हमारी वसीयत और विरासत (भाग 133): इन दिनों हम यह करने में जुट रहे हैं
हमारी जिज्ञासाओं एवं उत्सुकताओं का समाधान गुरुदेव प्रायः हमारे अंतराल में बैठकर ही किया करते हैं। उनकी आत्मा हमें अपने समीप ही दृष्टिगोचर होती रहती है। आर्षग्रंथों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा पुराण की संरचना तक जिस प्रकार लेखन प्रयोजन में उनका मार्गदर्शन अध्यापक और विद्यार्थी जैसा रहा है, हमारी वाणी भी उन्हीं की सिखावन को दुहराती रही है। घोड़ा जिस प्रकार सवार के संकेतों पर दिशा और चाल बदलता रहता है, वही प्रक्रिया हमारे साथ भी कार्यान्वित होती रही है।
बैटरी चार्ज करने के लिए जब हिमालय बुलाते हैं, तब भी वे कुछ विशेष कहते नहीं। सेनिटोरियम में जिस प्रकार किसी दुर्बल का स्वास्थ्य सुधर जाता है, वही उपलब्धियाँ हमें हिमालय जाने पर हस्तगत होती हैं। वार्त्तालाप का प्रयोग अनेक प्रसंगों में होता रहता है।
इस बार सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया और साधना-विधि तो ठीक तरह समझ में आ गई और जिस प्रकार कुंती ने अपने शरीर में से देव संतानें जन्मीं थीं, ठीक उसी प्रकार अपनी काया में विद्यमान पाँच कोशों, अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमयकोशों को पाँच वीरभद्रों के रूप में विकसित करना पड़ेगा, इसकी साधना-विधि भी समझ में आ गई। जब तक वे पाँचों पूर्ण समर्थ न हो जाएँ, तब तक वर्तमान स्थूलशरीर को उनके घोंसले की तरह बनाए रहने का भी आदेश है और अपनी दृश्य स्थूल जिम्मेदारियाँ दूसरों को हस्तांतरित करने की दृष्टि से अभी शान्तिकुञ्ज ही रहने का निर्देश है।
यह सब स्पष्ट हो गया। सावित्री-साधना का विधान भी उनका निर्देश मिलते ही इस निमित्त आरंभ कर दिया।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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