ परोक्ष भूमिका ही अभीष्ट थी। मौन- नितान्त एकाकी पुरुषार्थ क्या कुछ कर सकेगा, अन्त में श्रद्धा का बीजारोपण कर कैसे वांछित प्रयोजन पूरा कर सकेगा? इसे विश्व स्तर पर देखा जा सकना अगले दिनों सम्भव होगा।
इतिहास भी इस तथ्य का साक्षी है कि जब- जब भी बिगाड़ बेकाबू हुआ है, उसे नियंत्रित करने हेतु महाकाल रूपी महावतों की मार ही सफल हो पाई है। प्रकारान्तर से इसे भगवान् के अवतार की संज्ञा भी दी जा सकती है। अदृश्य युग प्रवाह का विनिर्मित होना ही प्रज्ञावतरण है। समझ जब काम नहीं करती, तब अदृश्य जगत् से- परोक्ष के व्यवस्था उपक्रम से यह अपेक्षा की जाती है कि इस धरित्री को महाविनाश के गर्त में जाने नहीं देगा। जिसकी इच्छा से इस सृष्टि का प्रारूप बना व मानव रूपी युवराज जन्मा, उसे जगती का वर्तमान चोला ही पसन्द है, यह सोचना नासमझी है। नियन्ता ने सदैव सन्तुलन स्थापित करने हेतु दौड़ लगाने का अपना वचन निबाहा है।
इन दिनों भले ही प्रत्यक्ष में तमिस्रा का व्यापक साम्राज्य संव्याप्त नजर आता हो। वह दैवी सत्ता निराकार रूप में ही देखते- देखते एक छोटा सा सूरज उगाकर सारी परिस्थितियाँ उलट सकती है। हरीतिमा रहित ठूँठों पर वासन्ती बहार ला देना उसके लिए बायें हाथ का खेल है। इसके लिए ऋषि- महामानव सदा- सदा से ही अवतरित होते रहे हैं। वर्तमान क्रिया- कलापों में उस दैवी चेतना के सक्रिय क्रियान्वयन को ज्ञान- चक्षुओं द्वारा देखा जा सकता है। अन्यथा वह उमंग कैसे उठती, जिसने इस दैवी मिशन को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया? जो इतना समझते हैं, वे इस आश्वासन को भी सुनिश्चित समझें कि समय बदलेगा, नासमझी का स्थान विवेकशीलता लेगी और समग्र सूत्र- संचालन सोये* मूर्धन्यों के हाथों से निकलकर जाग्रत् आत्माओं के हाथों में आयेगा। हमारी अन्तर्मुखी- एकाकी साधना को उसी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
[* सोये मूर्धन्यों से मतलब है, ऐसे प्रभावी लोग जिनमें प्रतिभा तो है, परन्तु वे अपने नैतिक दायित्वों के प्रति जागरूक नहीं हैं। जाग्रत् आत्मा वे जो अपनी अंतरंग जागृति के कारण ईश्वरीय निर्देशों को सुनने तथा क्रियान्वित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।]
हम इसी आशावादी दृष्टिकोण के साथ उन चिरायु तपस्वी ऋषियों की युग साधना में सहभागी बने हैं कि नवयुग अवश्य आयेगा। वह श्रद्धायुग कहा जायेगा। आस्थाओं के स्तर के मीटर के आधार पर ही किसी की महानता- क्षुद्रता का मूल्यांकन किया जायेगा। महाप्रज्ञा का तत्त्वदर्शन जन- जन के मन- मन में प्रविष्ट होगा एवं विवेक का सारथी उन मूर्धन्यों की ज्ञानेन्द्रियों का संचालन करेगा; जिनके हाथों में अर्थ, सुरक्षा, शासन एवं विचार तंत्र है। सूक्ष्मीकरण साधना के इस पुरुषार्थ के बलबूते ही हम यह कह सकते हैं कि छोटे- छोटे अकिंचन माने जाने वाले मनुष्य इतनी समर्थ भूमिका निभायेंगे कि पर्वत जैसी अवांछनीयताओं को उलट पाना एवं स्वाति नक्षत्र की वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों का नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके। जो समर्थ होता है, वही यह पुरुषार्थ कर दिखाने का दावा कर सकता है।
[युगऋषि ने यहाँ लिखा है कि वे चिरायु तपस्वी ऋषियों की युग साधना में भागीदार बने हैं। इस सन्दर्भ में विवरण जानने के लिए ‘हमारी वसीयत और विरासत’ पुस्तक का अध्ययन किया जा सकता है।]
विचार- क्रान्ति शब्द तो अच्छा है, किन्तु व्यवहार में इसे प्रयुक्त कर दिखाने के लिये एक समर्थ, दैवी तन्त्र का संरक्षण चाहिए। हमारा दावा है कि असम्भव को सम्भव कर दिखाने का यह पुरुषार्थ आगामी कुछ दशकों में सम्पन्न होकर रहेगा। विवेक और श्रद्धा के जिस समन्वित ऋतंभरा रूप का आद्यशक्ति का हमने अवलम्बन लिया है, उसमें लाखों- करोड़ों को अपना सहभागी बनाया है। प्रत्यक्ष जितना किया जा सकता था, हो चुका। वह पृष्ठभूमि तैयार हो गयी, जो नियन्ता को अभीष्ट थी। अब राष्ट्रीय नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबल क्राइसिस के निवारणार्थ परोक्ष भूमिका ही अभीष्ट थी। मौन- नितान्त एकाकी पुरुषार्थ क्या कुछ कर सकेगा, अन्त में श्रद्धा का बीजारोपण कर कैसे वांछित प्रयोजन पूरा कर सकेगा? इसे विश्व स्तर पर देखा जा सकना अगले दिनों सम्भव होगा।
इतिहास भी इस तथ्य का साक्षी है कि जब- जब भी बिगाड़ बेकाबू हुआ है, उसे नियंत्रित करने हेतु महाकाल रूपी महावतों की मार ही सफल हो पाई है। प्रकारान्तर से इसे भगवान् के अवतार की संज्ञा भी दी जा सकती है। अदृश्य युग प्रवाह का विनिर्मित होना ही प्रज्ञावतरण है। समझ जब काम नहीं करती, तब अदृश्य जगत् से- परोक्ष के व्यवस्था उपक्रम से यह अपेक्षा की जाती है कि इस धरित्री को महाविनाश के गर्त में जाने नहीं देगा। जिसकी इच्छा से इस सृष्टि का प्रारूप बना व मानव रूपी युवराज जन्मा, उसे जगती का वर्तमान चोला ही पसन्द है, यह सोचना नासमझी है। नियन्ता ने सदैव सन्तुलन स्थापित करने हेतु दौड़ लगाने का अपना वचन निबाहा है।
इन दिनों भले ही प्रत्यक्ष में तमिस्रा का व्यापक साम्राज्य संव्याप्त नजर आता हो। वह दैवी सत्ता निराकार रूप में ही देखते- देखते एक छोटा सा सूरज उगाकर सारी परिस्थितियाँ उलट सकती है। हरीतिमा रहित ठूँठों पर वासन्ती बहार ला देना उसके लिए बायें हाथ का खेल है। इसके लिए ऋषि- महामानव सदा- सदा से ही अवतरित होते रहे हैं। वर्तमान क्रिया- कलापों में उस दैवी चेतना के सक्रिय क्रियान्वयन को ज्ञान- चक्षुओं द्वारा देखा जा सकता है। अन्यथा वह उमंग कैसे उठती, जिसने इस दैवी मिशन को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया? जो इतना समझते हैं, वे इस आश्वासन को भी सुनिश्चित समझें कि समय बदलेगा, नासमझी का स्थान विवेकशीलता लेगी और समग्र सूत्र- संचालन सोये* मूर्धन्यों के हाथों से निकलकर जाग्रत् आत्माओं के हाथों में आयेगा। हमारी अन्तर्मुखी- एकाकी साधना को उसी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
[* सोये मूर्धन्यों से मतलब है, ऐसे प्रभावी लोग जिनमें प्रतिभा तो है, परन्तु वे अपने नैतिक दायित्वों के प्रति जागरूक नहीं हैं। जाग्रत् आत्मा वे जो अपनी अंतरंग जागृति के कारण ईश्वरीय निर्देशों को सुनने तथा क्रियान्वित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।]


