धर्म की उपेक्षा से पछतावा ही हाथ लगेगा
जीवन उतना जटिल नहीं है, जितना कि बन गया है या बना दिया गया है। हँसी-खुशी की संभावनाओं से वह भरा-पूरा है। शरीर और मन की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह बाहर के तनिक से साधनों की सुविधा प्राप्त हो जाने पर सहज ही स्वस्थ और सुखी रह सकता है। अति स्वल्प साधनों से अन्य जीवधारी अपना संतोषपूर्ण व्यवस्थाक्रम चलाते रहते हैं। न उन्हें रुग्णता सताती है और न खिन्नता। यदि उन्हें सताया न जाए तो शरीरयात्रा की प्रचुर परिमाण में उपलब्ध साधन-सामग्री से ही अपना काम चला लेते हैं और हँसी-खुशी के दिन काटते हैं।
मनुष्य को यह सुविधा और भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है। उसका अस्तित्व एवं व्यक्तित्व इतना समर्थ है कि न केवल शारीरिक सुविधा की सामग्री, वरन् मानसिक प्रसन्नता की परिस्थिति भी स्वल्प प्रयत्न से प्रचुर मात्रा में प्राप्त कर सकता है। इतने पर भी देखा यह जाता है कि मनुष्य खिन्नता और अतृप्ति से ही घिरा रहता है। आधियों और व्याधियों की घटाएँ उस पर छाई रहती हैं।
सौभाग्य जैसे समस्त साधन प्राप्त होने पर भी दुर्भाग्य की जलन में झुलसते रहने के पीछे एक ही कारण ढूँढ़ा जा सकता है कि सहज-सरल रीति-नीति को छोड़कर हम जाल-जंजाल, विद्रूप विडंबनाओं में उलझ गए और अपना मार्ग स्वयं कंटकाकीर्ण बना लिया। सहज स्वाभाविकता का नाम है— धर्म और इसके विपरीत आचरण को अधर्म कहते हैं। वैयक्तिक और सामाजिक कर्त्तव्यों को जो सही तरह पालन करता है, उसे स्वल्प साधनों में भी तुष्ट-पुष्ट और प्रगतिशील देखा जा सकेगा। धर्म की धारणा निश्चित रूप से सुख-शांति के प्रतिफल प्रदान करती है।
‘ऐलिस’ ने कहा है— “मनुष्य के मन और शरीर को आधि-व्याधियों ने इसलिए घेरा है कि उसे धर्म का समुचित संरक्षण नहीं मिला। यदि आहार-निद्रा की तरह धर्म को भी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया होता तो हम शोक-संतापों की विविध विधि-व्यथाएँ सहने से सहज ही बच सकते थे।”
‘संत आगस्टीन’ ने “मानव की मानव के प्रति कर्त्तव्य-घोषणा को धर्म माना है।” ‘सेंटपाल’ का कथन है— “पतन के गर्त्त से उत्थान के शिखर पर चढ़ने की सीढ़ी को धर्म कहना उपयुक्त होगा।”
‘हेम्रोज’ ने “धर्म को दो धाराओं में विभक्त किया है— एक आस्थामूलक, दूसरी व्यवहारपरक।” आस्था की स्थापना अध्यात्म के आधार पर होती है और आचरण-व्यवहार का समीकरण धर्माचरण पथ द्वारा किया जाता है। दोनों के समन्वय को धर्म कह सकते हैं। ईश्वरवाद के सहारे ही धर्म-सिद्धांतों की व्याख्या और पुष्टि की जा सकती है।
‘विलियम वेक’ ने “धर्म को आत्मा का कवित्व कहा है।” वे कहते हैं— “पुराणों के अलंकार में परियों की गाथाएँ और जादुई किंवदंतियाँ भरी पड़ी हैं।” इन सबका सार निष्कर्ष यह है कि आत्मा की भाव-सरिता यदि उत्कृष्टता की दिशा में बह निकले, तो उसका प्रतिफल व्यक्ति और समाज के लिए उतना सरस और आकर्षक हो सकता है, जैसा कि देवताओं का सौंदर्य-वैभव और कर्तृत्व।
‘ल्यूवा’ ने “धर्म को एक सनातन राजमार्ग बताया है”, जिस पर धीरे-धीरे चलते हुए मनुष्य जाति विकास के वर्तमान स्तर तक पहुँचने में समर्थ हुई है और भविष्य में अधिक कुछ पाने की आशा कर सकती है।
‘प्लांटिस’ ने कहा— “धर्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह मनुष्य के मरणोत्तर जीवन का विश्वास कराती है और दुष्कर्म एवं सत्कर्म के बीच का अंतर बताते हुए उसके दुष्परिणामों-सत्परिणामों का निश्चय कराती है। यदि यह मान्यता मनुष्य समाज में से निकल जाए; वह अपने को नाशवान और मर्यादाओं से स्वतंत्र मान बैठे, तो फिर यहाँ हर किसी का व्यवहार पैशाचिक स्तर का हो उठेगा। धर्म का अस्तित्व और मनुष्य जाति का अस्तित्व दोनों एक-दूसरे के साथ अत्यंत सघनता के साथ जुड़े हुए हैं।”
‘फ्रेजर’ “धर्म को ईश्वरीय आदेश और आत्मतृप्ति का आधार मानते थे।” ‘कोमटे’ की मान्यता थी कि, “अंतरात्मा के मृदुल रस को बाह्य संसार के साथ समन्वित करके कैसे बहुमुखी सरसता उत्पन्न की जा सकती है? इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकने वाली कला का नाम ही धर्म है।”
‘संत डाइनाइसिअस’ का निरूपण यह था कि, “अदृश्य जगत और दृश्य जगत के परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली धाराओं को एकात्म बना देने वाले महासमुद्र का नाम धर्म है। उसके आधार पर ही विरोध को सहयोग में एवं पृथकता को एकता में बदला जा सकता है।”
‘मेक्समूलर’ ने अपनी "एन इंट्रोडक्शन टू दी साइंस ऑफ रिलीजन" पुस्तक में धर्म की विवेचना करते हुए लिखा है— “धर्म अंतरात्मा की पुकार है, जो तर्क और जानकारियों को प्रभावित तो करती है, पर उससे प्रभावित नहीं होती। उसका आधार अतींद्रिय है। दिव्य चेतना ही हमें धर्मनिष्ठा अपनाने के लिए प्रेरित करती है।”
‘विलियम जेम्स’ ने लिखा है— “धर्म एक दूरगामी चिंतन है, जिससे व्यक्ति की सामयिक परिस्थितियों की अपेक्षा समष्टि की सर्वांगीण और सर्वकालीन आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है।”
‘अलवर्ट’ का कथन है— “धर्म हमारे भौतिक जीवन को सुखी बनाने में सहायक हो सकता है, पर भौतिक सुखों के लिए धर्म का उपयोग करना न तो उचित होगा और न संभव। धर्म एक आध्यात्मिक भूख है, जिसे तृप्त करने के लिए भौतिक कष्ट भी सहने पड़ सकते हैं।”
‘पास्कल’ ने कहा है— "हृदय के विवेक से धर्म का उदय होता है। उसे मात्र तर्कों की बैसाखी लगाकर खड़ा नहीं किया जा सकता।"
‘कांट’ ने “धर्म की परिभाषा करते हुए उसे ऐसी मानवी कर्त्तव्यनिष्ठा बताया है, जो मस्तिष्क तक सीमित न रहकर, अंतःकरण में निष्ठा में घनीभूत हो गई हो।”
तत्त्वदर्शियों के उपरोक्त अभिवचनों में “धर्म शब्द के अंतर्गत जिस आधार की चर्चा की है, उसे उत्कृष्टतावादी चिंतन और आदर्शवादी कर्तृत्व के अंतर्गत ही गिना-समझा जाना चाहिए।” “कर्त्तव्यपरायणता का ही दूसरा नाम धर्म है।” शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक और सार्वभौमिक जिम्मेदारियों से मनुष्य की उच्छृंखलता को मर्यादित किया गया है। उसे अपने स्तर के अनुरूप सृष्टि-संतुलन के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ भी निबाहनी होती हैं। धर्म का प्रयोजन इसी मानवोचित शालीनता और कर्त्तव्यनिष्ठा को अक्षुण्ण बनाए रखना है। संस्कृति और संप्रदायों में क्षेत्रीय और सामयिक परिस्थितियों के अनुसार आचार-व्यवहार की व्यवस्था रहती है। इसलिए परिस्थिति के अनुसार उनमें बार-बार सुधार-परिवर्तन करना पड़ता है, पर धर्म के बारे में ऐसी बात नहीं है। वह शाश्वत और सनातन है। उसका स्वरूप— सदाचार, मर्यादा और लोकहित के रूप में चिर-अतीत से ही निर्धारित किया जा चुका है। उसमें परिवर्तन की आवश्यकता कभी भी, किसी को भी नहीं पड़ सकती।
सुख-शांति के लिए अधिक सुविधाजनक साधनों की खोज में विज्ञान और शासन के प्रयास जुटे रहते हैं, पर यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए, मनुष्य एक चेतनात्मक परिपूर्ण सत्ता है। आनंद का उद्गम उसके भीतर है। वही अंतर्ज्याति जब बाह्य जगत पर प्रतिबिंबित होती है, तो सौंदर्य, संतोष एवं रसानुभूति का अनुभव होता है। विचारणा का स्तर ऊँचा उठाए बिना विपुल साधनसंपन्न होने पर भी न आनंद मिल सकेगा, न उल्लास और संतोष। विचारणा को उत्कृष्टता के स्तर तक उठाने और सुदृढ़ बनाने में धर्म का तत्त्वज्ञान ही समर्थ हो सकता है। अन्य कोई भी तत्त्व सहायता नहीं कर सकता है।
'मॉर्डन मैन इन सर्च ऑफ रिलीजन' ग्रंथ में यह प्रतिपादन किया गया है कि, “विज्ञान में भी किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विशिष्ट यंत्र ही उपयोगी होते हैं। न तो सूक्ष्मदर्शक यंत्र द्वारा दूरस्थ तारा दिखाई देता है और न ही सर्जन की छुरी से कालोनियों के अत्यंत सूक्ष्म परमाणु देखे जा सकते हैं। इसी प्रकार बुद्धि के द्वारा आध्यात्मिक सत्यों का परीक्षण नहीं किया जा सकता, भले ही वह कितनी ही तीक्ष्ण क्यों न हों?”
विज्ञान द्वारा सुविधा-साधनों की वृद्धि की दिशा में किए गए प्रयासों से समुचित लाभ तभी उठाया जा सकेगा, जब भावना एवं दृष्टिकोण को ऊँचा उठा सकने में समर्थ धर्मतत्त्व को समझने के लिए भी समानांतर प्रयास किया जाएँ।
'ईवोलूशन इन साइंस एंड रिलीजन' के लेखक का कथन है— “विज्ञान ने शक्ति को पदार्थ के रूप में और पदार्थ को शक्ति के रूप में परिवर्तित करके यह सिद्ध कर दिया है कि सूक्ष्म को स्थूल और स्थूल को सूक्ष्म में बदला जा सकता है।”
दर्शन भी यह सिद्ध करता रहा है कि, “विचार को घटना के रूप में विकसित किया जा सकता है और घटनाएँ विचारों का निर्माण कर सकने में समर्थ हैं।”
“पदार्थ से सुख मिलता है”, यह सिद्धांत भी अपने स्थान पर ठीक है। पर गलत यह भी नहीं कि उत्कृष्ट चिंतन उपलब्ध साधनों की मात्रा अधिक न होने पर भी हस्तगत है। उससे इतना आनंद उठाया जा सकता है, जो परिपूर्ण संतोष प्रदान कर सके।
सामाजिक-सुव्यवस्था के लिए धर्मधारणा से बढ़कर और कोई साधन नहीं हो सकता। बलपूर्वक अवांछनीयता पर नियंत्रण करने में शासन की अधिकांश क्षमता नष्ट होती रहती है, फिर भी कुछ हमें लाभदायक समाधान नहीं मिलता। यदि धर्मधारणा को प्रखर और समुन्नत बना सकने योग्य वातावरण उत्पन्न किया जा सके; उचित साधन जुटाए जा सकें, तो निस्संदेह सामाजिक-सुव्यवस्था और राष्ट्रीय समर्पण का प्रयोजन सहज ही पूरा हो सकता है। सार्वभौम और सर्वकालीन सुख-शांति की स्थापना धर्मधारणा को सुदृढ़ और समुन्नत बनाकर ही की जा सकती है।
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, धर्म की उपेक्षा से पछतावा ही हाथ लगेगा, पेज नं. 69-74
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