धर्म और विज्ञान के समन्वय में ही कल्याण है
नर और नारी का कार्यक्षेत्र भिन्न है। नारी गृह-व्यवस्था में संलग्न रहती है। गर्भधारण और शिशुपालन यह दोनों काम उसी को करने होते हैं। नर का कार्यक्षेत्र भिन्न है। वह खेत, दफ्तर, कारखाने आदि में काम करता है और उस उपार्जन से गृह-व्यवस्था के लिए नारी की आवश्यकताएँ पूरी करता है। देखने में दोनों के बीच भारी भिन्नता दिखाई पड़ती है। शरीर की रचना की दृष्टि से भी कई अवयवों में प्रतिकूल दीखने वाला भारी अंतर भी रहता है। सहज स्वभाव में भी थोड़ा, किंतु महत्त्वपूर्ण अंतर रहता है। इतने पर भी वे दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। दोनों के सम्मिलित प्रयत्न से ही गृहस्थ की गाड़ी इन दो पहियों के सघन सहयोग से ही गतिशील रहती और आगे बढ़ती है।
जागृति और सुषुप्ति का अंतर स्पष्ट है। जागते समय मनुष्य सक्रिय रहता है और सोते समय वह निष्क्रिय बन जाता है। देखने वाले इसे परस्पर विरोधी स्थिति ही कहेंगे। इतने पर भी शरीरशास्त्री यही कहेंगे कि दोनों स्थितियाँ एकदूसरे के पूरक हैं। जागृति की थकान ही निद्रा लाती है और निद्रा का विश्राम ही जागृति के समय श्रम करने की क्षमता प्रदान करता है।
सरदी और गरमी परस्पर विपरीत हैं, पर दोनों के तालमेल से ही इस धरती का ऋतु-संतुलन बना हुआ है। यदि इनमें से एक का ही अस्तित्व रहे, दूसरे को हटा दिया जाए, तो जीवन को स्थिर एवं विकसित बनाने की संभावना ही समाप्त हो जाएगी और यह धरती प्राणियों के रहने योग्य ही नहीं रह जाएगी। विपरीत के बीच एकता का यह विलक्षण तालमेल है।
पदार्थ और प्राण की जोड़ी भी इसी प्रकार है। प्रकृति और पुरुष के संयोग को अर्द्ध नारी-नरेश्वर की समता दी गई है। दोनों के सम्मिलन से ही अपना यह संसार चल रहा है। यदि मात्र पदार्थ ही रह जाए और कोई जीवधारी उसका अनुभव-उपयोग करने के लिए शेष न रहे तो फिर उसका महत्त्व ही न रह जाएगा। अस्तित्व की दृष्टि से तो प्रकृति के अंतराल में अभी भी असंख्य शक्तियाँ छिपी पड़ी हैं, पर उनका पूरा परिचय अपने को न होने के कारण स्थिति लगभग वैसी ही है, मानो उनका कोई अस्तित्व ही न हो। यदि प्राणी न हो तो ब्रह्मांड में पदार्थ असीम भरा होने पर भी वह अपने आप में ही खोया रहेगा। अभी भी असंख्य निहारिकाएँ और ग्रह-नक्षत्र ऐसे ही हैं, जिनकी स्थिति और क्षमता परिपूर्ण होते हुए भी अपने लिए वे न होने के बराबर ही हैं।
यदि पदार्थ न हो तो प्राणी के अस्तित्व भी प्रभावी न हो सकेंगे। अदृश्य आत्माओं का परिचय भी तभी मिलता है, जब किसी-न-किसी प्रकार वे स्थूल या सूक्ष्म पदार्थ के साथ संबद्ध होकर अपना अस्तित्व प्रकट कर सकने की स्थिति में होती हैं। ऐसा न होने पर आत्मा या परमात्मा तक की स्थिति का ज्ञान न हो सकेगा। आत्मा का अस्तित्व तभी प्रकाश में आता है, जब वह किसी-न-किसी प्रकार पदार्थ के साथ संयुक्त रहती है। परमात्मा के ही स्थूल या सूक्ष्मरूप में इंद्रियगम्य बनने पर ही उसका आभास मिलता है, अन्यथा निर्विकार ब्रह्म के संबंध में तो कल्पना करना तक नहीं बन पड़ता। पदार्थ के साथ जुड़ा न होने के कारण ही विज्ञान उसके अस्तित्व से इनकार करता है।
कथन का तात्पर्य इतना ही है कि जड़ और चेतन के संयोग से प्राणी और पदार्थ की संयुक्त सत्ता के रूप में यह संसार का अस्तित्व दृष्टिगोचर हो रहा है। दोनों का संयोग बिछुड़ जाए, तो फिर न तो पदार्थ के लिए प्राणी का और न प्राणी के लिए पदार्थ का अस्तित्व-उपयोग शेष रह जाएगा। मन और बुद्धि का कार्यक्षेत्र यह पदार्थों से बना संसार ही है। वे इसी परिधि में परिभ्रमण करते हैं। इंद्रियजन्य अनुभूतियाँ, मानसिक कल्पनाएँ, बौद्धिक विचारणाएँ अंतःकरण की भाव-संवेदनाएँ अपनी क्षमता तभी प्रकट कर सकती हैं, जब शरीर अथवा पदार्थों के साथ उनका संबंध-समन्वय बने। इसके बिना चिंतन का सारा ढाँचा ही निष्क्रिय बन जाएगा।
अन्योन्याश्रित युग्मों में एक क्षेत्र ज्ञान और विज्ञान के समन्वय का भी है। भौतिक विज्ञान में बुद्धि और पदार्थ का संयोग काम करता है। आत्मिक विज्ञान में बुद्धि का वह परिष्कृत स्तर काम करता है, जिसे धर्मधारणा एवं ऋतंभरा प्रज्ञा कहते हैं। ब्रह्मविद्या के विशालकाय तत्त्व दर्शन में उसी की चर्चा है। स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों में परस्पर सघन तालमेल होने की आवश्यकता है। एकाकी रह जाने पर तो दोनों ही अपूर्ण-अपंग बन जाते हैं। ऐसी स्थिति को पूरी तरह नासमझी ही कहा जाएगा। इससे आगे बढ़कर वे दोनों यदि परस्पर लड़ने-झगड़ने लगें; एकदूसरे के अस्तित्व को चुनौती देने लगें; अप्रामाणिक और अनावश्यक ठहराने लगें, तब तो समझना चाहिए दुःखद दुर्भाग्य ही हमारे चिंतन-क्षेत्र पर ग्रहण की तरह लग गया है। अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह ही इस विवाद को भी एक दुर्घटना ही कहा जाएगा।
धर्म और विज्ञान को एकदूसरे पर गुर्राने की आवश्यकता नहीं है। यह तो दर्पण में अपनी ही छाया पर आक्रमण करने की तरह ही मूर्खतापूर्ण होगा। स्मरण रखे जाने योग्य तथ्य यह है कि न तो विज्ञान के बिना धर्म का अस्तित्व रह जाता है और न धर्मरहित विज्ञान व्यक्ति एवं समाज के लिए किसी प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकता है। आस्थारहित उपलब्धियाँ क्षणिक सुख-साधन भले ही दे सकें, उनका अनैतिक उपयोग अंततः सबके लिए, सब प्रकार भयंकर अभिशाप की तरह संकट ही उत्पन्न करता चला जाएगा। इसी प्रकार धर्म को यदि उपयोगिता, व्यावहारिकता और यथार्थता की वैज्ञानिक कसौटियों पर न कसा-परखा गया तो वह कल्पना की निरर्थक उड़ानों और अंधविश्वासों की कँटीली झाड़ियों में ही भटकता रहेगा। उससे निहित स्वार्थों का पोषण— व्यवसाय भर चलता रहेगा। धूर्त ठगते रहेंगे और मूर्ख ठगाते रहेंगे, तब धर्म की स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी, जैसी आज है। तब उसे उपहासास्पद, उपेक्षित और तिरस्कृत स्थिति में पड़े रहने से उबार सकना इस बुद्धिवादी युग में किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा। युग की माँग है कि धर्म और विज्ञान के बीच सघन सहयोग होना चाहिए। दोनों को एकदूसरे का पूरक बनकर, अंधे और पंगे के सहयोग से नदी पार कर लेने की तरह समझदारी का परिचय देना चाहिए। असहयोग एवं विरोध की स्थिति बनी रहने पर तो दोनों की हानि-ही-हानि है। उनका विग्रह समस्त संसार की प्रगति और संस्कृति में भारी व्यवधान उत्पन्न करेगा।
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, धर्म और विज्ञान के समन्वय में ही कल्याण है, पेज नं. 60-63
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