हमारी वसीयत और विरासत (भाग 90): शान्तिकुञ्ज में गायत्री तीर्थ की स्थापना
मथुरा से प्रयाण के बाद हिमालय से 6 माह बाद ही हम हरिद्वार उस स्थान पर लौट आए, जहाँ निर्धारित स्थान पर शान्तिकुञ्ज के एक छोटे-से भवन में माताजी व उनके साथ रहने वाली कन्याओं के रहने योग्य निर्माण हम पूर्व में करा चुके थे। अब और जमीन लेने के उपरांत पुनः निर्माण कार्य आरंभ किया। इच्छा ऋषि आश्रम बनाने की थी। सर्वप्रथम अपने लिए, सहकर्मियों के लिए, अतिथियों के लिए निवासस्थान और भोजनालय बनाया गया है।
यह आश्रम ऋषियों का— देवात्मा हिमालय का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए उत्तराखंड का— गंगा का प्रतीक देवालय यहाँ बनाया गया। इसके अतिरिक्त सात प्रमुख तथा अन्यान्य वरिष्ठ ऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना का प्रबंध किया गया। आद्यशक्ति गायत्री का मंदिर तथा जलकूपों का निर्माण कराया गया; प्रवचन कक्ष का भी। इस निर्माण में प्रायः दो वर्ष लग गए। अब निवास के योग्य आवश्यक व्यवस्था हो गई, तब हम और माताजी ने नवनिर्मित शान्तिकुञ्ज को अपनी तपःस्थली बनाया। साथ में अखंड दीपक भी था। उसके लिए एक कोठरी और गायत्री प्रतिमा की स्थापना करने के लिए सुविधा पहले ही बन चुकी थी।
इस बंजर पड़ी भूमि के प्रसुप्त पड़े संस्कारों को जगाने के लिए 24 लक्ष के 24 अखंड पुरश्चरण कराए जाने थे। इसके लिए 9 कुमारियों का प्रबंध किया। प्रारंभ में चार घंटे दिन में, चार घंटे रात्रि में इनकी ड्यूटी थी। बाद में इनकी संख्या 27 हो गई। तब समय कम कर दिया गया। इन्हें दिन में माताजी पढ़ाती थीं। छह वर्ष उपरांत इन सबकी ग्रेजुएट-पोस्टग्रेजुएट स्तर की पढ़ाई आरंभ कर दी। बीस और पच्चीस वर्ष की आयु के मध्य इन सबके सुयोग्य घरों और वरों के साथ विवाह कर दिए गए।
इसके पूर्व संगीत और प्रवचन का अतिरिक्त प्रशिक्षणक्रम भी चलाया गया। देशव्यापी नारी जागरण के लिए इन्हें मोटर गाड़ियों में पाँच-पाँच के जत्थे बनाकर भेजा गया। तब तक पढ़ने वाली कन्याओं की संख्या 100 से ऊपर हो गई थी। इनके दौरे का देश के नारी समाज पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा।
हरिद्वार से ही तेजस्वी कार्यकर्त्ताओं को ढालने का कार्य हाथ में लिया गया। इसके लिए प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र, एक-एक मास के युगशिल्पी सत्र एवं वानप्रस्थ सत्र भी लगाए गए। सामान्य उपासकों के लिए छोटे-बड़े गायत्री पुरश्चरणों की शृंखला भी चल पड़ी। गंगा का तट, हिमालय की छाया, दिव्य वातावरण, प्राणवान मार्गदर्शन जैसी सुविधाओं को देखकर पुरश्चरणकर्त्ता भी सैकड़ों की संख्या में निरंतर आने लगे। पूरा समय देने वाले वानप्रस्थों का प्रशिक्षण भी अलग से चलता रहा। दोनों प्रकार के साधकों के लिए भोजन का प्रबंध किया गया।
यह नई संख्या निरंतर बढ़ती जाने लगी। ऋषिपरंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए इसकी आवश्यकता भी थी कि सुयोग्य आत्मदानी पूरा समय देकर हाथ में लिए हुए महान कार्य की पूर्ति के लिए आवश्यक आत्मबल संग्रह करें और उसके उपरांत व्यापक कार्यक्रम में जुट पड़ें।
बढ़ते हुए कार्य को देखकर गायत्री नगर में 240 क्वार्टर बनाने पड़े। एक हजार व्यक्तियों के प्रवचन में सम्मिलित हो सकने जितने बड़े आकार का प्रवचन हाल बनाना पड़ा। इस भूमि को अधिक संस्कारवान बनाना था। इसलिए नौ कुंड की यज्ञशाला में प्रातःकाल दो घंटे यज्ञ किए जाने की व्यवस्था की और आश्रम में स्थायी निवासियों तथा पुरश्चरणकर्त्ताओं का औसत जप इस अनुपात से निर्धारित किया गया कि हर दिन 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरण संपन्न होता रहे। आवश्यक कार्यों के लिए एक छोटा प्रेस भी लगाना पड़ा। इन सब कार्यों के लिए निर्माण कार्य अब तक एक प्रकार से बराबर ही चलता रहा। इसी बीच ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के लिए भव्य भवन बनाना आरंभ कर दिया था। इस सारे निर्माण में प्रायः चार वर्ष लग गए। इसी बीच वे कार्य आरंभ कर दिए गए, जिन्हें संपन्न करने से ऋषिपरंपरा का पुनर्जीवन हो सकता था। जैसे-जैसे सुविधा बनती गई, वैसे-वैसे नए कार्य हाथ में लिए गए और कहने योग्य प्रगति स्तर तक पहुँचाए गए।
भगवान बुद्ध ने नालंदा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय स्तर के विहार बनाए थे और उनमें प्रशिक्षित करके कार्यकर्त्ता देश के कोने-कोने में तथा विदेशों में भेजे गए थे। धर्मचक्र-प्रवर्तन की योजना तभी पूरी हो सकी थी।
भगवान आद्य शंकराचार्य ने देश के चार कोनों पर चार धाम बनाए थे और उनके माध्यम से देश में फैले हुए अनेक मत-मतांतरों को एक सूत्र में पिरोया था। दोनों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में एक कुंभ स्तर के बड़े सम्मेलन-समारोहों की व्यवस्था की थी, ताकि जो ऋषियों के मुख्य-मुख्य संदेश हों, वे आगंतुकों द्वारा घर-घर पहुँचाए जा सकें।
इन दोनों के ही क्रियाकलापों को हाथ में लिया गया। निश्चय किया गया कि गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञा-संस्थानों के नाम से देश के कोने-कोने में भव्य देवालय एवं कार्यालय बनाए जाएँ, जहाँ केंद्र बनाकर समीपवर्ती क्षेत्रों में वे काम किए जा सकें, जिनको प्रज्ञा मिशन का प्रण-संकल्प कहा जा सके।
बात असंभव लगती थी, किंतु प्राणवान परिजनों को शक्तिपीठ निर्माण के संकल्प दिए गए, तो 2400 भवन दो वर्ष के भीतर बन गए। उस क्षेत्र के कार्यकर्त्ता उसे केंद्र मानकर युगचेतना का आलोक वितरण करने और घर-घर अलख जगाने के काम में जुट पड़े। यह एक इतना बड़ा और इतना अद्भुत कार्य है, जिसकी तुलना में ईसाई मिशनरियों के द्वारा किए गए निर्माण कार्य भी फीके पड़ जाते हैं। हमारे निर्माणों में जन-जन का अल्पांश लगता है। अतः वह सबको अपना लगता है, जबकि चर्च, अन्यान्य बड़े मंदिर बड़ी धनराशियों से बनाए जाते हैं।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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