हमारी वसीयत और विरासत (भाग 139): मनीषी के रूप में हमारी प्रत्यक्ष भूमिका
हमने अपने भावी जीवनक्रम के लिए जो महत्त्वपूर्ण निर्धारण किए हैं, उनमें सर्वोपरि है— लोक-चिंतन को सही दिशा देने हेतु एक ऐसा विचार-प्रवाह खड़ा करना, जो किसी भी स्थिति में अवांछनीयताओं को टिकने ही न दे। आज जनसमुदाय के मन-मस्तिष्क में जो दुर्मति घुस पड़ी है, उसी की परिणति ऐसी परिस्थितियों के रूप में नजर आती है, जिन्हें जटिल, भयावह समझा जा रहा है। ऐसे वातावरण को बदलने के लिए व्यास की तरह— बुद्ध, गांधी, कार्ल मार्क्स की तरह— मार्टिन लूथर किंग, अरविंद, महर्षि रमण की तरह— भूमिका निभाने वाले मुनि व ऋषि के युग्म की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों द्वारा विचार-क्रांति का प्रयोजन पूरा कर सके। यह पुरुषार्थ अंतःक्षेत्र की प्रचंड तप-साधना द्वारा ही संभव हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष रूप युगमनीषा का हो सकता है, जो अपनी शक्ति द्वारा उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके, जिसे युगांतरकारी कहा जा सकता है। अखण्ड ज्योति के माध्यम से जो संकल्प हमने आज से सैंतालीस वर्ष पूर्व लिया था, उसे अनवरत निभाते रहने का हमारा नैतिक दायित्व है।
युगऋषि की भूमिका अपने परोक्ष रूप में निभाते हुए उन अनुसंधानों की पृष्ठभूमि बनाने का हमारा मन था, जो वैज्ञानिक अध्यात्म का प्रत्यक्ष रूप इस तर्क, तथ्य, प्रमाणों को आधार मानने वाले समुदाय के समक्ष रख सकें। आज चल रहे वैज्ञानिक अनुसंधान यदि उनसे कुछ दिशा लेकर सही मार्ग पर चल सके तो हमारा प्रयास सफल माना जाएगा। आत्मानुसंधान के लिए अन्वेषण कार्य किस प्रकार चलना चाहिए? साधना-उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनःशक्तियों के विकास में साधना-उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवनकर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है? गायत्री की शब्दशक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनीशक्ति संपन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है? ज्योतिर्विज्ञान के चिरपुरातन प्रयोगों के माध्यम से आज के परिप्रेक्ष्य में मानव समुदाय को कैसे लाभान्वित किया जा सकता है? ऐसे अनेकानेक पक्षों को हमने अथर्ववेदीय ऋषिपरंपरा के अंतर्गत अपने शोध प्रयासों में अभिनव रूप में प्रस्तुत कर दिए हैं। हमने उनका शुभारंभकर बुद्धिजीवी समुदाय को एक दिशा दी है; आधार खड़ा किया है। परोक्ष रूप में हम उसे सतत पोषण देते रहेंगे। सारे वैज्ञानिक समुदाय का चिंतन इस दिशा में चल पड़े; आत्मिकी के अनुसंधान में अपनी प्रज्ञा नियोजितकर वे स्वयं को धन्य बना सकें, ऐसा हमारा प्रयास रहेगा। सारी मानव जाति को अपनी मनीषा के द्वारा एवं शोध-अनुसंधान के निष्कर्षों के माध्यम से लाभान्वित करने का हमारा संकल्प सूक्ष्मीकरण तपश्चर्या की स्थिति में और भी प्रखर रूप ले रहा है। इसकी परिणतियाँ आने वाला समय बताएगा।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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