दार्शनिकों-वैज्ञानिकों की दिशा बदलनी ही होगी
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किसी समय मुनि, मनीषी और दार्शनिक समाज के सर्वोच्च वर्ग में गिने जाते थे; क्योंकि उन्हीं के प्रतिपादन शासनाध्यक्षों तथा अन्यान्य विशिष्ट वर्गों को मान्य होते थे। उनकी अवज्ञा करने का दुस्साहस कोई करता नहीं था; क्योंकि समय के अनुरूप राह बताने और निर्धारण करने की उनकी क्षमता असाधारण भी होती थी और उनका वर्चस्व भी था
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दार्शनिक इसी श्रेणी में आते थे। वे शास्त्र रचते थे और सामयिक समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करते थे। प्रवचन के लिए व्यास पीठों पर उन्हीं का अधिकार था। राजा से लेकर रंक तक उनकी असामान्य मान्यता थी। आज भी यह वर्ग लेखकों, कवियों, कलाकारों के रूप में है तो सही, पर अपनी गरिमा गँवा बैठा है। उसका अपना न तो स्तर है, न लक्ष्य। इनमें से अधिकांश को धनाध्यक्षों की सेवा में चारणों की तरह निरत रहना पड़ता है। जो उनसे सोचने के लिए कहते हैं सो ही वे सोचते हैं, जो लिखने का निर्देश मिलता है सो ही लिखते हैं
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चूँकि प्रेस प्रकाशन एक व्यवसाय बन गया है और व्यवसाय सदा धनिक चलाते हैं। जो संचालक है उसी की नीति भी चलेगी। इन दिनों अनेक पत्र- पत्रिकाएँ निकलती हैं। पुस्तकें भी छपती हैं। पर उनमें लेखक की अपनी कोई स्वतन्त्र आवाज नहीं। प्रकाशक को जिसमें अपना लाभ दीखता है, लेखक वही लिखता है; क्योंकि पैसा उसे अपने मालिक की मर्जी के अनुरूप लिखने को मिलता है। अब स्वतन्त्र लेखक रह नहीं गये हैं, जो अपनी मर्जी से लिखें। यदि मर्जी हो भी तो वह मालिक की मर्जी से भिन्न नहीं होनी चाहिए। अन्यथा मालिक ऐसे धन्धे में पैसा क्यों लगायेगा?
जिसमें उसे लाभ नहीं दिखता। लेखक का अपना निज का कोई प्रेस नहीं। जो कहीं, जहाँ- तहाँ हैं, वे प्रतिस्पर्धा में ठहर न पाने के कारण लँगड़े- लूले ज्यों करके चलते हैं। उन्हें न ग्राहक मिलते हैं और न खपत का जुगाड़ बनता है। ऐसी दशा में स्वतन्त्र प्रेस का अस्तित्व प्रायः नहीं के बराबर है। लेखक, चिन्तक या दार्शनिक अब घटते या मिटते जा रहे हैं
मनीषियों का दूसरा वर्ग वैज्ञानिकों का है। पुरातन काल में वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की जिम्मेदारी एक ही वर्ग उठाता था। जिनकी रुचि भौतिक क्षेत्र में होती वे चरक, कणाद, नागार्जुन, याज्ञवल्क्य, द्रोणाचार्य आदि की तरह भौतिक अनुसन्धानों को हाथ में लेते थे। अन्यथा व्यास, कपिल, वसिष्ठ, गौतम की तरह युग दर्शन में नये अध्याय जोड़ते रहते थे।
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दार्शनिक इसी श्रेणी में आते थे। वे शास्त्र रचते थे और सामयिक समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करते थे। प्रवचन के लिए व्यास पीठों पर उन्हीं का अधिकार था। राजा से लेकर रंक तक उनकी असामान्य मान्यता थी। आज भी यह वर्ग लेखकों, कवियों, कलाकारों के रूप में है तो सही, पर अपनी गरिमा गँवा बैठा है। उसका अपना न तो स्तर है, न लक्ष्य। इनमें से अधिकांश को धनाध्यक्षों की सेवा में चारणों की तरह निरत रहना पड़ता है। जो उनसे सोचने के लिए कहते हैं सो ही वे सोचते हैं, जो लिखने का निर्देश मिलता है सो ही लिखते हैं
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चूँकि प्रेस प्रकाशन एक व्यवसाय बन गया है और व्यवसाय सदा धनिक चलाते हैं। जो संचालक है उसी की नीति भी चलेगी। इन दिनों अनेक पत्र- पत्रिकाएँ निकलती हैं। पुस्तकें भी छपती हैं। पर उनमें लेखक की अपनी कोई स्वतन्त्र आवाज नहीं। प्रकाशक को जिसमें अपना लाभ दीखता है, लेखक वही लिखता है; क्योंकि पैसा उसे अपने मालिक की मर्जी के अनुरूप लिखने को मिलता है। अब स्वतन्त्र लेखक रह नहीं गये हैं, जो अपनी मर्जी से लिखें। यदि मर्जी हो भी तो वह मालिक की मर्जी से भिन्न नहीं होनी चाहिए। अन्यथा मालिक ऐसे धन्धे में पैसा क्यों लगायेगा?
जिसमें उसे लाभ नहीं दिखता। लेखक का अपना निज का कोई प्रेस नहीं। जो कहीं, जहाँ- तहाँ हैं, वे प्रतिस्पर्धा में ठहर न पाने के कारण लँगड़े- लूले ज्यों करके चलते हैं। उन्हें न ग्राहक मिलते हैं और न खपत का जुगाड़ बनता है। ऐसी दशा में स्वतन्त्र प्रेस का अस्तित्व प्रायः नहीं के बराबर है। लेखक, चिन्तक या दार्शनिक अब घटते या मिटते जा रहे हैं
मनीषियों का दूसरा वर्ग वैज्ञानिकों का है। पुरातन काल में वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की जिम्मेदारी एक ही वर्ग उठाता था। जिनकी रुचि भौतिक क्षेत्र में होती वे चरक, कणाद, नागार्जुन, याज्ञवल्क्य, द्रोणाचार्य आदि की तरह भौतिक अनुसन्धानों को हाथ में लेते थे। अन्यथा व्यास, कपिल, वसिष्ठ, गौतम की तरह युग दर्शन में नये अध्याय जोड़ते रहते थे।


