हमारी वसीयत और विरासत (भाग 96): बोओ एवं काटो’ का मंत्र, जो हमने जीवन भर अपनाया
इस विराट को ही हमने अपना भगवान माना। अर्जुन के दिव्य चक्षु ने इसी विराट के दर्शन किए थे। यशोदा ने कृष्ण के मुँह में स्रष्टा का यही स्वरूप देखा था। राम ने पालने में पड़े-पड़े माता कौशल्या को अपना यही रूप दिखाया था और काकभुशुंडि इसी स्वरूप की झाँकी करके धन्य हुए थे।
हमने भी अपने पास जो कुछ था, उसी विराट ब्रह्म को— विश्वमानव को सौंप दिया। बोने के लिए इससे उर्वर खेत दूसरा कोई हो नहीं सकता था। वह समयानुसार फला-फूला। हमारे कोठे भर दिए गए। सौंपे गए दो कामों के लिए जितने साधनों की जरूरत थी, वे सभी उसी में जुट गए।
शरीर जन्मजात दुर्बल था। शारीरिक बनावट की दृष्टि से उसे दुर्बल कह सकते हैं। जीवनीशक्ति तो प्रचंड थी ही। जवानी में बिना शाक, घी, दूध के 24 वर्ष तक जौ की रोटी और छाछ लेते रहने से वह और कृश हो गया था। पर जब बोने-काटने की विधा अपनाई, तो पचहत्तर वर्ष की इस उम्र में वह इतना सुदृढ़ है कि कुछ ही दिन पूर्व उसने एक बिगड़ैल साँड़ को कंधे का सहारा देकर चित्त पटक दिया और उससे भागते ही बना।
सर्वविदित ही है कि अनीति एवं आतंक के पक्षधर एक किराए के हत्यारे ने एक वर्ष पूर्व पाँच बोर की रिवाल्वर से लगातार हम पर फायर किए और उसकी सभी गोलियाँ नलियों में उलझी रह गईं। रिवाल्वर उससे भय के मारे वहीं गिर गई। अब की बार वह छुरेबाजी पर उतर आया। छुरे चलते रहे। खून बहता रहा, पर भोंके गए सारे प्रहार शरीर में सीधे न घुसकर तिरछे फिसलकर निकल गए। डॉक्टरों ने जख्म सी दिए और कुछ ही सप्ताह में शरीर ज्यों-का-त्यों हो गया।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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