इस दुर्गति से उबारना ही होगा
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यह दुर्भाग्य पूर्ण दुर्गति है। इससे उबरा कैसे जाय? उबारे कौन? वैज्ञानिकों के लिए कुटीर उद्योग से सम्बन्धित अगणित यन्त्र ऐसे बनाने के लिए पड़े हैं जिन्हें बनाया जा सके, तो असंख्यों को बेकारी से त्राण पाने का अवसर मिले और अभावजन्य कठिनाइयों से पीछा छूटे। घरेलू आटा चक्की, घरेलू तेल कोल्हू, घरेलू चरखा, करघा, लुहारी, बढ़ईगीरी की मशीनें, कुम्हार के चाक जैसे यन्त्र ऐसे निकल सकते हैं, जिनके सहारे सामान्य जीवन की सुविधा भी बढ़े और आमदनी भी। सस्ते पम्प सेटों की हर जगह आवश्यकता है। कागज बनाने का उद्योग हर देहात में चल सकता है। सूर्य की गर्मी से चालित भट्ठी एवं चूल्हे से मुफ्त में गरम पानी मिलने और वस्तुएँ पकाने- सुखाने का काम हो सकता है।इन सब कार्यों में अपने वैज्ञानिक पूरी तरह समर्थ हो सकते हैं और उन यन्त्रों के उत्पादन का एक नया बड़ा उद्योग चल सकता है। पर ऐसा कुछ हो नहीं रहा है। जो कुटीर उद्योग के नाम पर बना हुआ है वह इतना लँगड़ा, लूला है कि लगाने वालों की कमर तोड़कर उसे मजा चखा देता है। इन सभी उपकरणों के निर्माताओं का- अविष्कारकों का पारस्परिक सहयोग यदि सच्चे मन से हुआ होता और उसके लिए आवश्यक पूँजी जुट सकी होती, प्रयोक्ताओं को व्यावहारिक शिक्षा मिल सकी होती, सहकारी माध्यमों से कच्चा माल देने और बनी वस्तुएँ लेने का, उपयुक्त मण्डियों में बेचने का यदि प्रबन्ध हुआ होता, तो परिस्थितियाँ कुछ और हुई होतीं। तब हम मात्र कृषि पर निर्भर न रहते। गोबर के अतिरिक्त दूसरे सस्ते वानस्पतिक खाद भी आविष्कृत कर रहे होते। पशुओं के लिए खेतों में सस्ती और अधिक फसल वर्ष भर देने वाली घास उगाते और पशुपालन घाटे का सौदा न रहा होता।
[जागरूक पाठकगण यह निष्कर्ष आसानी से निकाल सकते हैं कि ९० के दशक से इस दिशा में पर्याप्त प्रयास हुए हैं तथा इक्कीसवीं सदी प्रारंभ होने तक काफी कुछ सफल शोध प्रयोग हुए हैं। जन सामान्य ने उक्त शोध प्रयोगों का लाभ उठाना शुरू कर दिया है।]
शिकायतें कौन किसकी करे? पर गुंजाइश इस बात की पूरी- पूरी है कि देश को कुटीर उद्योग स्तर पर योजनाबद्ध ढंग से खड़ा किया जाय। यों चलने को तो यह सब कुछ अभी भी चल रहा है, पर उसे अपर्याप्त और असन्तोषजनक ही कहा जा सकता है। जापान जैसी लगन हमारे वैज्ञानिकों, निर्माताओं, उपभोक्ताओं की लगी होती, तो अपने देश के मनीषी ही इस क्षेत्र में चमत्कार करके दिखा सकते थे। पर बने कैसे? जबकि सबको अधिक कमाने की, हाथों- हाथ सुविधा समेटने की पड़ी है। प्रतिभाएँ विदेशों को- पूँजीवादी राष्ट्रों की ओर भागती चली जा रही हैं। कुटीर उद्योग जहाँ भी चल रहे हैं, घाटा दे रहे हैं। जिनने पैर बढ़ाया उनका जोश ठण्डा कर रहे हैं।
यही बात दार्शनिकों- मनीषियों के सम्बन्ध में भी है। समय जिस तेजी से बढ़ा है, उसी तेजी से समस्याएँ भी उपजी तथा उलझी हैं। वे सभी अपने समाधान चाहती हैं- बुद्धि संगत, व्यावहारिक और तथ्यों पर निर्धारित। ऐसे मार्गदर्शन का साहित्य लिखा गया होता, छपता और पाठकों तक उचित मूल्य में पहुँचता तो कैसा अच्छा होता? पर दिखता इस क्षेत्र में भी अँधेरा ही है।
पुस्तकों के नाम पर पहाड़ के बराबर हर दिन कागज काला होता है। पत्र- पत्रिकाएँ भी आये दिन एक गोदाम खाली कर देती हैं। वह छपता भी है और बिकता भी है। इसे कोई न कोई लिखता भी है पर आदि से अन्त तक इस मुद्रण- प्रकाशन की समीक्षा की जाय, तो निराशा ही हाथ लगती है।
जिन व्यावहारिक जानकारियों की जन- साधारण को आवश्यकता है, क्या वे गम्भीरतापूर्वक सोची- समझी गई हैं और इन पर अपने पिछड़े देश की परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए कुछ ऐसा प्रस्तुतीकरण हुआ है, जिसे काम का कहा जा सके? अँग्रेजी किताबों के पन्ने उलट- पुलट कर उनका भाषान्तर होता रहता है और लोग अपने नामों से छापते रहते हैं। कम समय में अधिक पारिश्रमिक प्राप्त करने की दृष्टि से यही तरीका सरल भी पड़ता है। अब उन मनीषियों की पीढ़ी मिटती चली जा रही है, जो जन समस्याओं पर सामयिक, व्यावहारिक एवं तथ्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण अपना कर्तव्य समझते थे। अब वे कार्ल मार्क्स कहाँ हैं, जो सत्रह वर्ष की निरन्तर परिश्रम साधना कर एक ग्रन्थ लिखें। अब वे परिवार, पत्नी, बच्चे कहाँ हैं, जो पुराने कपड़ों को काटकर नये कपड़े बनायें और अपना पेट पालते हुए लेखक को अपनी तपस्या में लगा रहने दें।
दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का क्षेत्र सूना हो जाना अथवा उनका अपने स्तर से नीचे उतर आना, भटक जाना बहुत ही बुरी बात है। इस स्तर के ब्रह्मचेता लोग जब भटकते हैं और दिशा भ्रम देने वाला- हैरानी में धकेलने वाला कर्तृत्व रचते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया अत्यंत भयंकर होती है। पुराने जमाने में उन्हें ब्रह्मराक्षस कहा जाता था। अब वैसा कोई नया नामकरण हुआ है या नहीं, इसका पता नहीं, पर पीढ़ी निःसंदेह उन्हीं की बढ़ रही है।
[युगऋषि बहुधा यह कहते रहे हैं कि यह देश ब्रह्म -राक्षसों द्वारा सताया गया है। इसका अर्थ होता है, ऐसे व्यक्ति जो प्रत्यक्ष ब्राह्मण दिखते हैं, किन्तु उनके परोक्ष कार्य राक्षसों जैसे हैं। देव संस्कृति में ब्राह्मण जन्म जाति से नहीं गुण, कर्म के अनुसार माने जाते रहे हैं। ब्राह्मण का अर्थ होता है- ऐसा प्रतिभाशाली, आदर्शनिष्ठ व्यक्ति जिसने अपनी आवश्यकताएँ बहुत सीमित कर ली है तथा शेष पूरी सामर्थ्य लोकहित के लिए समर्पित कर दी है। लोगों को आध्यात्मिक जीवन की प्रेरणा देने, शिक्षा, चिकित्सा जैसे कार्य ब्राह्मणों के जिम्मे रहा करते थे। वे किसी कार्य को व्यवसाय नहीं बनाते थे, सेवा के बदले केवल सादगीपूर्ण निर्वाह भर लेते थे, इसलिए अपने महान दायित्व के साथ न्याय कर पाते थे।
कालान्तर में वह परम्परा विकृत हुई। सेवा कार्य व्यवसाय बुद्धि से किये जाने लगे। लोभ- मोह में पड़कर ब्राह्मण कर्मी जनहित को भूलकर शासकों, सम्पन्नवानों के संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति करने लगे। शोषण उत्पीड़न के माध्यम बनकर तो ब्राह्मण दिखने वाले प्रतिभा सम्पन्न राक्षसी कार्यों में भागीदार बनने लगें, तो उन्हें ब्रह्मराक्षस कहा जाने लगा।]
[जागरूक पाठकगण यह निष्कर्ष आसानी से निकाल सकते हैं कि ९० के दशक से इस दिशा में पर्याप्त प्रयास हुए हैं तथा इक्कीसवीं सदी प्रारंभ होने तक काफी कुछ सफल शोध प्रयोग हुए हैं। जन सामान्य ने उक्त शोध प्रयोगों का लाभ उठाना शुरू कर दिया है।]
शिकायतें कौन किसकी करे? पर गुंजाइश इस बात की पूरी- पूरी है कि देश को कुटीर उद्योग स्तर पर योजनाबद्ध ढंग से खड़ा किया जाय। यों चलने को तो यह सब कुछ अभी भी चल रहा है, पर उसे अपर्याप्त और असन्तोषजनक ही कहा जा सकता है। जापान जैसी लगन हमारे वैज्ञानिकों, निर्माताओं, उपभोक्ताओं की लगी होती, तो अपने देश के मनीषी ही इस क्षेत्र में चमत्कार करके दिखा सकते थे। पर बने कैसे? जबकि सबको अधिक कमाने की, हाथों- हाथ सुविधा समेटने की पड़ी है। प्रतिभाएँ विदेशों को- पूँजीवादी राष्ट्रों की ओर भागती चली जा रही हैं। कुटीर उद्योग जहाँ भी चल रहे हैं, घाटा दे रहे हैं। जिनने पैर बढ़ाया उनका जोश ठण्डा कर रहे हैं।
यही बात दार्शनिकों- मनीषियों के सम्बन्ध में भी है। समय जिस तेजी से बढ़ा है, उसी तेजी से समस्याएँ भी उपजी तथा उलझी हैं। वे सभी अपने समाधान चाहती हैं- बुद्धि संगत, व्यावहारिक और तथ्यों पर निर्धारित। ऐसे मार्गदर्शन का साहित्य लिखा गया होता, छपता और पाठकों तक उचित मूल्य में पहुँचता तो कैसा अच्छा होता? पर दिखता इस क्षेत्र में भी अँधेरा ही है।
पुस्तकों के नाम पर पहाड़ के बराबर हर दिन कागज काला होता है। पत्र- पत्रिकाएँ भी आये दिन एक गोदाम खाली कर देती हैं। वह छपता भी है और बिकता भी है। इसे कोई न कोई लिखता भी है पर आदि से अन्त तक इस मुद्रण- प्रकाशन की समीक्षा की जाय, तो निराशा ही हाथ लगती है।
जिन व्यावहारिक जानकारियों की जन- साधारण को आवश्यकता है, क्या वे गम्भीरतापूर्वक सोची- समझी गई हैं और इन पर अपने पिछड़े देश की परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए कुछ ऐसा प्रस्तुतीकरण हुआ है, जिसे काम का कहा जा सके? अँग्रेजी किताबों के पन्ने उलट- पुलट कर उनका भाषान्तर होता रहता है और लोग अपने नामों से छापते रहते हैं। कम समय में अधिक पारिश्रमिक प्राप्त करने की दृष्टि से यही तरीका सरल भी पड़ता है। अब उन मनीषियों की पीढ़ी मिटती चली जा रही है, जो जन समस्याओं पर सामयिक, व्यावहारिक एवं तथ्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण अपना कर्तव्य समझते थे। अब वे कार्ल मार्क्स कहाँ हैं, जो सत्रह वर्ष की निरन्तर परिश्रम साधना कर एक ग्रन्थ लिखें। अब वे परिवार, पत्नी, बच्चे कहाँ हैं, जो पुराने कपड़ों को काटकर नये कपड़े बनायें और अपना पेट पालते हुए लेखक को अपनी तपस्या में लगा रहने दें।
दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का क्षेत्र सूना हो जाना अथवा उनका अपने स्तर से नीचे उतर आना, भटक जाना बहुत ही बुरी बात है। इस स्तर के ब्रह्मचेता लोग जब भटकते हैं और दिशा भ्रम देने वाला- हैरानी में धकेलने वाला कर्तृत्व रचते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया अत्यंत भयंकर होती है। पुराने जमाने में उन्हें ब्रह्मराक्षस कहा जाता था। अब वैसा कोई नया नामकरण हुआ है या नहीं, इसका पता नहीं, पर पीढ़ी निःसंदेह उन्हीं की बढ़ रही है।
[युगऋषि बहुधा यह कहते रहे हैं कि यह देश ब्रह्म -राक्षसों द्वारा सताया गया है। इसका अर्थ होता है, ऐसे व्यक्ति जो प्रत्यक्ष ब्राह्मण दिखते हैं, किन्तु उनके परोक्ष कार्य राक्षसों जैसे हैं। देव संस्कृति में ब्राह्मण जन्म जाति से नहीं गुण, कर्म के अनुसार माने जाते रहे हैं। ब्राह्मण का अर्थ होता है- ऐसा प्रतिभाशाली, आदर्शनिष्ठ व्यक्ति जिसने अपनी आवश्यकताएँ बहुत सीमित कर ली है तथा शेष पूरी सामर्थ्य लोकहित के लिए समर्पित कर दी है। लोगों को आध्यात्मिक जीवन की प्रेरणा देने, शिक्षा, चिकित्सा जैसे कार्य ब्राह्मणों के जिम्मे रहा करते थे। वे किसी कार्य को व्यवसाय नहीं बनाते थे, सेवा के बदले केवल सादगीपूर्ण निर्वाह भर लेते थे, इसलिए अपने महान दायित्व के साथ न्याय कर पाते थे।
कालान्तर में वह परम्परा विकृत हुई। सेवा कार्य व्यवसाय बुद्धि से किये जाने लगे। लोभ- मोह में पड़कर ब्राह्मण कर्मी जनहित को भूलकर शासकों, सम्पन्नवानों के संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति करने लगे। शोषण उत्पीड़न के माध्यम बनकर तो ब्राह्मण दिखने वाले प्रतिभा सम्पन्न राक्षसी कार्यों में भागीदार बनने लगें, तो उन्हें ब्रह्मराक्षस कहा जाने लगा।]


