पर्यवेक्षण के साथ सार्थक प्रयास
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यह वस्तुस्थिति का पर्यवेक्षण हुआ। इतने भर से बात क्या बनती है? समीक्षाएँ, भर्त्सनाएँ आये दिन होती रहती हैं। उन्हें एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं। होना तो कुछ ऐसा चाहिए, जिससे काम बने। हम अब वही करने जा रहे हैं। वैज्ञानिक और दार्शनिक हमारी एक मुहिम में हैं। वैज्ञानिकों को भड़कायेंगे कि युद्ध के घातक शस्त्र बनाने में उनकी बुद्धि सहयोग देना बंद कर दे। गाड़ी अधर में लटक जाये।
युद्धोन्माद ग्रस्त - दोनों पक्ष इसी फिराक में हैं कि उनके वैज्ञानिक ऐसे अमोघ उपाय निकाल लेंगे, जिससे अपनी जीत निश्चित रहे और सामने वाला अपंग होकर बैठा रहे। सूक्ष्मीकरण के उपरांत अब हम वैसा न होने देंगे। उच्चस्तरीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा और सूझ- बूझ उन्हें वैसा न करने देगी। जैसा कि अपेक्षा की जा रही है। अब उनका मस्तिष्क ऐसे छोटे उपकरण बनाने की ओर लौटेगा, जिससे कुटीर उद्योगों को सहायता देने वाला नया माहौल उफन पड़े। इसका उदाहरण देने के लिए एक नमूना अपने सामने बनाकर जायेंगे।
[युगऋषि ने शांतिकुंज में प्रतीकात्मक रूप में लोकसेवी (युग शिल्पी) के साथ कुटीर उद्योग प्रशिक्षण भी उन्हीं दिनों चालू कर दिया गया था। उनकी अनेक धाराएँ विकसित हो रही हैं। देवसंस्कृति विश्व विद्यालय में ग्राम स्वावलम्बन, ग्राम प्रबन्धन का पाठ्यक्रम भी चालू कर दिया गया है।]
लेखकों, दार्शनिकों का अब एक नया वर्ग उठेगा, वह अपनी प्रतिभा के बलबूते एकाकी सोचने और एकाकी लिखने का प्रयत्न करेगा। उन्हें उद्देश्य में सहायता मिलेगी। मस्तिष्क के कपाट खुलते जायेंगे और उन्हें सूझ पड़ेगा कि इन दिनों क्या लिखने योग्य है? एक मात्र वही लिखा जाना है।
क्या बिना सम्पन्न लोगों की सहायता लिये, बिना वर्तमान पुस्तक विक्रेताओं की मोटे मुनाफे की माँग पूरी किये, ऐसा हो सकता है कि जनसाधारण का उपयोगी लोक साहित्य लागत मूल्य पर छपने लगे और घर- घर तक पहुँचने लगे? हमारा विश्वास है कि यह असंभव नहीं है। समय अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिए रास्ता निकालेगा और छाये हुए अँधेरे में किसी चमकने वाले सितारे का प्रकाश दृष्टिगोचर होगा।
दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही मुड़ेंगे। इन दिनों खदानों में से ऐसे नररत्न निकलेंगे, जो उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने में आश्चर्यजनक योगदान दे सकें। ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करने में हमारा योगदान होगा, भले ही परोक्ष होने के कारण लोग इसे देख या समझ न सकें।
युद्धोन्माद ग्रस्त - दोनों पक्ष इसी फिराक में हैं कि उनके वैज्ञानिक ऐसे अमोघ उपाय निकाल लेंगे, जिससे अपनी जीत निश्चित रहे और सामने वाला अपंग होकर बैठा रहे। सूक्ष्मीकरण के उपरांत अब हम वैसा न होने देंगे। उच्चस्तरीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा और सूझ- बूझ उन्हें वैसा न करने देगी। जैसा कि अपेक्षा की जा रही है। अब उनका मस्तिष्क ऐसे छोटे उपकरण बनाने की ओर लौटेगा, जिससे कुटीर उद्योगों को सहायता देने वाला नया माहौल उफन पड़े। इसका उदाहरण देने के लिए एक नमूना अपने सामने बनाकर जायेंगे।
[युगऋषि ने शांतिकुंज में प्रतीकात्मक रूप में लोकसेवी (युग शिल्पी) के साथ कुटीर उद्योग प्रशिक्षण भी उन्हीं दिनों चालू कर दिया गया था। उनकी अनेक धाराएँ विकसित हो रही हैं। देवसंस्कृति विश्व विद्यालय में ग्राम स्वावलम्बन, ग्राम प्रबन्धन का पाठ्यक्रम भी चालू कर दिया गया है।]
लेखकों, दार्शनिकों का अब एक नया वर्ग उठेगा, वह अपनी प्रतिभा के बलबूते एकाकी सोचने और एकाकी लिखने का प्रयत्न करेगा। उन्हें उद्देश्य में सहायता मिलेगी। मस्तिष्क के कपाट खुलते जायेंगे और उन्हें सूझ पड़ेगा कि इन दिनों क्या लिखने योग्य है? एक मात्र वही लिखा जाना है।
क्या बिना सम्पन्न लोगों की सहायता लिये, बिना वर्तमान पुस्तक विक्रेताओं की मोटे मुनाफे की माँग पूरी किये, ऐसा हो सकता है कि जनसाधारण का उपयोगी लोक साहित्य लागत मूल्य पर छपने लगे और घर- घर तक पहुँचने लगे? हमारा विश्वास है कि यह असंभव नहीं है। समय अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिए रास्ता निकालेगा और छाये हुए अँधेरे में किसी चमकने वाले सितारे का प्रकाश दृष्टिगोचर होगा।
दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही मुड़ेंगे। इन दिनों खदानों में से ऐसे नररत्न निकलेंगे, जो उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने में आश्चर्यजनक योगदान दे सकें। ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करने में हमारा योगदान होगा, भले ही परोक्ष होने के कारण लोग इसे देख या समझ न सकें।


