हमारी वसीयत और विरासत (भाग 132): स्थूल का सूक्ष्मशरीर में परिवर्तन— सूक्ष्मीकरण
यह सूक्ष्मशरीरों की— सूक्ष्मलोक की सामान्य चर्चा हुई। प्रसंग अपने आपे का है। यह विषम वेला है। इसमें प्रत्यक्ष शरीर वाले प्रत्यक्ष उपाय-उपचारों से जो कर सकते हैं, सो तो कर ही रहे हैं; करना भी चाहिए, पर दीखता है कि उतने भर से काम चलेगा नहीं। सशक्त सूक्ष्मशरीरों को बिगड़ों को अधिक न बिगड़ने देने के लिए अपना जोर लगाना पड़ेगा। सँभालने के लिए जो प्रक्रिया चल रही है, वह पर्याप्त न होगी। उसे और भी अधिक सरल-सफल बनाने के लिए अदृश्य सहायता की आवश्यकता पड़ेगी। यह सामूहिक समस्याओं के लिए भी आवश्यक होगा और व्यक्तिगत रूप से सत्प्रयोजनों में संलग्न व्यक्तित्वों को अग्रगामी-यशस्वी बनाने की दृष्टि से भी।
जब हमें यह काम सौंपा गया, तो उसे करने में आनाकानी कैसी? दिव्यसत्ता के संकेतों पर चिरकाल से चलते चले आ रहे हैं और जब तक आत्मबोध जाग्रत रहेगा, तब तक यही स्थिति बनी रहेगी। यही गतिविधि चलेगी। यह विषम वेला है। इन दिनों दृश्य और अदृश्य क्षेत्र में जो विषाक्तता भरी हुई है, उसके परिशोधन का प्रयास करना अविलंब हो गया है, तो संजीवनी बूटी लाने के लिए पर्वत उखाड़ लाने और सुषैण वैद्य की खोज में जाने के लिए जो भी करना पड़े, करना चाहिए। यह कार्य स्थूलशरीर को प्रसुप्त से जाग्रत स्थिति में लाने के लिए हमें अविलंब जुटना पड़ा और विगत दो वर्षों में कठोर तपश्चर्या का— एकांत-साधना का अवलंबन लेना पड़ा।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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