धर्म और विज्ञान को मिलकर चलना होगा
धर्म को पूजा-प्रक्रिया तक और विज्ञान को शिल्प व्यवसाय तक सीमित रखा जाए, तो दोनों की गरिमा बढ़ेगी नहीं, गिरेगी ही। दोनों अपंग-अधूरे रह जाएँगे। इन दोनों का परस्पर पूरक होकर रहना उचित ही नहीं, आवश्यक है। पदार्थ में सौंदर्य निखारने का यही तरीका है। कारीगर कलाकार तब बनता है, जब अपने क्रियाकलाप में भावपूर्ण मनोयोग को नियोजित करता है। भावपूर्ण मनोयोग तब कल्पना मात्र बनकर रह जाएगा, जब उसमें श्रेष्ठ निष्ठा जुड़ी न होगी। इसी प्रकार मात्र श्रम की कोल्हू के बैल से— भारवाही गधे से तुलना की जाती रहेगी। दोनों का समन्वय ही कर्मकौशल बनकर सामने आता है।
समग्र ज्ञान को दो भागों में बाँटा जा सकता है— एक अंतर्बोध पर आधारित अध्यात्म अथवा धर्म। दूसरा तर्क, परीक्षण, अनुभव तथा बताए गए तथ्यों के आधार पर भौतिक जगत संबंधी निष्कर्ष। इनमें एक प्रथम को विद्या, दूसरे को शिक्षा कहा जा सकता है। प्रथम जानकारी को प्रज्ञा, दूसरी को बुद्धि कहते हैं। और भी स्पष्ट करें, तो एक को ज्ञान दूसरे को विज्ञान। एक को धर्म और दूसरे को कर्म कहने से ही वस्तुस्थिति समझी जा सकती है। भ्रमवश यह समझा जाता रहा कि इन दोनों का स्वरूप तथा कार्यक्षेत्र पृथक्-पृथक् हैं। पर सही बात यह है कि दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। यदि उन्हें असंबद्ध होने दिया जाए तो स्थिति बहुत ही विद्रूप हो जाएगी।
धर्म का लक्ष्य है— अंतरात्मा में सन्निहित सत्प्रवृत्तियों का मनोविज्ञानसम्मत-पद्धति से इतना समुन्नत करना कि वे व्यावहारिक जीवन में ओत-प्रोत हो सकें। विज्ञान का लक्ष्य है कि प्रकृतिगत शक्तियों तथा पदार्थों के स्वरूप तथा क्रियाकलाप की इतनी जानकारी देना कि उनका समुचित लाभ मानवी सुख-सुविधाओं की अभिवृद्धि के लिए किया जा सके। दोनों का कार्यक्षेत्र प्रत्यक्षतः अलग है, जिसमें एकदूसरे को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। फिर भी वे दोनों एकदूसरे के पूरक हैं; क्योंकि जीवन आत्मिक एवं भौतिक दोनों प्रकार के तत्त्वों से मिलकर बना है। जड़-चेतन के समन्वय से ही जीवन का स्वरूप प्रत्यक्ष होता है। इतने पर भी यह अंतर रखना ही पड़ेगा कि हृदय और मस्तिष्क की तरह दोनों का कार्यक्षेत्र विभक्त हो। एक का कार्य दूसरे पर थोपने की गलती न की जाए। भौतिक तथ्यों की जानकारी में पदार्थ विज्ञान को प्रामाणिक माना जाए और आत्मिक आंतरिक चिंतन एवं भावनात्मक प्रसंग में श्रद्धा की आत्मानुभूति को मान्यता दी जाए।
लंदन विश्वविद्यालय के ऐस्ट्रोफिजीसिस्ट प्रो० हर्बर्ट डिग्ले का कथन है— “विज्ञान की एक सीमित परिधि है। पदार्थ के स्वरूप एवं प्रयोग का विश्लेषण करना उसका काम है। पदार्थ किसने बनाया? किस प्रकार बना? क्यों बना? इसका उत्तर दे सकना वर्तमान में संभव नहीं। इसके लिए विज्ञान की बहुत ऊँची एवं बहुत अद्भुत कक्षा में प्रवेश करना पड़ेगा। वह कक्षा लगभग उसी स्तर की होगी, जैसी कि अध्यात्म के तत्त्वांश को समझा जाता है।
दार्शनिक ‘रेनाल्ड’ कहते हैं— “धर्मक्षेत्र को अपनी भावनात्मक मर्यादाओं में रहना चाहिए और व्यक्तिगत सदाचार एवं समाजगत सुव्यवस्था के लिए आचार-व्यवहार की प्रक्रिया को परिष्कृत बनाए रखने में जुटा रहना चाहिए।” इतनी बात भी कुछ कम नहीं है। यदि धर्मवेत्ता अपनी कल्पनाओं के आधार पर भौतिक पदार्थों की रीति-नीति का निर्धारण करेंगे तो वे सत्य की कुसेवा ही करेंगे और ज्ञान के स्वरूप विकास में बाधक ही बनेंगे।
दार्शनिक ‘पालटिलिच’ ने कहा है कि, “धर्म और विज्ञान का मिलन दार्शनिक स्तर पर ही हो सकता है। दोनों के क्रियाकलाप एवं प्रतिपादन की दिशाएँ अलग-अलग ही बनी रहेंगी। न तो धर्म शास्त्रों के आधार पर खगोल, रसायन, पदार्थ-विश्लेषण जैसे निष्कर्ष निकाल सकता है और न भौतिक विज्ञान की प्रयोगशालाएँ ईश्वर, आत्मा, कर्मफल, सदाचार, भाव-प्रवाह जैसे तथ्यों पर कुछ प्रामाणिक प्रकाश डाल सकती हैं। केवल दार्शनिक स्तर ही ऐसा है, जहाँ यह दोनों धाराएँ मिल सकती हैं।”
‘ह्यूमन डैस्टिनी ग्रंथ’ के लेखक सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक ‘लैकोम्टे डुवे’ इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि, “अविवेक ने ही मानव समाज की दुर्गति की है। विज्ञान अभी तक पालने में पल रहा है। वह वस्तुओं के गुण-धर्म पर तो थोड़ा प्रकाश डालता है, पर यह नहीं बताता कि दूरदर्शी बुद्धिमत्ता की घटोतरी को कैसे पूरा किया जाए? धर्म में वे बीज मौजूद हैं, जिनके आधार पर चेतना में विवेकशीलता का अधिक समावेश हो सकता है, पर दुर्भाग्य यहाँ भी जमा बैठा है। आज धर्म का जो स्वरूप है, उसमें दुराग्रहों ने जड़ जमा ली है और विवेकशील चिंतन के द्वार अवरुद्ध कर दिए हैं। ऐसी दशा में सूझ नहीं पड़ता कि बुद्धिमत्ता की कमी किस प्रकार पूरी की जाए?”
विज्ञानी ‘रुनेग्लोविश’ इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि, “पृथ्वी के दो ध्रुवों अथवा शीत-ग्रीष्म ऋतु-प्रवाह की तरह एकदूसरे से भिन्न दीखते हुए भी धर्म और विज्ञान वस्तुतः एकदूसरे के पूरक हैं। दोनों में से एक के आधार पर जो भी निष्कर्ष निकाला जाएगा, वह वस्तुतः अपूर्ण ही रहेगा। पदार्थ में चेतन का अस्तित्व और चेतना को सक्रिय रहने के लिए भौतिक पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। दोनों का समन्वय ही विश्व को वर्तमान स्वरूप प्रदान कर सका है। यदि उन्हें सर्वथा पृथक् कर दिया गया तो अधूरे और भटकाव भरे निष्कर्ष ही हाथ लगेंगे।”
विज्ञान की प्रगति इसलिए होती गई कि उसने नए ज्ञान-प्रकाश के लिए द्वार खुला रखा और अपनी भूलों के समझने तथा सुधारने के लिए निरंतर प्रयत्न जारी रखा, जबकि धर्म ने अपने द्वार नए प्रकाश के लिए बंद कर लिए। पूर्ववर्ती व्यक्तियों तथा पुस्तकों द्वारा जो कुछ कहा-लिखा गया, उसी को अंतिम मान लिया गया और येन-केन-प्रकारेण उसी को सत्य सिद्ध करने के लिए हठ किया जाता रहा। इसी भिन्नता के कारण प्रगति की दौड़ में विज्ञान आगे निकल गया और धर्म पिछड़ गया। यदि शोध और सुधार का द्वार खुला रखा गया होता तो निस्संदेह धर्म को भी वैसी ही मान्यता मिलती, जैसी कि विज्ञान को मिली है।
भावनात्मक प्रवाह विलक्षण रीति से बहते हैं। एक ही समय में विभिन्न देशों में एक ही प्रकार के महत्त्वपूर्ण प्रयास करते हुए कतिपय महामानव अवतरित होते हैं और वे सूक्ष्मजगत में गतिशील प्रवाह को अग्रगामी बनाते हुए विश्वव्यापी हलचलों का सृजन करते हैं। धर्मक्षेत्र में प्रायः ऐसा ही होता रहा है। लूथर जर्मनी में, ज्विगी स्विटजरलैंड में, केल्विन फ्रांस में, जोन नोक्स स्काटलैंड में हुए। उन्हीं दिनों भारत में भी कई प्रख्यात सुधारकों ने जन्म लिया। विज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसा ही होता रहा है। गैलीलियो इटली में, केपलर पोलैंड में, न्यूटन इंग्लैंड में एक ही समय हुए और उन्होंने विज्ञान की प्रगति को महत्त्वपूर्ण दिशाओं में अग्रसर किया और पुराने ढर्रे को नई पटरी पर चलने के लिए विवश कर दिया।
भावनात्मक क्षेत्र में क्रांतिकारी चिंतनधारा प्रस्तुत करने वाले अनेक मनीषी एक ही समय में उत्पन्न हुए। भले ही वे विभिन्न देशों में जन्मे हों; भले ही उनका परस्पर परिचय न रहा हो, पर प्रतीत होता है कि एक ही प्रवाह से उठने वाले बुदबुदों की तरह ही वे समय की आवश्यकता पूरी करने में जुटे हुए थे।
धार्मिक एवं भावनात्मक क्षेत्र में अभिनव प्रकाश उत्पन्न करने वाले विद्वानों में टंपिले ब्रैथ, ब्रुमनेर, वेरडयेव, औलेन, न्यूगरैन, वैल्लीज, नैवुहरक, वुल्टमान, फैरी, टिलिच आदि का नाम उल्लेखनीय है। इन लोगों को चिंतन की परंपरागत शैली को मोड़ देने के लिए सदा सराहा जाता रहेगा।
वैज्ञानिक और आत्मवादी दोनों ही अंतर्ज्ञान से प्रकाश की किरणें प्राप्त कर रहे हैं। आविष्कारकों को अकारण ही ऐसी सूझ उठी, जिसके सहारे वे अपनी खोज का आधार खड़ा कर सके। पूर्व श्रृंखला न होने पर भी इस प्रकार का अनायास अंतर्बोध यही सिद्ध करता है कि ‘मानवी चेतना’ के पीछे कोई ‘अलौकिक प्रवाह’ काम कर रहा था, जिसे अप्रकट को प्रकट करने की उतावली थी। विज्ञान की प्रधान धाराओं के मूल आविष्कर्त्ता इस तथ्य से सहमत हैं कि उन्हें अपने विषय की सूझ-बूझ अंतःकरण में अकारण ही प्रस्फुटित हुई। यदि उस प्रकाश-किरण के लिए कुछ साधारण से कारण भी थे तो भी उनमें कोई नवीनता नहीं थी। वह सब कुछ पहले से होता चला आया था। उमंग उठकर ठप्प नहीं हई, वरन् उसने एक के बाद एक कदम आगे बढ़ने में सहारा दिया और सूझ-बूझ की उस श्रृंखला में एक के बाद एक कड़ी जुडती चली गई। यदि ऐसा न होता तो शोध की उठी हुई इच्छा मार्ग न मिलने पर कुंठित ही रह जाती।
विज्ञान का क्षेत्र हो अथवा धर्म का, उसमें समुद्रमंथन करके कुछ रत्न प्राप्त कर सकने का श्रेय मनुष्य की रहस्यमय प्रवृत्तियों को ही है। वे स्वल्प मात्रा में कहीं भी पाई जा सकती है, पर यदि किसी प्रकार उनको प्रखर किया जा सके, तो उनकी परिणति असाधारण उपलब्धियों के रूप में ही होती है। इसी अवलंबन के सहारे सामान्य ज्ञान को महद्ज्ञान और सामान्य व्यक्तित्व को महामानव बनने का श्रेय-सौभाग्य प्राप्त होता है।
विज्ञान और धर्म की प्रगति में जो तथ्य सहायक रहे हैं, उनमें से कुछ प्रमुख युग्म इस प्रकार हैं— (1) विवेक और औचित्य (2) विश्वास एवं श्रद्धा (3) तर्क एवं आशा (4) जिज्ञासा और जानकारी (5) सभ्यता और शालीनता (6) प्रेम और वफादारी (7) त्याग और सेवा (8) लगन और निष्ठा (9) धैर्य और साहस (10) पुरुषार्थ एवं मनोयोग। इसका अवलंबन लेकर चलने वाले व्यक्तित्व इस संसार में कुछ बहुमूल्य रत्न प्राप्त करके ही रहते हैं। धर्म हो अथवा विज्ञान हर क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों का श्रेय अंततः कुछ विशिष्ट सत्प्रवृत्तियों पर ही निर्भर सिद्ध होता है। कहना न होगा कि वह अंतःस्फुरणा, जो प्रसुप्त दिव्य प्रवृत्तियों को जाग्रत कर सके किसी अज्ञात संकेत से ही उद्भूत होती है।
विद्वान् ‘ह्वाइट हैड’ का यह कथन बहुत हद तक सही है कि, "धर्म के सिद्धांत मानवता के अनुभवों में निहित सत्यता को संक्षेप में प्रदर्शित करने का एक प्रयास मात्र है। इसी प्रकार विज्ञान भी मानव की ज्ञानेंद्रिय शक्ति में निहित सत्यों को संक्षेप में सूत्रीकरण करने का प्रयास मात्र है।"
दार्शनिक ‘रैक्वे’ कहते हैं— “मनुष्य ने विज्ञान द्वारा प्रकृति के अंतराल को समझा है और धर्म के द्वारा अपनी महानता का आभास पाया है।”
दार्शनिक ‘पैट्टन’ का कथन है कि, “यदि धर्म-मान्यताओं के लिए पक्षपात, पूर्वाग्रह और कट्टरता की दृष्टि रहे तो ऐसा मनुष्य घोर अनैतिक भी हो सकता है, भले ही वह धार्मिक समझा जाता रहे।”
‘श्री जेविन्स’ का कथन है कि, “जादू-टोने, चमत्कार तथा रहस्यवाद के आधार पर जो धर्म अथवा धर्माधिकारी खड़े हैं, उनकी जड़ें खोखली हैं। सिद्धातों और प्रेरणाओं की दृष्टि से जहाँ खोखलापन होगा, वहीं लोगों को आकर्षित करने के लिए ओछे हथकंडे काम में लाए जाएँगे। धर्म तो अपने आप में इतना उपयोगी है कि उसका यथार्थ स्वरूप समझने पर वह स्वयं ही एक ऐसा जादू-चमत्कार प्रतीत होता है, जिसके आधार पर व्यक्तित्व में क्रांतिकारी परिष्कार एवं उनका सत्परिणाम प्रत्यक्ष देखा जा सके। फिर उसे जादुई-चमत्कारों के साथ क्यों जोड़ा जाए?”
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, धर्म और विज्ञान को मिलकर चलना होगा, पेज नं. 63-69
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