हमारी भावी भूमिका
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हमने अपने भावी जीवनक्रम के लिये जो महत्त्वपूर्ण निर्धारण किये हैं,उनमें सर्वोपरि है लोक- चिन्तन को सही दिशा देने हेतु एक ऐसा विचार प्रवाह खड़ा करना, जो किसी भी स्थिति में अवांछनीयताओं को टिकने ही न दे। आज जन समुदाय के मन- मस्तिष्क में जो दुर्मति घुस पड़ी है, उसी की परिणति ऐसी परिस्थितियों के रूप में नजर आती है, जिन्हें जटिल, भयावह समझा जा रहा है। ऐसे वातावरण को बदलने के लिये व्यास की तरह, बुद्ध, गाँधी, कार्लमार्क्स की तरह, मार्टिन लूथर, अरविन्द, महर्षि रमण की तरह भूमिका निभाने वाले मुनि व ऋषि के युग्म की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों द्वारा विचार क्रान्ति का प्रयोजन पूरा कर सकें। यह पुरुषार्थ अंतःक्षेत्र की प्रचण्ड तप साधना द्वारा ही सम्भव हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष रूप युग मनीषा का हो सकता है, जो अपनी लेखनी की शक्ति द्वारा उस उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके, जिसे युगान्तरकारी कहा जा सकता है। अखण्ड ज्योति के माध्यम से जो संकल्प हमने आज से सैंतालीस वर्ष पूर्व लिया था, उसे अनवरत निभाते रहने का हमारा नैतिक दायित्व है।
युगऋषि की भूमिका अपने परोक्ष रूप में निभाते हुए उन अनुसंधानों की पृष्ठभूमि बनाने का हमारा मन था, जो वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रत्यक्ष रूप इस तर्क, तथ्य, प्रमाणों को आधार मानने वाले समुदाय के समक्ष रख सकें। आज चल रहे वैज्ञानिक अनुसंधान यदि उनसे कुछ दिशा लेकर सही मार्ग पर चल सकें, तो हमारा प्रयास सफल माना जायेगा।
आत्मानुसंधान के लिये अन्वेषण कार्य किस प्रकार चलना चाहिए? साधना, उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनः शक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन कर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है? गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्ति को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति सम्पन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है? ज्योतिर्विज्ञान के चिर पुरातन प्रयोगों के माध्यम से आज के परिप्रेक्ष्य में मानव समुदाय को कैसे लाभान्वित किया जा सकता है? ऐसे अनेकानेक पक्षों को हमने अथर्ववेदीय ऋषि परम्परा के अंतर्गत अपने शोध प्रयासों के अभिनव रूप में प्रस्तुत कर दिया है।
[युगऋषि ने अध्यात्म विज्ञान की विभिन्न धाराओं को पदार्थ विज्ञान के माध्यम से समझाने, सिद्ध करने की एक बड़ी चुनौती स्वीकार करते हुए उक्त विषयों पर शोध के लिए ‘ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान को स्थापना प्रत्यक्ष रूप में सन् १९७९ में कर दी थी। लेकिन वे सूक्ष्मीकरण प्रयोग के इस कार्य को भी विविध धाराओं, में परोक्ष रूप से विकसित करने की व्यवस्था बनाते हैं। अगले पैराग्राफ में वे अपने इसी मन्तव्य को स्पष्ट करते हैं। सामयिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि उसके बाद विश्व मनीषा में आध्यात्मिक अभिरुचि तेजी से बढ़ी है और विभिन्न भूभागों में अनेक ढंग से जीवन में आध्यात्मिक सूत्रों को स्थान देने के प्रयास चल पड़े हैं।]
हमने उनका शुभारम्भ कर बुद्धिजीवी समुदाय को एक दिशा दी है, आधार खड़ा किया है। परोक्ष रूप में हम उसे सतत पोषण देते रहेंगे। सारे वैज्ञानिक समुदाय का चिन्तन इस दिशा में चल पड़े, आत्मिकी के अनुसंधान में अपनी प्रज्ञा नियोजित कर वे स्वयं को धन्य बना सकें, ऐसा हमारा प्रयास रहेगा। सारी मानव जाति को अपनी मनीषा के द्वारा एवं शोध- अनुसंधान के निष्कर्षों के माध्यम से लाभान्वित करने का हमारा संकल्प सूक्ष्मीकरण तपश्चर्या की स्थिति में और भी प्रखर रूप लेगा, इसे आने वाला समय बतायेगा।
युगऋषि की भूमिका अपने परोक्ष रूप में निभाते हुए उन अनुसंधानों की पृष्ठभूमि बनाने का हमारा मन था, जो वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रत्यक्ष रूप इस तर्क, तथ्य, प्रमाणों को आधार मानने वाले समुदाय के समक्ष रख सकें। आज चल रहे वैज्ञानिक अनुसंधान यदि उनसे कुछ दिशा लेकर सही मार्ग पर चल सकें, तो हमारा प्रयास सफल माना जायेगा।
आत्मानुसंधान के लिये अन्वेषण कार्य किस प्रकार चलना चाहिए? साधना, उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनः शक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन कर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है? गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्ति को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति सम्पन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है? ज्योतिर्विज्ञान के चिर पुरातन प्रयोगों के माध्यम से आज के परिप्रेक्ष्य में मानव समुदाय को कैसे लाभान्वित किया जा सकता है? ऐसे अनेकानेक पक्षों को हमने अथर्ववेदीय ऋषि परम्परा के अंतर्गत अपने शोध प्रयासों के अभिनव रूप में प्रस्तुत कर दिया है।
[युगऋषि ने अध्यात्म विज्ञान की विभिन्न धाराओं को पदार्थ विज्ञान के माध्यम से समझाने, सिद्ध करने की एक बड़ी चुनौती स्वीकार करते हुए उक्त विषयों पर शोध के लिए ‘ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान को स्थापना प्रत्यक्ष रूप में सन् १९७९ में कर दी थी। लेकिन वे सूक्ष्मीकरण प्रयोग के इस कार्य को भी विविध धाराओं, में परोक्ष रूप से विकसित करने की व्यवस्था बनाते हैं। अगले पैराग्राफ में वे अपने इसी मन्तव्य को स्पष्ट करते हैं। सामयिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि उसके बाद विश्व मनीषा में आध्यात्मिक अभिरुचि तेजी से बढ़ी है और विभिन्न भूभागों में अनेक ढंग से जीवन में आध्यात्मिक सूत्रों को स्थान देने के प्रयास चल पड़े हैं।]
हमने उनका शुभारम्भ कर बुद्धिजीवी समुदाय को एक दिशा दी है, आधार खड़ा किया है। परोक्ष रूप में हम उसे सतत पोषण देते रहेंगे। सारे वैज्ञानिक समुदाय का चिन्तन इस दिशा में चल पड़े, आत्मिकी के अनुसंधान में अपनी प्रज्ञा नियोजित कर वे स्वयं को धन्य बना सकें, ऐसा हमारा प्रयास रहेगा। सारी मानव जाति को अपनी मनीषा के द्वारा एवं शोध- अनुसंधान के निष्कर्षों के माध्यम से लाभान्वित करने का हमारा संकल्प सूक्ष्मीकरण तपश्चर्या की स्थिति में और भी प्रखर रूप लेगा, इसे आने वाला समय बतायेगा।


