विज्ञान और धर्म में समन्वय अनिवार्य
पदार्थ के रूप में विज्ञान भी आंतरिक सत्ता का ही तो उद्घाटन करता है। धर्म के क्षेत्र में परमात्मा एक विश्वव्यापक शक्ति है और पदार्थ भी शक्ति के ही कण हैं। सच तो यह है कि शक्ति के अतिरिक्त संसार में और कुछ है ही नहीं। धर्म उसे अंतर्चेतना के रूप में देखता है। वह उदाहरण देता है कि गांधी जी का आत्मबल ही था, जिसने ब्रिटिश सत्ता को बिना लड़े निकाल दिया और विज्ञान कहता है, एक छोटे से शस्त्र ने जो हिरोशिमा के 70 हजार नागरिक पल भर में भून डाले, वह क्या कम जबर्दस्त शक्ति थी। भले ही एक का स्वरूप रचनात्मक हो और दूसरे का स्वभाव ध्वंस, पर विज्ञान और धर्म दोनों ने ही शक्ति के एक ही स्वरूप की जानकारी दी है। दोनों में कोई विरोध नहीं है।
यह झगड़ा तो राम और शिव की तरह का है। राम, शिव के उपासक हैं और शिव, राम के। पर शिव जी के भक्त भूत-प्रेतों का स्वभाव, राम के भक्त रीछ-वानरों के स्वभाव से नहीं मिलता। इसीलिए वे परस्पर लड़ते हैं। आज विज्ञान धर्मावलंबियों को हीन मानता है, तो धर्म को मानने वाले भौतिकतावादी या पदार्थ की शक्ति पर विश्वास करने वालों को ओछा मानते हैं। दरअसल दोनों को यह समझना चाहिए कि धर्म और विज्ञान के मूलभूत उद्देश्य एक ही सत्य को प्राप्त करना है।
रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में “मंगल का उपवास लड़की भी रखती हैं और माँ भी; दोनों के लिए ‘मंगल’ एक ही है, पर मान्यताएँ अलग-अलग हैं।” वह कहती है कि ‘मैं’ मंगल का व्रत हूँ। माँ कहती है कि ‘मैं’ मंगल का व्रत हूँ। उद्देश्य दोनों के एक हैं। केवल ‘मैं-मैं’ का झगड़ा है।
धार्मिकता अनिवार्य होनी चाहिए, पर उसका यह अर्थ नहीं कि विज्ञान को छोड़ दिया जाए। विज्ञान का परित्याग ही विश्वास को अंधविश्वास और श्रद्धा को अंधश्रद्धा बनाता है। जबकि धर्म का उद्देश्य सत्य को खोजकर मनुष्य को एक ऐसा रास्ता दिखाना है, जिसमें वह अपने हर पड़ोसी के साथ— मिलने-जुलने वाले के साथ शांति, प्रेम और भाईचारे का जीवनयापन कर सके। भारतवर्ष में इस समन्वय की गंगा बह चुकी है। जब यहाँ धर्म और विज्ञान दोनों का समन्वय किया गया था और मनुष्य जीवन को इस तरह संतुलित किया गया था, जिसमें धर्म भी था, विज्ञान भी। तभी यह देश चरमोत्कर्ष कर सका था।
धर्मग्रंथों में जीव को ईश्वर अंश बताते हुए कहा जाता है— “व्यक्ति भगवान है (ईसा, कृष्ण या राम के रूप में) अर्थात व्यक्ति में ईश्वरीय गुणों की खोज करते हैं।” लेकिन विज्ञान ब्रह्मांड के ज्ञान में वृद्धि करता है, तब हमें पता चलता है कि रचयिता (क्रियेटर) मनुष्य नहीं हो सकता। अलबत्ता वह मनुष्यों की-सी शक्ति, क्षमता, ज्ञान और सामर्थ्य का विकसित रूप होना चाहिए। इस दृष्टि से विज्ञान ने सत्य की खोज में मदद की और यह बताया कि ईश्वर एक सर्वव्यापी तत्त्व होना चाहिए। मनुष्य को उसका प्रतिबिंब होना चाहिए।
यदि इन निष्कर्षों को मान लेते हैं तो सचमुच मनुष्य को दीक्षित करने की एक बड़ी भारी समस्या हल हो जाती है। फिर तो मनुष्य को इतना समझना शेष रह जाता है कि हम अपनी शक्तियों को अपव्यय से बचाकर उनका किस प्रकार विकास करें कि अपनी अपूर्णता ईश्वरीय पूर्णता में परिवर्तित हो जाए। इस कार्य को फिर धर्म पूरा कर सकता है।
दोनों का लक्ष्य अच्छाई और सत्यान्वेषण रहे, तो विज्ञान और धर्म एकदूसरे का विरोध कर भी नहीं सकते। अभी हमारा विज्ञान केवल पदार्थ संबंधी जानकारी देता है, लक्ष्य नहीं बताता। इसलिए धर्म की दृष्टि में वह अहितकारक है। इसी प्रकार अध्यात्म अंधविश्वास को मान्यता देता है, जिसे विज्ञान कभी स्वीकार नहीं कर सकता। यह दोनों की भूलें हैं। दोनों में से किसी को भी अपनी सच्चाई से विमुख नहीं होना चाहिए।
विज्ञान विशिष्ट तरीकों से ज्ञान प्राप्त कराता है और धर्म की अनुभूति भिन्न प्रकार की होती है। विज्ञान की दिशाएँ पदार्थ के ज्ञान की ओर बढ़ती हुई चली जाती हैं और एक दिन वहाँ पहुँचेंगी, जहाँ से ईश्वरीय शक्तियों ने स्वेच्छा या अन्य किसी कारण से पदार्थ में परिवर्तित होना प्रारंभ किया। इसी प्रकार आत्मा का प्रकाश तथा आत्मा की विशालता की अनुभूति भी एक दिन उसी सर्वव्यापी सर्व चैतन्य तत्त्व तक पहुँचा देती है। दोनों एक ही स्थान से उठते हैं और दोनों के गंतव्य भी एक हैं। इसलिए उनको यहाँ भी साथ-साथ ही रहना चाहिए। मनुष्य को इस जीवन में भौतिक सुखों की अनुभूति भी रहनी चाहिए और आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील भी, इसलिए दोनों का समन्वय आवश्यक हो जाता है।
अकेले विज्ञान को ही महत्त्व देना तो अंधों की कहानी की तरह होगा। एक बार अंधा अपने घर से निकल पड़ा और उस दरवाजे पर जाकर सहायता के लिए पुकारने लगा जिस घर में एक दूसरा अंधा रहता था। वह अंधा बाहर तो आया पर कोई रास्ता बताने के पहले उसे यही पता लगाना कठिन हो गया कि यह अंधा किधर से आया है और वह किधर जाना चाहता है; वह दिशा किस तरफ है। बेचारे से असमर्थता ही प्रकट करते बनी। यदि विज्ञान केवल पदार्थ से ही उलझा रहा तो मनुष्य शरीर में भावनाओं के— ईश्वरत्व के विकास का क्या बनेगा? यदि सब कुछ पदार्थ को ही मान लिया गया तो प्रेम, मैत्री, सेवा, संतोष और शांति की भावनाओं का क्या होगा? क्या इनकी उपेक्षा करके मनुष्य सुखी रह सकता है?
भौतिकतावादी दर्शनशास्त्र (मैटेलिस्टिक फिलॉसफी) मृत्यु के बाद जीवन के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता, लेकिन विज्ञान अब भौतिकता से आगे बढ़ गया है। अब यह माना जाने लगा है कि शरीर और विश्व में कुछ वस्तुएँ जैसे संस्कार-कोष (जीन्स) अमर तत्त्व हैं। उनका कभी नाश नहीं होता? उसी प्रकार अब भौतिकतावाद का यह सिद्धांत “पदार्थ नष्ट नहीं होता” पुराना पड़ गया। इलेक्ट्रॉन जो कि पदार्थ का विद्युत आवेश है, ऊर्जा केंद्र (सेंटर्स ऑफ एनर्जी) में वाष्पीकृत हो जाता है। तब पदार्थ का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है और ऊर्जा (एनर्जी) में बदल जाता है। पदार्थ में भार होता है, पर ऊर्जा (एनर्जी में कोई भार नहीं रह जाता।)
परा मनोविज्ञान अब मानव विज्ञान के उस अध्याय में प्रवेश कर रहा है, जिसे हम पुनर्जन्म कहते हैं और इस प्रकार विज्ञान धर्म की मान्यताओं पर आ रहा है। यह कहा जा सकता है— भारतवर्ष के प्रायः सभी धर्म पुनर्जन्म को मानते हैं। मनोविज्ञान के अनुसंधानकर्त्ताओं को ऐसे लड़के-लड़कियाँ मिली हैं, जो अपने पूर्वजन्मों का हाल बताती हैं। अमरीकी मनोवैज्ञानिक ‘डॉ. स्टीवेंसन’ कुछ दिन पूर्व नई दिल्ली आए। उन्होंने बताया कि मैंने विश्व के लगभग 500 मामलों का अध्ययन किया है। उससे मुझे विश्वास हो गया है कि पुनर्जन्म की कल्पना कपोल-कल्पित नहीं। उनकी इस सम्मति को वैज्ञानिकों में बहुत महत्त्व दिया जा रहा है। यह बताता है कि वैज्ञानिक धार्मिक सत्यों से आँख नहीं मीचते, वरन् वे अब उस स्थान पर हैं, जहाँ से धर्म के सत्यों को सरलता से प्रतिपादित किया जा सकता है।
वैज्ञानिक ‘राबर्ट ब्लेच्फोर्ड’ ने माना कि, “आज भौतिक पदार्थ और भोगवाद के पग उखड़ रहे हैं और अब वह समय आ गया है, जब विज्ञान खाओ, पीओ, मौज करो (ईट-ड्रिंक एंड बी मेरी) के भौतिकतावादी सिद्धांत को छोड़ देगा और आध्यात्मिक-क्षेत्र में प्रवेश करेगा।” डॉ. ब्लेचफोर्ड का यह सिद्धांत अब पश्चिम (वेस्टर्न कंट्रीज) में ‘फिलॉसफी आफ ब्लेचफोर्ड’ (ब्लेचफोर्ड के सिद्धांत) के नाम से तीव्रता से प्रसिद्ध हो रहा है।
वहाँ का पाप और दुर्भाग्य से संतप्त जीवन अब अध्यात्म की शीतल छाया में, जबकि धार्मिक जीवन का अंधविश्वास भी चरमराकर टूट रहा है और वह विज्ञान से अपने प्रमाणित तथ्यों की खोज कराने के लिए निकल पड़ा है, दोनों समन्वय चाहते हैं और इस प्रकार मनुष्य को एक सच्चा मार्ग देना चाहते हैं, जिसमें इस संसार की उपस्थिति को भी न त्यागा जाए और अपनी अदृश्य सत्ता को भी भुलाया न जाए। सत्य के अनुसंधान का यही समन्वययुक्त मार्ग सच्चा और व्यावहारिक होगा।
वैज्ञानिक तरीकों से प्राप्त ज्ञान में अंतर्ज्ञानतत्त्व अंतर्हित है, जबकि आत्मचेतना का प्रकाश भी सत्य को प्रदर्शित करता है। दोनों ही रहस्यपूर्ण हैं और जैसा कि ‘विलियम जेम्स’ ने कहा— “जीवन का सत्य भी रहस्य की दिशा में ही है। रहस्य में वास्तविकता भी हो सकती है और निरर्थक एवं पथभ्रष्टता भी। इसलिए जब सत्य और रहस्यों की दिशा में बढ़ें, तब मनोवैज्ञानिक सत्य छुपे नहीं। उसके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि धर्म और विज्ञान दोनों ही साथ-साथ पथ-प्रदर्शन करें। जहाँ तक विज्ञान की पहुँच है, वहाँ तक का अंतर्ज्ञान ही देकर वह धर्म का रास्ता साफ करे और धर्म का कर्त्तव्य है कि वह वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ अपनी उपलब्धियों की संगतियाँ बैठाकर उस अपूर्णता को दूर करे, जो विज्ञान के लिए आगे बढ़ने में आकस्मिक अवरोध के कारण उत्पन्न होती है। विज्ञान पदार्थ की स्थूलता का विश्लेषण कर सकता है, ज्ञान और अनुभूति के प्रसंग में वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है। ज्ञान और अनुभूति के लिए विचार और भावनाओं की शक्तियाँ काम देती हैं और इनका विकास धार्मिकता के अंतर्गत आता है। मनुष्य पदार्थ और भावनाओं का मिला-जुला स्वरूप है, इसलिए संपूर्ण सत्य की खोज के लिए दोनों का विश्लेषण आवश्यक है। अकेला विज्ञान भावनाओं की परिधि तक पहुँचकर रुक जाता है, जबकि धर्म भी पदार्थ को जानकारी न दे सकने के कारण मनुष्य को उसके भौतिक आकर्षण से नहीं बचा पाता। इसलिए विकास और अंतिम सत्य की खोज तभी संभव होगी, जब इनमें से किसी को भी छोड़ा न जाए।”
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, विज्ञान और धर्म में समन्वय अनिवार्य, पेज नं. 75-79
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